परंपरागत दीपावली बन चुकी है बल्बावली

ये लोग अब परंपरागत व्यवसाय को छोड़कर दूसरे कार्यो में हाथ आजमा रहे हैं। जालंधर के बाबू लाभसिंह नगर में दिये बनाने का काम करने वाली 70 वर्षीया विमला देवी ने बातचीत में बताया कि मिट्टी के दियों की मांग अब नहीं होती है। बिजली से जलने वाले दियों और लडि़यों ने सबसे अधिक हमारे धंधे को चौपट किया है। इन दियों की मांग जितनी पहले होती थी अब उतनी नहीं हो रही है। विमला ने यह भी कहा कि हमने अपने पोतों को इस धंधे में नहीं आने दिया।
हमने उन्हें अलग अलग काम में लगाया है क्योंकि इस धंधे में अब बरक्कत नहीं हो रही है। इससे गुजारा भी मुश्किल से होता है। पहले दीवाली के समय में हमारे पास काम की कमी नहीं होती थी। उन्होंने कहा कि इस हाइटेक युग में अब बच्चे भी हमारा साथ नहीं दे रहे हैं। दूसरी ओर बिजली के सामानों के बाजार में आ जाने के कारण अब लोग दियों को खरीदना पसंद नहीं करते हैं। उनका यह भी कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस साल दियों की बिक्री में तकरीबन 20-25 फीसदी की गिरावट आयी है।
शहर के मधुबन कालोनी इलाके में दियों का कारोबार करने वाले गुरनाम सिंह ने कहा कि मैं बचपन से अपने पिता के साथ इस काम को कर रहा हूं। पिताजी अब नहीं हैं लेकिन हमने इस काम को नहीं छोड़ा क्योंकि यह हमारे परिवार का परंपरागत काम है। वही दूसरी ओर बिजली के सामनों के विक्रेता मुख्तियार सिंह का कहना है बिजली के ऐसे ऐसे उपकरण अब बाजार में आ गए हैं जिन्होंने दियों का स्थान ले लिया है। पहले तो शहर के लोग इन चीजों की खरीदारी करते थे लेकिन अब गांवों से आने वाले भी दियों की बजाए बिजली से जलने वाले दिये और मोमबत्तियां खरीदते हैं।
ग्राहकों का कहना है कि 40 रुपये में दिये भी खरीदे जाते हैं और इतने ही पैसों में झालरों का एक पैकेट भी मिल जाता है। अगर दिया जलाना है तो बिजली के दिये भी उसी कीमत पर मिल जायेंगे। दिये खरीदने के बाद उसमें तेल, बाती आदि डालने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा घरों में दिये जलाने पर कालिख भी लगती है। इसलिए बिजली के ये उपकरण इनकी तुलना में बेहतर हैं। हालांकि बुजुर्ग ग्राहक सरदार सिंह का कहना है कि मिट्टी के दियों का आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है जो बिजली के उपकरणों का नहीं है। दीपावली के मौके पर मिट्टी के दिये लोगों को परंपरा और संस्कृति से जोड़ते है।












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