Kalbhairav Jayanti 2023: घर में नहीं होती भैरव पूजा, कैसे करें पूजन?
Kalbhairav Jayanti 2023: मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के दिन कालभैरव अष्टमी मनाई जाती है। वो दिन आज है लेकिन क्या आप जानते हैं कालभैरव का पूजन घर में कभी नहीं किया जाता है और न ही कालभैरव की कोई मूर्ति या चित्र घर में स्थापित किया जाता है।

कालभैरव की पूजा से मनुष्य के जीवन के सारे भय दूर हो जाते हैं। गुरु के मार्गदर्शन में अनेक सिद्धियां प्राप्त होती हैं और शत्रु दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं कालभैरव की प्रसन्नता के लिए क्या करें।
कालभैरव भगवान शिव के रौद्र स्वरूप हैं
कालभैरव भगवान शिव के सबसे रौद्र स्वरूप हैं इसलिए इनकी प्रवृत्ति अत्यंत तामसिक हैं। इन्हें मदिरा का सेवन प्रिय है। इसलिए इनका पूजन घर में नहीं किया जाता। मंदिरों में इन्हें नियमित रूप से मदिरा का भोग लगाया जाता है। यदि आपको शत्रु परेशान कर रहे हैं। आपको अक्सर हानि पहुंचाते रहते हैं तो कालभैरव अष्टमी के दिन भैरव को मदिरा भेंट करें।
कालभैरव स्तोत्र का पाठ करें
- इस दिन किसी भी कालभैरव मंदिर में जाएं और एक श्रीफल के साथ काला धागा भैरव के चरणों में रखें।
- कालभैरव स्तोत्र का पाठ करें और यह धागा उठाकर ले आएं।
- इसे अपने घर के मुख्य द्वार पर 8 गांठ लगाकर बांध दें। इससे आपका घर-परिवार सदैव शत्रुओं से सुरक्षित रहेगा। घर को कभी बुरी नजर नहीं लगेगी।
- जिन बच्चों को नजर बहुत लगती है उन्हें कालभैरव के चरणों में अर्पित किया हुआ काला धागा बांधेंगे तो बुरी नजर से बच्चों की रक्षा होगी।
- भैरव अष्टमी के दिन काले श्वानों को घी लगी रोटी खिलाने से भैरव भी प्रसन्न होते हैं।
- शत्रु परेशान कर रहे हैं। कार्यों में बाधाएं डाल रहे हैं तो आज के दिन कालभैरव को उड़द से बनी मिठाई का नैवेद्य लगाएं और यह मिठाई गरीबों में बांट दें।
- कालभैरव अष्टमी के दिन भगवान शिव का अभिषेक पूजन करने से भी कालभैरव प्रसन्न होते हैं।
घरों में काल भैरव की पूजा नहीं की जाती
कालभैरव की पूजा समस्त संकटों, आकस्मिक रूप से होने वाली हानि, रोग, दुर्घटना, अकाल मृत्यु और शत्रुओं के भय से बचाती है। हालांकि घरों में काल भैरव की पूजा नहीं की जाती किंतु मंदिर में जाकर की जाती है और काल भैरव तांत्रिकों में इष्ट देव होते हैं। सारे तांत्रिक कालभैरव से शक्तियां प्राप्त करते हैं।
आइए जानते हैं काल भैरव प्रकट कैसे हुए
भगवान शिव का भैरव अवतार क्यों हुआ इसके पीछे पुराणों में एक अद्भुत और विचित्र घटना का वर्णन मिलता है। प्रसंग यह है कि एक बार सुमेरू पर्वत पर समस्त देवता इकट्ठा हुए और ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि हे परमपिता इस चराचर जगत में अविनाशी तत्व कौन है, ऐसा कौन है जिनका न आदि है न अंत, कृपया हमें बताएं। ब्रह्माजी ने कहा इस जगत में अविनाशी तत्व तो मात्र मैं ही हूं, क्योंकि यह समस्त सृष्टि मेरे द्वारा ही उत्पन्न की गई है। यह सब कुछ मैंने ही निर्मित किया है, मेरे बिना इस ब्रह्मांड की कल्पना भी करना कठिन है। फिर देवताओं ने यही प्रश्न श्रीहरि विष्णुजी से किया तो उन्होंने कहा कि मैं इस चराचर जगत का भरण-पोषण करता हूं, अतः अविनाशी तत्व मेरी अलावा और कौन हो सकता है।
जिनमें भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है
देवता दोनों के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने इस बात को सत्यता की कसौटी पर परखने के लिए चारों वेदों को आमंत्रित किय। चारों वेदों ने एक ही स्वर में कहा कि जिनके भीतर समस्त ब्रह्मांड समाया हुआ है। यह चर-अचर जगत मात्र जिनके संकेतों पर चलता है, जिनमें समस्त भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, जो अजन्मा है, जिसका न कोई आदि है न अंत, से सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु से परे हैं, वे अविनाशी तो भगवान रूद्र हैं।
एक दिव्य तेज के रूप में भगवान रुद्र प्रकट हुए
वेदों के द्वारा शिव के संबंध में किए गए बखान को सुनकर ब्रह्माजी को ठीक नहीं लगा। उनके पांचवें मुख ने शिव के विषय में अपमानजनक शब्द कहे। उसी समय एक दिव्य तेज के रूप में भगवान रुद्र प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने रुद्र से कह कि हे रुद्र! तुम मेरे ही शरीर से उत्पन्न हुए हो, अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम \'रुद्र\' रखा है अतः तुम मेरी सेवा करो। ब्रह्मा के इस आचरण पर रुद्र को भयानक क्रोध आया और उनके शरीर से भैरव नामक भयानक पुरुष का प्राकट्य हुआ। रुद्र से भैरव को आदेश दिया कि जाओ तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उस अत्यंत भयानक रौद्र रूप वाले काले रंग के भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को ही काट दिया। ब्रह्मा का वह पांचवां मस्तक बद्रीनाथ के निकट जाकर गिरा, वह स्थान ब्रह्म कपाली के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिसके परिणामस्वरूप भैरव ब्रह्महत्या का पाप लगा। शिव के कहने पर भैरव ने काशी प्रस्थान किया जहां उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली। इसके बाद रुद्र ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।












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