Ganga Janmotsav 2020: गंगा जन्मोत्सव 30 अप्रैल को, ऐसे पाएं पुण्य फल

नई दिल्ली। करोड़ों भारतीयों की आस्था और जन-जन का पोषण करने वाली पवित्र नदी गंगा की उत्पत्ति वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन हुई थी। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी या गंगा जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष गंगा जन्मोत्सव 30 अप्रैल 2020, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस दिन पुष्य नक्षत्र भी है, इसलिए गुरु-पुष्य का अत्यंत शुभ योग भी इस दिन बन रहा है। गंगा सप्तमी के दिन गंगा पूजा और गंगा में स्नान करने का बड़ा महत्व होता है, लेकिन चूंकि इस बार कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन चल रहा है, इसलिए गंगा नदी में स्नान करना संभव नहीं हो पाएगा। ऐसे में अपने घर में ही नहाने के पानी में गंगाजी का जल डालकर और गंगा का आह्वान करके स्नान करें, पुण्य मिलेगा। कहा जाता है गंगा जन्मोत्सव पर गंगाजी के जल से स्नान करने पर पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इससे जीवन में आध्यात्मिकता और सात्विकता का विकास होता है।

गंगा जन्मोत्सव

गंगा जन्मोत्सव

वेदों-पुराणों में सप्त नदियों का वर्णन आता है, जिनमें गंगा को सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है। गंगा स्वर्ग की नदी है, जिसने भगीरथी के आह्वान पर पहले शिवजी की जटाओं में प्रवेश किया और फिर शिवजी की जटाओं से पृथ्वी का स्पर्श किया। गंगाजी ने जिस दिन प्रथम बार पृथ्वी का स्पर्श किया उस दिन को गंगा जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। हिंदुओं की आस्था में गंगा को देवी का दर्जा प्राप्त है। पितरों के पिंड दान और अस्थियां विसर्जन गंगा में करने से उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। गंगा के किनारे जितने भी नगर बसे हुए हैं, वे सभी तीर्थस्थल बन गए हैं।

गंगा तट पर भरते हैं मेले

गंगाजल को सबसे पवित्र माना जाता है तथा हिंदू धर्म के अनेक संस्कारों में गंगा जल का होना आवश्यक माना गया है। गंगाजल को अमृत समान माना गया है, क्योंकि इसके जल को कितने भी वर्षों तक सहेजकर रखा जा सकता है, वह कभी खराब नहीं होता और उसमें कीड़े आदि नहीं होते। यह बात वैज्ञानिक शोधों से भी सिद्ध हो चुकी है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होता। गंगा से जुड़े अनेक पर्व और मेले वर्षभर आयोजित किए जाते हैं। मकर संक्राति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में स्नान, दान एवं दर्शन करना महत्वपूर्ण होता है। गंगा के तट पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार में गंगा के तट पर प्रतिदिन भव्य पैमाने पर आरती होती है।

ऐसे हुआ था गंगा का जन्म

ऐसे हुआ था गंगा का जन्म

गंगा नदी की उत्पत्ति की अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इसमें एक कथा के अनुसार गंगा का जन्म भगवान विष्णु के पैर से निकले पसीने की बूंदों से हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा का जन्म ब्रह्माजी के कमंडल से हुआ माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार वामन रूप में राक्षसराज बली से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु के चरण धोए और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया और एक अन्य कथा अनुसार जब भगवान शिव ने नारद मुनि, ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जिसे ब्रह्मा जी ने उसे अपने कमंडल में भर लिया और इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ था।

गंगा जन्मोत्सव महत्व

शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा स्वर्ग लोक से शिवजी की जटाओं में पहुंची थी, इसलिए इस दिन को गंगा जन्मोत्सव और गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई थी वह दिन गंगा जन्मोत्सव और जिस दिन गंगाजी ने पृथ्वी का स्पर्श किया था वह दिन 'गंगा दशहरा" (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के रूप में मनाया जाता है।

गुरु-पुष्य का संयोग

गुरु-पुष्य का संयोग

गंगा जन्मोत्सव के दिन गुरुवार है और इस दिन पुष्य नक्षत्र होने से गुरु-पुष्य का संयोग बन गया है। इस दिन दान-पुण्य का बड़ा महत्व होता है। इस दिन गंगाजल डालकर स्नान करें और दान-पुण्य करें। इस दिन गंगा स्तोत्र का पाठ करें।

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