73 बरस के हुए गुलज़ार

Gulzar

आज गुलज़ार 73 साल के हो गए. अपने ख़ूबसूरत गीतों और सधी हुई फ़िल्मों के लिए जाने जाने वाले गुलज़ार आज भी अपने दिलकश गीतों से फिल्म-प्रेमियों का मनोंरंजन कर रहे हैं. गुलज़ार ने हिंदी सिनेमा को निर्देशक के रुप में 'परिचय', 'आंधी', 'मौसम', 'अंगूर', 'नमकीन', 'इजाज़त' और 'माचिस' जैसी फ़िल्में दीं. गीतकार गुलज़ार की फ़िल्मों की तो लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनमें से ताज़ा है इनदिनों सिनेमा हॉल्स में चल रही विशाल भारद्वाज की 'कमीने'.

वैसे तो गुलज़ार ने ढेर सारे हिट गाने लिखे हैं लेकिन 'घरौंदा' का दो दिवाने शहर में, 'गोलमाल' का आनेवाला पल जानेवाला है, 'थोड़ी-सी बेवफ़ाई' के हज़ार राहें मुड़ के देखीं, 'इजाज़त' के मेरा कुछ सामान, 'दिल से' के चल छैंय्या छैंय्या और 'बंटी और बबली' के कजरारे के लिए उन्हें फिल्म फेयर एवार्ड से भी नवाज़ा गया है. 'स्लमडॉग मिलेनियर 'के गाने जय हो के लिए गुलज़ार साहब को मिले ऑस्कर पुरस्कार की धूम से तो सभी वाकिफ़ हैं.

गुलज़ार ने बॉलीवुड में बतौर गीतकार शुरुआत की बिमल रॉय की 1963 में बनी फ़िल्म 'बंदिनी' से. सचिन देव बर्मन के संगीत से सज़ी इस फ़िल्म के लिए उन्होंने लिखा सुपरहिट गाना - मोरा गोरा अंग लइले.

शायरी से इश्क़

गुलज़ार साहब के साथ बीबीसी के ललित मोहन जोशी ने 1991 में एक बातचीत की थी. उस बातचीत में उनसे पूछा कि ये शुरुआत कैसी हुई. तो उन्होंने कहा 'मैं ये क़िस्सा बहुत बार सुना चुका हूं. अब ये बात बासी हो चुकी है"

फिर भी उन्होंने बताना शुरु किया. "जब मैंने पहला गाना लिखा, उस वक़्त मैं बहुत इच्छुक नहीं था. बस एक के बाद दूसरा कदम लिया. फिर मैं शामिल हो गया बिमल रॉय के साथ असिस्टेंट के तौर पर. उन्हीं के यहां 'प्रेम पत्र' बन रही थी. उसमें मैंने सावन की रातों में ऐसा भी होता है" लिखा. फिर 'काबुलीवाला' बन रही थी. उसमें मैंने लिखा - गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां से – बस यही करते करते में फ़िल्म इंडस्ट्री में शामिल हो गया"

बेशक शायरी गुलज़ार का पहला शौक़ है. बात शायरी की चली तो उन्होंने कहा 'शायरी का शौक़ था शेर कहने का शौक था. शायरी अच्छी लगती है. जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं – इट इज़ फर्स्ट लव. शायरी मेरा पहला इश्क़ है."

धुन की अहमियत

ढेरों हिट गाने दे चुके गुलज़ार से बीबीसी ने उस वक़्त पूछा कि क्या नुस्ख़ा है किसी गानें को हिट करने का. गुलज़ार का जवाब था "मुझे यूं लगता है और बड़ी निजी-सी राय है ये मेरी. इसे अगर जांच-भाल के भी देखें...कि जो किसी गाने के पॉपुलर होने का सबसे अहम अंग है - वो मेरे ख़याल में धुन है. उसके बाद फिर दूसरी चीज़ें आतीं हैं – आवाज़ भी शामिल हो जाती है औऱ अल्फ़ाज़ भी शामिल हो जाते हैं. लेकिन मूलत धुन बहुत अहम है." गुलज़ार के जन्मदिन पर हमने उन्हें जानने वाले और उनके साथ काम कर चुके लोगों से भी बात की.

'मेरा कुछ सामान'

1987 में बनी गुलज़ार की नामी फ़िल्म 'इजाज़त' में काम करने वाली अभिनेत्री अनुराधा पटेल बताती हैं कि इजाज़त के वक़्त वो नौजवान थीं और अपने हिसाब से काम करना चाहतीं थीं.

पटेल ने बीबीसी को बताया "लेकिन उन्होंने मुझे बहुत बढ़िया गाइड किया. उन्होंने बताया कि माया का किरदार फ़िल्म में रोना-धोना नहीं करेगा. मैं सब समझ गई और इस वजह शूटिंग के दौरान सब कुछ काफ़ी सहज रहा."

अनुराधा पटेल ने बीबीसी को बताया कि गुलज़ार एक विनम्र और दयालु व्यक्ति हैं और वो अन्य निर्देशको से अलग हैं. उन्होंने कहा कि हिंदी फ़िल्म जगत में उन्होंने बहुत कम संवेदनशील निर्देशकों के साथ काम किया है और गुलज़ार उनमें से एक हैं.

मौसमी की यादें

गुलज़ार निर्देशित शेक्सपीयरकी 'ए कॉमेडी ऑफ़ एरर्स' पर आधारित हिंदी फ़िल्म 'अंगूर' की अभिनेत्री मौसमी चटर्जी बताती हैं कि गुलज़ार एक बढ़िया निर्देशक हैं लेकिन वो बेहतरीन गीतकार हैं. चटर्जी को गुलज़ार का 'ख़ामोशी' के लिए लिखा गाना, प्यार को प्यार ही रहने दो, बेहद पसंद है. मौसमी चटर्जी पुरानी बातें याद करते हुए कहतीं हैं कि गुलज़ार उनकी सास को उर्दू सिखाते थे और उनसे बांग्ला सीखते थे.

'कजरारे'

संगीतकार शंकर महादेवन ने गुलज़ार के साथ 'बंटी और बबली', 'झूम बराबर झूम' फ़िल्में की हैं. शंकर महादेवन ने बीबीसी को बताया कजरारे कंपोज़ करने के बाद हम गुलज़ार साहब से मिले. उन्होंने गाना सुनने के बाद कहा कि उन्हें इसमें ख़तरा दिख रहा है. मैंने पूछा – क्या? उन्होंने कहा कि इस गाने के बहुत बड़ा हिट होने का ख़तरा है. जो उन्होंने कहा वो एकदम सही हुआ." महादेवन कहते हैं कि गुलज़ार से मिलना एक सुखद अनुभव है और उनके साथ काम करना का तजुर्बा ज़िंदगी भर उनके साथ रहेगा.

अनुराधा पटेल ने इस बारे में अपनी बातचीत का समापन करते हुए कहा, "गुलज़ार पर्वतों और घाटियों में ही ख़ूबसूरती नहीं ढ़ूंढते वो घास पर पड़ी ओस की बूंद में भी उसे खोजने की प्रयास करते हैं".

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