शुरू हो गयी कुंभ स्नान की तैयारियां

हिमालय की कोख से अवतरित गंगा एवं यमुना के अद्भुद मिलन तथा अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर प्रत्येक वर्ष माघ में डेढ़ माह तक चलने वाला माघ मेला, छह वर्ष पर अर्धकुम्भ तथा 12 वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है। नक्षत्रों के अनुसार 2012-13 के माघ मास में यहां कुम्भ मेला आयोजित होगा जिसमें देश के सुदूर अंचलों के साथ ही विदेशों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में आने की संभावना है।
वैसे तो यह नगरी देशी सैलानियों की आस्था से केन्द्र बिन्दु रही है लेकिन धीरे-धीरे विदेशी पर्यटकों के भी आकर्षण का केन्द्र बनती गयी। यही कारण है कि विदेशियों की दृष्टि में प्रयाग के कुम्भ का महत्व कम नही है। इस धार्मिक नगरी की ऐसी मान्यता है कि प्रयागराज, इलाहाबाद को हिमालय के पंच प्रयागों, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्ण प्रयाग, नन्द प्रयाग एवं प्रयागराज में श्रेष्ठ माना गया है। वर्षों से चल रहे कुम्भ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियां हैं।
वैदिक और पौराणिक काल में कुम्भ तथा अर्धकुम्भ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरुप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुम्भ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। वहीं पुराणों के अनुसार कुम्भ के अवसर पर प्रयाग में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्नान के बाद यहां मुंडन, श्रद्धा, वेणीदान तथा अंतिम संस्कार का विशेष महत्व है।
मूलवेणी अक्षयवट के पास, मध्य वेणी संगम के समीप तथा अंत्यवेणी अरैल के पास सोमेश्वर महादेव तक विस्तृत है। वह स्थल जहां गंगा जी का धवल तथा उज्ज्वल जल यमुना के श्यामवर्णी जल से मिलता है, संगम स्थल कहा जाता है। यही पर अंत: सलित सरस्वती की कल्पना की गई है। अगले वर्ष माघ मास 2012 में यहां पडऩे वाले कु भ मेले की व्यवस्था के लिए सरकार ने 758 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया है जिसे मेले मे आने वाले यात्रियों के लिए बड़ी सं या में सुरक्षा कर्मी तथा किसी भी आतंकवादी गतिविधियों से बचने के लिए बम निरोधक दस्ते की व्यवस्था मेला प्रशासन करेगा। वहीं पर्यटन विभाग ने भी होटलों की व्यवस्था चाक-चौबन्द करनी शुरू कर दी है।












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