मकर संक्रांति से जुड़ी रोचक बातें, जो शायद आप नहीं जानते

[कला, संस्कृति एवं धर्म] मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है। वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है।

साल 2016 में मकर संक्रांति

स्मार्त विप्र कर्मकांड परिषद के ज्योतिष ज्योतिर्विद पंडित सोमेश्वर जोशी कहते हैं कि मकर राशि में प्रवेश करने के कारण यह पर्व मकर संक्रांति व देवदान पर्व के नाम से जाना जाता है। धर्मसिंधु के अनुसार जिस वर्ष रात्रि में संक्रांति हो तो पुण्य काल दूसरे दिन होता है, उस वर्ष मकर सक्रांति 14 जनवरी को होती है। चूंकि इस वर्ष सूर्य भारतीय समयानुसार 14 जनवरी को आधी रात 1.25 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगा, इसलिये उसका पुण्यकाल 15 जनवरी को ही माना जाएगा। संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को सूर्योदय से सायंकाल 5.26 मिनट तक रहेगा।

पढ़ें- जानिए क्या है संक्रांति का सही मतलब?

मकर सक्रांति मनाए जाने का यह क्रम हर दो साल के अन्तराल में बदलता रहता है। लीप ईयर वर्ष आने के कारण मकर संक्रांति 2017 व 2018, 2021 में वापस 14 जनवरी को व साल 2019 व 2020 में 15 जनवरी को मनाई जाएगी। यह क्रम 2030 तक चलेगा। इसके बाद तीन साल 15 जनवरी को व एक साल 14 जनवरी को सक्रांति मनाई जाएगी। 2080 से 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी।

क्यों होता है ऐसा

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए प्रतिवर्ष 55 विकला या 72 से 90 सालों में एक अंश पीछे रह जाती है। इससे सूर्य मकर राशि में एक दिन देरी से प्रवेश करता हैं। करीब 1700 साल पहले 22 दिसम्बर को मकर संक्रांति मानी जाती थी। इसके बाद पृथ्वी के घूमने की गति के चलते यह धीरे-धीरे दिसम्बर के बजाय जनवरी में आ गयी है।

पढ़ें- मकर संक्रांति पर कैसे बदल सकती है आपकी लाइफ?

मकर संक्रांति का समय हर 80 से 100 साल में एक आगे बढ़ जाता है। 19 वी शताब्दी में कई बार मकर संक्रांति 13 और 14 जनवरी को मनाई जाती थी। पिछले तीन साल से लगातार संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 2017 और 2018 में संक्रांति 14 जनवरी को शाम को अर्की होगी।

मकर संक्रांति से जुड़े पौराणिक कथन स्लाइडर में पढ़ें-

सूर्य-शनि से जुड़ा पर्व

सूर्य-शनि से जुड़ा पर्व

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश करेंगे तथा दो माह तक रहते हैं। शनि देव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

पिता को तिलक लगायें

पिता को तिलक लगायें

सूर्य और शनि की पोजीशन इस दिन बदलती है, लिहाजा इसे पिता पुत्र पर्व के रूप में भी देखा जाता हे इस दिन पुत्र को पिता को तिलक लगाकर स्वागत करना चाहिए।

मलमास समाप्त होता है

मलमास समाप्त होता है

इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्राम्भ होने के कारण लोग दान पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं।

गंगाजी भागीरथ के पीछे आयी थीं

गंगाजी भागीरथ के पीछे आयी थीं

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। इसीलिये इस दिन लोग गंगा स्नान भी करते हैं।

पूर्वजों को तर्पण

पूर्वजों को तर्पण

कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

महाभारत से संबंध

महाभारत से संबंध

महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था।

भगवान विष्णु ने किया असुरों का अंत

भगवान विष्णु ने किया असुरों का अंत

इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

पोंगल

पोंगल

इस त्यौहार को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के रूप में तो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में यह पर्व केवल संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।

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