Kamada Ekadashi: कामदा एकादशी, जानिए इसकी व्रत कथा
नई दिल्ली। आज पूरे देश में 'कामदा एकादशी' मनाई जा रही है। माना जाता है आज के दिन विधि-विधान से व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप खत्म हो सकते हैं। इस एकादशी को 'फलदा एकादशी' भी कहा जाता है। हिंदू व्रत परंपरा में एकादशी को सबसे बड़ा व्रत बताया गया है। यह भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय व्रत है और समस्त सुखों को प्रदान करने वाला है। चैत्र शुक्ल पक्ष में 'कामदा एकादशी' नाम की एकादशी होती है। कहा गया है कि 'कामदा एकादशी' ब्रह्महत्या आदि पापों तदोषों का नाश करने वाली है।

क्या है कथा...
प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहां पर पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सराएं और गंधर्व रहा करते थे, उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहां तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो जाते थे। एक दिन गन्धर्व ललित दरबार में गान कर रहा था कि अचानक उसे अपनी पत्नी की याद आ गई। इससे उसका स्वर, लय एवं ताल बिगड़ने लगे।

राजा ने ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया
इस त्रुटि को कर्कट नामक नाग ने जान लिया और यह बात राजा को बता दी। राजा को ललित पर बड़ा क्रोध आया। राजा ने ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया। जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह वृत्तान्त मालूम हुआ तो उसे अत्यंत खेद हुआ। ललित सालों तक राक्षस योनि में घूमता रहा। उसकी पत्नी को इस बात का बहुत दुख हुआ। वह श्रृंगी ऋषि के आश्रम में जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी। उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले कि हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो?

पत्नी ने किया कामदा एकादशी का व्रत
ललिता बोली कि हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से विशालकाय राक्षस हो गया है। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए। श्रृंगी ऋषि बोले हे गंधर्व कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा।

पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया
ललिता ने मुनि की आज्ञा का पालन किया और एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करते हुए वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।












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