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Mahashivratri 2020: पार्वती की परीक्षा लेने शिव बने मगरमच्छ

नई दिल्ली। भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह से जुड़ी अनेक कहानियां भारतीय जन मानस के हृदय में बसी हुई हैं। भगवान शिव को पति के रूप में वरण करने के लिए माता पार्वती ने हजारों वर्ष तक तपस्या की थी, यह सर्वविदित और सर्वमान्य तथ्य है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पार्वती से विवाह की स्वीकृति देने से पहले महादेव ने उनकी विधिवत् परीक्षा भी ली थी। वास्तव में महाशिव यह चाहते थे कि उन्हें चूंकि जन-जन के दुख-सुख का संज्ञान लेना होता है, तो उनकी धर्मपत्नी भी ऐसी हो, जो प्रत्येक प्राणी मात्र के मन को समझे, सृष्टि के कण-कण को अपना ही अंश मान उसका पालन-पोषण और रक्षण करे। इसी निमित्त उन्होंने पार्वती की परीक्षा ली थी।

आज की कथा में इसी रोचक घटना से परिचित होते हैं....

पार्वती ने किया था हजारों वर्षों तक तप

पार्वती ने किया था हजारों वर्षों तक तप

यह उस समय की बात है, जब मां पार्वती हजारों वर्षों से महाशिव को पति रूप में पाने के लिए निर्जल, निराहार उपासना कर रही थीं। इस उपासना काल में देवों और ऋषियों के द्वारा कई प्रकार से उनकी परीक्षा ली जा चुकी थी और सभी ने उन्हें महाशिव के सर्वथा योग्य पाया था। इसके बाद स्वयं शिवजी ने प्रकट होकर उन्हें तपस्या के फलस्वरूप वरण का आशीर्वाद दिया था। इसके बाद भी महादेव एक बार उनके मन को परख लेना चाहते थे।

पार्वती तपस्या में लीन थीं

इसी काल में एक बार पार्वती तपस्या में लीन थीं, तभी उन्हें एक बालक की चीख सुनाई दी। उन्होंने देखा कि पास ही तालाब में एक बालक को मगरमच्छ ने पकड़ रखा है। बालक ने मां से अपनी रक्षा की गुहार लगाई। उस बालक की पीड़ा देख पार्वती जी का मन भर आया। उन्होंने मगरमच्छ से प्रार्थना की कि इस बालक को छोड़ दो। मगरमच्छ ने कहा कि यह बालक भगवान ने उसके भोजन के निमित्त भेजा है। वह उसे क्यों छोड़े? माता पार्वती ने बहुत समझाया कि एक नन्हें बालक को मारकर उसके माता-पिता और स्वयं उन्हें दुखी ना करे, पर मगरमच्छ मानने को तैयार ना था। अंततः मगरमच्छ ने कहा कि यदि इस बालक के बदले में मुझे कुछ ऐसी प्राप्ति हो, जो मेरा कल्याण कर दे, तो मैं इसे छोड़ने को तैयार हूं।

पार्वती की परीक्षा लेने शिव बने मगरमच्छ

पार्वती की परीक्षा लेने शिव बने मगरमच्छ

मगरमच्छ की बात सुन पार्वती ने कहा कि यदि ऐसी कोई वस्तु मेरे पास है, जिसे लेकर तुम संतुष्ट हो सकते हो, तो मैं सहर्ष तुम्हें देने के लिए तैयार हूं। इस पर मगरमच्छ ने कहा कि आपने हजारों वर्ष तप किया है, उस तप का फल आप मुझे दे दें, तो मैं अभी इस बालक को छोड़ दूंगा। मगरमच्छ की बात सुनकर पार्वती ने कहा कि मैं अवश्य ही तुम्हें अपने तप का फल दूंगी, तुम तुरंत इस बालक को जाने दो। मगरमच्छ ने कहा कि एक बार अच्छे से सोच लीजिए। आपको सारा तप व्यर्थ चला जाएगा।

पार्वती ने दान किया अपनी तपस्या का फल

पार्वती ने दान किया अपनी तपस्या का फल

पार्वती ने तुरंत ही जल हाथ में लेकर संकल्प लिया और अपनी हजारों वर्ष की तपस्या का फल उस मगरमच्छ को सौंप दिया। इसके साथ ही मगरमच्छ की काया सोने सी दमकने लगी और उसने बालक को छोड़ दिया। इसके बाद पार्वती जी ने सोचा कि मैंने अपनी तपस्या का फल तो दान कर दिया। अब महादेव को पाने के लिए मुझे वापस तपस्या करना चाहिए। इतना सोचकर वे वापस तपस्या का संकल्प लेने लगीं।

शिव ने पूछा-वापस तपस्या क्यों करने लगी?

तभी महादेव प्रकट हुए और बोले कि पार्वती, वापस तपस्या क्यों करने लगी? पार्वती ने कहा कि प्रभु, मैं अपने तप फल दान कर चुकी हूं और आपको पाना ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। इसीलिए मैं फिर से तपस्या कर आपसे आपको ही मांग लूंगी। तब महादेव ने हंसते हुए कहा कि वह बालक और मगरमच्छ मेरी ही माया थे। मैं केवल तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। मैं तुमसे पूर्णतः संतुष्ट हूं। अब तप छोड़ो और विवाह की तैयारी करो और इस तरह अपनी कठिन तपस्या और सरल मन के बल पर पार्वती जी ने शिव को प्रसन्न कर लिया और उनके जीवन में एकाकार हो गईं।

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