Diwali Katha: जानिए मां लक्ष्मी कब और कैसे प्रकट हुईं, पढ़ें दिवाली कथा
Diwali Katha:
Diwali Katha: दीपावली का अवसर आते ही जिस शक्ति की उपासना करने, जिसे प्रसन्न करने, जिसकी कृपा पाने के समस्त प्रयासों में सम्पूर्ण संसार जुट जाता है, वे हैं माँ लक्ष्मी। मां लक्ष्मी धन की अधिष्ठात्री देवी हैं। ब्रह्मांड की समस्त ऐश्वर्यता उनसे ही उदित हुई है। संसार की सारी शुभता का मूल मां लक्ष्मी ही हैं। स्वर्ग को श्री प्रदान करने वाली, अमंगल को मंगल में परिवर्तित करने वाली, निर्धन को धन से परिपूर्ण करने वाली ऐसी अद्भुत शक्ति सम्पन्न माँ स्वयं कब और कैसे प्रकट हुईं,

आज जानते हैं-
भारतीय धर्म शास्त्रों में लक्ष्मी माता के प्राकट्य से जुड़ी 2 कथाएं मिलती हैं। पहली कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन की कथा देवराज इंद्र को महर्षि दुर्वासा द्वारा दिए गए श्राप से सम्बद्ध है। इस कथा के अनुसार एक बार ऋषि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को मोतियों का एक दिव्य हार भेंट किया। इंद्र ने वह हार अपने गज ऐरावत के सिर पर सजा दिया। थोड़ी देर बाद वह हार भूमि पर गिर पड़ा और ऐरावत ने उसे पैरों तले रौंद दिया। ऋषि दुर्वासा का क्रोध ब्रह्मांड में ख्यात है। अपने क्रोधी स्वभाव के अनुरूप दुर्वासा जी ने इंद्र को श्राप दिया कि इसी पल से देवता शक्तिहीन और स्वर्ग श्रीहीन हो जाएगा। महर्षि के श्राप ने देवताओं को इतना निर्बल कर दिया कि वे हर युद्ध में दानवों से हारते गए और अपनी रक्षा के लिए छिपते फिरे।
दानवों को अमृत का लालच दिया
देवताओं की यह दुर्दशा देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें दानवों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया। उन्होंने दानवों को अमृत का लालच दिया और समुद्र मंथन में देवताओं का सहयोगी बनने के लिए तैयार कर लिया। इस समुद्र मंथन के द्वारा लगभग 18 दिव्य शक्तियां प्रकट हुईं। इनमें से ही एक थीं माँ लक्ष्मी। माँ लक्ष्मी के प्रकट होने से पूर्व ही सम्पूर्ण लोक स्वर्ण ज्योति से आलोकित हो गया। इसके बाद खिले हुए लाल कमल पर स्थापित स्वर्ण प्रतिमा के रूप में लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं। उन्होंने लाल वस्त्र धारण किए हुए थे और उनका पूरा शरीर स्वर्णाभूषणों से लदा हुआ था। उनके हाथ में स्वर्ण कलश थे, जिनसे स्वर्ण की वर्षा हो रही थी।
ब्रह्मांड को मिली सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी
ऐसी अद्भुत रूपमयी देवी को देखते ही दानवों और देवों में युद्ध छिड़ गया। दोनों ही पक्ष देवी को हस्तगत करना चाहते थे। इस युद्ध का कोई परिणाम न निकलते देख देवताओं के गुरु बृहस्पति और दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने देवी से ही अपना वर चुनने का निवेदन किया। देवी लक्ष्मी ने श्री विष्णु को वरमाला पहनाकर स्वयम्वर पूर्ण किया। इस तरह ब्रह्मांड को धन, वैभव, शक्ति, सौंदर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी प्राप्त हुईं।












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