पगड़ी वाले मनमोहक गणेशजी के आगे फीका पड़ा ड्रैगन का रंग

Lord Ganesha
भारतीय मूर्तिकारों द्वारा बनाई गई भगवान गणेश की भिन्न-भिन्न सुंदर मुद्राओं वाली मूर्तियों के आगे अबकी दिवाली चीनी ड्रैगन का रंग फीका पड़ता नजर आ रहा है। भारतीय मूर्तिकारों ने गणेश जी की ऐसी आकर्षक रंग रूप वाली मूर्तियां उतार दी हैं कि गॉड फिगर्स के बाजार में चीन से आयातित मूर्तियों की मांग न के बराबर रह गई है। व्यापारियों का कहना है कि इस बार मूर्ति बाजार पर 80 फीसद भारतीय मूर्तियों का कब्जा है। महंगाई की वजह से दाम पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत तक चढ़े हुए हैं, इसके बावजूद मांग में कमी नहीं है।

व्यापारियों का कहना है कि मूर्तियों के बाजार से चीनी दबदबा टूटता दिख रहा है। कुछ साल पहले चीनी विनिर्माता गॉड फिगर्स के बाजार में भी छा गए थे, पर अब उनका गरुर टूट रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला मूर्तियों का हब कहलाता है। बाजार में बिक रही ज्यादातर मूर्तियां मेरठ के मूर्तिकारों द्वारा ही बनाई गई हैं। इसके अलावा कोलकाता से भी कारीगर दिल्ली आकर मूर्तियां बनाते हैं। सदर बाजार के व्यापारी डीसी एंड कंपनी के सुशील अग्रवाल कहते हैं कि बाजार में भगवान गणेश के विभिन्न रूपों के अलावा राम दरबार, शिव परिवार, माता तथा राधा कृष्ण की मूर्तियों की मांग है।

भारतीय मूर्तिकारों ने भगवान गणेश के विभिन्न रूपों और छवियों वाली मूर्तियां पेश की हैं। किसी में गणेश जी तबला बजाते, तो कहीं वायलिन बजाते नजर आ रहे हैं। इन मूर्तियों का दाम 100 रुपये से 3,000 रुपये तक है। अग्रवाल बताते हैं कि इस बार बाजार में पगड़ी वाले गणेश जी भी आ गए हैं, जो पूरी तरह छाए हुए हैं। उन्‍होंने कहा, मूर्तिकारों ने गणेशजी को पगड़ी पहना दी है और ग्राहको में इसका खासा क्रेज दिखाई दे रहा है।

पगड़ी वाले गणेश जी की मूर्तियों का दाम 1,000 रुपये से 1,500 रुपये तक है। स्टैंडर्ड टेडिंग के सुरेंद्र बजाज कहते हैं कि बाजार में इस बार ऐसी भी मूर्तियां आई हैं, जिन्‍हें वॉल हैंगिंग की तरह दीवार पर लगाया जा सकता है। हालांकि ये मूर्तियां कुछ महंगी हैं और थोक बाजार में इनका दाम 500 से 2,500 रुपये तक है। खुदरा बाजार में तो ये मूर्तियां 4,000-5,000 रुपये तक बिक रही हैं। बजाज कहते हैं, दिवाली ऐसा पर्व है, जब महंगाई के बावजूद हमारा माल बिक जाता है।

यह जरूर है कि इस बार कारपोरेट घरानों से आर्डरों में कमी दिखाई दे रही है। कनफेडरेशन आफ सदर बाजार टेड्स एसोसिएशन के महासचिव देवराज बवेजा कहते हैं, कुछ साल पहले चीनी से आयातित मूर्तियां छा गई थीं, क्योंकि भारतीय विनिर्माता टेक्नोलाजी में तो पिछड़ ही रहे थे, साथ ही वे दिवाली की भारी मांग को भी पूरा नहीं कर पा रहे थे। पर अब स्थिति बदल चुकी है। भारतीय मूर्तिकारों ने चीन से बेहतर और सुंदर मूर्तियां बना ली हैं। साथ ही वे बल्क आर्डर भी पूरा कर पा रहे हैं।

बजाज कहते हैं कि दीवार पर लगाई जाने वाली मूर्तियां बेहद आकर्षक हैं। सीनरी की तरह की इन मूर्तियों को लोग हाथों हाथ ले रहे हैं। गणेश जी के अलावा इस तरह की मूर्तियां में कहीं मां यशोदा बाल कृष्ण के पीछे भागती दिख रही हैं, तो कहीं राम दरबार लगा है। एक अन्य व्यापारी का कहना है कि अपना बाजार घटता देख चीन ने इस बार गोल्ड प्लेटेड मूर्तियां पेश की हैं, जो देखने में आकर्षक हैं। इन मूर्तियों का दाम 600-700 से 1,000 रुपये तक है।

बजाज का हालांकि कहना है कि बेशक चीन से आयातित मूर्तियां कितनी भी आकर्षक दिखें, पर खरीदारों की पहली पसंद भारत में बनी मूर्तियां ही हैं क्योंकि भगवान की जैसी मनमोहिनी मूरत आस्था में डूबे देसी मूर्तिकार गढ़ते हैं, वैसी डैगन के देश के मूर्तिकारों के वश की नहीं। एक अन्य व्यापारी ने बताया कि श्रृंगार और साज सज्जा के मामले में भारतीय मूर्तियों का मुकाबला नहीं है। मेरठ में मूर्तियों के श्रृंगार का काम महिलाओं द्वारा किया जाता है।

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