Dev Deepawali 2023: क्यों मनाई जाती है देव दीपावली? क्या है इसके पीछे का रहस्य?

Dev Deepawali 2023: देव दीपावली का पर्व दिवाली के 15 दिनों बाद मनाया जाता है, जिस दिन ये त्योहार होता है उस दिन कार्तिक पूर्णिमा होती है। इस बार पंचाक भेद होने की वजह से पूर्णिमा आज और कल दोनों दिन है लेकिन आज पूर्णिमा तिथि दोपहर बाद प्रारंभ हुई है।

Dev Deepawali

इसलिए इसका व्रत सोमवार को रखा जाएगा लेकिन दीपावली का पर्व आज ही है, हालांकि कुछ लोग इसे कल भी सेलिब्रेट करेंगे। ये दिन बेहद ही पावन है, कहते हैं इस दिन पूजा करने से इंसान के सारे कष्टों को अंत हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

'त्रिपुरारी' पूर्णिमा और 'त्रिपुरोत्सव'

आपको बता दें कि इस खास पर्व को 'त्रिपुरारी' पूर्णिमा और 'त्रिपुरोत्सव' भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, इस दिन को लोग उत्सव के रूप में मनाते हैं और माना जाता है कि इसी उत्सव में शामिल होने के लिए दुनिया के समस्त देव काशी घाट पर गंगा स्नान के लिए आते हैं और इसके बाद गंगा घाट पर दिवाली मनाते हैं।

काशी के घाटों को दीपों से सजाया जाता है

इसी वजह से इस दिन काशी के घाटों को दीपों से सजाया जाता है और गंगा आरती की जाती है। देवों की दिवाली होने की वजह से ही इसे देव दीपावली कहा जाता है। इस खास दिन भगवान शिव और विष्णु दोनों की पूजा की जाती है। ऐसा करने से दोगुने फल की प्राप्ति होती है और पूजा के अंत में दोनों की आरती की जाती है।

शिव आरती

  • ओम जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • लक्ष्मी, सावित्री पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ओम जय शिव ओंकारा॥
  • त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ओम जय शिव ओंकारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

विष्णु आरती

  • ओम जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता।मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे।अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा। स्वमी पाप हरो देवा।श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे।
  • श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे।

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