Ekadashi Chalisa in Hindi: एकादशी पर जरूर पढ़ें ये चालीसा, होगा धनलाभ
Ekadashi Chalisa in Hindi: एकादशी के दिन सच्चे मन से 'श्री हरि' की पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा करने से आपके सारे कष्टों को अंत तो होता ही है साथ ही आपकी सारी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं। एकादशी के दिन मां लक्ष्मी जी की पूजा भगवान विष्णु के साथ करने पर आपको धन लााभ तो होगा ही और साथ ही आप हर तरह के सुख के भागीदार बनेंगे।

एकादशी पर पढ़ें भगवान विष्णु की चालीसा
॥ दोहा॥
- विष्णु सुनिए विनय
- सेवक की चितलाय ।
- कीरत कुछ वर्णन करूं
- दीजै ज्ञान बताय ॥
चौपाई
- नमो विष्णु भगवान खरारी,
- कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
- प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,
- त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
- सुन्दर रूप मनोहर सूरत,
- सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
- तन पर पीताम्बर अति सोहत,
- बैजन्ती माला मन मोहत ॥
- शंख चक्र कर गदा विराजे,
- देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
- सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,
- काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
- सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,
- दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
- सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,
- दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
- पाप काट भव सिन्धु उतारण,
- कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
- करत अनेक रूप प्रभु धारण,
- केवल आप भक्ति के कारण ॥
- धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,
- तब तुम रूप राम का धारा ।
- भार उतार असुर दल मारा,
- रावण आदिक को संहारा ॥
- आप वाराह रूप बनाया,
- हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
- धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,
- चौदह रतनन को निकलाया ॥
- अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,
- रूप मोहनी आप दिखाया ।
- देवन को अमृत पान कराया,
- असुरन को छवि से बहलाया ॥
- कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,
- मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
- शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,
- भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
- वेदन को जब असुर डुबाया,
- कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
- मोहित बनकर खलहि नचाया,
- उसही कर से भस्म कराया ॥
- असुर जलन्धर अति बलदाई,
- शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
- हार पार शिव सकल बनाई,
- कीन सती से छल खल जाई ॥
- सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,
- बतलाई सब विपत कहानी ।
- तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,
- वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
- देखत तीन दनुज शैतानी,
- वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
- हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,
- हना असुर उर शिव शैतानी ॥
- तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,
- हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
- गणिका और अजामिल तारे,
- बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥
- हरहु सकल संताप हमारे,
- कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
- देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,
- दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥
- चाहता आपका सेवक दर्शन,
- करहु दया अपनी मधुसूदन ।
- जानूं नहीं योग्य जब पूजन,
- होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥
- शीलदया सन्तोष सुलक्षण,
- विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
- करहुं आपका किस विधि पूजन,
- कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥
- करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,
- कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
- सुर मुनि करत सदा सेवकाई,
- हर्षित रहत परम गति पाई ॥
- दीन दुखिन पर सदा सहाई,
- निज जन जान लेव अपनाई ।
- पाप दोष संताप नशाओ,
- भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥
- सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,
- निज चरनन का दास बनाओ ।
- निगम सदा ये विनय सुनावै,
- पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥
- ॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥
श्री लक्ष्मी चालीसा
दोहा
- मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
- मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
- सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
- ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥
सोरठा
- यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
- सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
||चौपाई||
- सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
- तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
- जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
- तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥
- जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
- विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।
- केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
- कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
- ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
- क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
- चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
- जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
- स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
- तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
- अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
- तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥
- मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
- तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
- और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
- ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
- त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
- जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
- ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
- पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
- विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
- पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
- सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
- बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
- प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
- बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
- करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
- जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
- तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
- मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
- भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
- बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
- नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
- रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
- कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
- रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥












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