Bakrid 2023 Date: 28 या 29 जून कब है 'बकरीद'? क्या है इसका इतिहास और महत्व?
Bakrid 2023 Date:'बकरीद' का त्योहार मुस्लिमों के खास पर्व में से एक है, इसे 'ईद-उल-अजहा' और 'ईद ए कुर्बां' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। इस दिन लोग सुबह-सुबह नहाधोकर नए कपड़े पहनते हैं और उसके बाद मस्जिद में नमाज अता करते हैं।

इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है और फिर उसे दोस्तों, रिश्तेदारों को जरूरतमंदों के बीच बांटा जाता है। आपको बता दें कि ये पर्व 29 जून को इस बार मनाया जाएगा। इसे लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन हो गया लेकिन इसे लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है।
तारीख हर साल बदलती रहती है
बकरीद का पर्व इस्लामिक कैलेंडर Dhu al-Hijjah के 10 वें दिन और 'मीठी ईद' के दो महीने और 9 दिनों के बाद मनाया जाता है इसलिए इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है और इस बार 10वां दिन 29 जून को है। ये पर्व महज एक त्योहार ही नहीं बल्कि ये खुदा के प्रति इंसान का समर्पण और सेवा को भी व्यक्त करता है।
क्यों कहलाता है कुर्बानी का दिन ?
इस पर्व को कुर्बानी का त्योहार कहते हैं। जिसके पीछे एक बहुत खास बात है। मालूम हो कि खुदा के फरिश्ते के रूप में हजरत इब्राहिम ने हमेशा मानव जाति के कल्याण के लिए काम किया था। उन्हें 90 बरस की उम्र में पुत्र रत्न प्राप्त हुआ था, जिसका नाम ईस्माइल था।
मानव जाति के लिए कुर्बानी देनी होगी
लेकिन अक दिन उन्हें रात में सपना आया कि उन्हें मानव जाति के लिए कुर्बानी देनी होगी। उन्होंने इसके बाद बहुत सारे जानवरों की कुर्बानी दी लेकिन उन्हें सपने आने बंद नहीं हुए और इसके बाद उन्हें एक दिन ख्वाब आया, जिसमें उनसे कहा गया कि उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देनी होगी।
ये दिन कुर्बानी को समर्पित
इसके बाद पैंगबर साहब ने इसे खुदा का आदेश माना और अपने बेटे की कुर्बानी के लिए तैयार हो गए। कुर्बानी देते हुए उनका मन ना बदलें इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और कुर्बानी दे दी लेकिन जब उन्होंने पट्टी खोली तो देखा कि बलि वेदी पर उनका बेटा नहीं, बल्कि दुंबा (बकरा) था और उनक इस्माईल सामने स्वस्थ खड़ा था। तब से ही ये दिन कुर्बानी को समर्पित है।
क्यों बांटा जाता है कुर्बानी का बकरा?
क्योंकि शरीयत में कहा गया है कि कुर्बानी के तीन हिस्से करने जरूरी है। इसमें से एक हिस्से को गरीबों में तकसीम करना चाहिए वहीं दूसरा हिस्सा अहबाब यानी मित्रों के लिए होता है और तीसरा हिस्सा घर-परिवार के लिए होता है।
दूसरों के लिए जीना ही इंसानियत है
कुर्बानी ये सिखाती है कि इंसान का जीवन मानव जाति के कल्याण और भलाई के लिए हुआ है। इंसान को हमेशा दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए।












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