जानिए भगवान शिव को रावण ने कैसे किया था प्रसन्न?

नई दिल्ली। असुरराज रावण का समस्त जीवन चर्चाओं का केंद्र बना रहा। अपरिमित गुणों का स्वामी रावण बल, ज्ञान, भक्ति सब में अतुलनीय था। संसार रावण को सदा उसकी बुराइयों के लिए याद करता है, किन्तु रावण की भक्ति और ज्ञान की गहराई इतनी थी, जिसकी थाह पाना असंभव था। स्वयं महाशिव इसके साक्षी हैं क्योंकि रावण उनका परम भक्त था। रावण ने जिस परिमाण में भगवान शंकर की भक्ति की, अपने अतुल्य तप से जिस प्रकार उनको प्रसन्न कर अपना बना लिया, उसकी बराबरी संसार में शायद ही कोई कर पाया हो।

आज रावण की शिवभक्ति से जुड़ा एक सुंदर प्रसंग सुनते हैं...

 जानिए भगवान शिव को रावण ने कैसे किया था प्रसन्न?

यह उस समय की बात है, जब रावण अपने सौतेले भाई कुबेर से सोने की लंका छीन चुका था और अपना स्वर्ण नगर बसा चुका था। इस समय रावण के मन में विचार आया कि वह स्वयम तो स्वर्ण नगरी में रह रहा है, जबकि उसके देवाधिदेव महाशिव कैलाश पर्वत पर कितनी असुविधाओं के बीच रहते हैं। यह विचार आते ही रावण अपने पुष्पक विमान में बैठकर कैलाश पर्वत पर पहुच गया।

रावण का सामना नंदी से हुआ

कैलाश पर्वत पर सबसे पहले रावण का सामना नंदी से हुआ। नंदी ने रावण से आने का प्रयोजन पूछा। रावण ने बताया कि वह भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने के लिए आया है। नंदी ने कहा कि भगवान को कैलाश परमप्रिय है और वे रावण के साथ कभी नहीं जाएंगे। रावण ने कहा कि वह बलपूर्वक भगवान को कैलाश समेत उठाकर लंका ले जाएगा। इसी बात पर नंदी और रावण का युद्ध हो गया और स्वाभाविक रूप से नंदी पराजित हुआ। उधर, सृष्टि के हर क्षण का पूर्वज्ञान रखने वाले महाशिव इस युद्ध को देखकर मुस्कुरा रहे थे। आखिर उनके दो परम प्रिय अनुगामी प्रेम में आकंठ डूब कर उन पर अपना अधिकार जताने के लिए लड़ रहे थे। नंदी को पराजित कर रावण ने अपने बाहुबल से कैलाश को ही धरती से उखाड़ कर एक ओर से उठाया।

रावण की भक्ति से शिव हुए प्रसन्न

इसी समय महाशिव ने अपने पैर का एक अंगूठा उठाकर कैलाश के धरातल पर रख दिया।केवल अंगूठे के स्पर्श मात्र से कैलाश वापस धरती में धंस गया और उसके साथ रावण के हाथ भी दब गए। रावण समझ गया कि महाशिव उससे अप्रसन्न हो गए हैं। उसने तुरंत ही शिव को प्रसन्न करने के लिए क्षणमात्र में रुद्राष्टक की रचना कर डाली और उच्च स्वर में उसका पाठ करने लगा। रावण की भक्ति से शिव जी अति प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देकर उसे लंका वापस भेज दिया।

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