Govatsa Dwadashi 2021: जानिए कब है गोवत्स द्वादशी, पूजा की विधि और महत्व
नई दिल्ली, 30 अक्टूबर: कार्तिक मास की अवामस्या से पहले कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी का त्योहार मनाया जाता है। इस साल गोवत्स द्वादशी की पूजा 1 नवंबर (सोमवार) को की जाएगी। गोवत्स द्वादशी पर गाय माता तथा बछड़ों का पूजन किया जाता है। साथ ही व्रत रखने की भी मान्यता है। ऐसी आस्था है कि इस दिन योग्य संतान के लिए गाय माता की पूजा और व्रत किया जाता है।

गोवत्स द्वादशी का पर्व दिवाली की शुरुआत का भी प्रतीक है। इस त्योहार को धनतेरस से एक दिन पहले बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। हर राज्य में इस त्योहार को अलग-अलग नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र में इसे वासु बरस तो गुजरात में इसे वाघ बरस के रूप में मनाया जाता है। उत्तरी राज्यों में गोवत्स द्वादशी को वाघ के रूप में मनाया जाता है, जिसका अर्थ होता है किसी का वित्तीय ऋण चुकाना।
इस साल द्रिक पंचांग के अनुसार गोवस्त द्वादशी का शुभ मुहूर्त शाम 05:51 बजे से रात 08:25 बजे तक है। यह दो घंटे 33 मिनट तक चलता है। वहीं अगर पूजन के लिए घर के आस-पास गाय और बछडा़ नहीं मिले तो गीली मिट्टी से उनकी आकृति बनाकर पूजा करने का भी विधान है। इस दिन में गाय के दूध से बनी चीजों को खाने में प्रतिबंध होता है। हिंदू धर्म में गायों को सबसे पवित्र माना जाता है। इसलिए इस गोवस्त द्वादशी को गायों को वरदान के रूप में आभार देने का दिन है।
इस मंत्र करें जाप
इस दिन गायों को कपड़े पहनाए जाते हैं, उनके लिए फूलों की माला भी बनाई जाती है और पूजा की जाती है। इस दिन मस्तक पर चंदन का तिलक लगाएं। तांबे के बर्तन में पानी, चावल, तिल और फूल मिलाकर क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। मंत्र बोलते हुए गाए के पैरों पर डालें।
गोवत्स द्वादशी का महत्व
गोवत्स द्वादशी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जिसमें से एक प्रचलित कथा के मुताबिक राजा उत्तानपाद और उनकी पत्नी सुनीति ने सबसे पहले इस व्रत किया था। इस व्रत के असर से ही उन्हें भक्त ध्रुव जैसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुईं। इसी के बाद निसंतान दंपती को उत्तम संतान के लिए ये व्रत करना चाहिए। इस दिन गाय की पूजा करने से भगवान विष्णु भी प्रसन्न होते हैं।












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