‘आनंदमठ’ ने जगाई राष्ट्रभक्ति की अलख, साहित्य परिषद की गोष्ठी में गूंजा वंदे मातरम् का संदेश
नई दिल्ली के प्रवासी भवन में शुक्रवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ओर से एक विशेष गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें बंकिमचंद्र चटर्जी की अमर कृति आनंदमठ पर गंभीर चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने की। संचालन दक्षिणी विभाग अध्यक्ष सारिका कालरा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन परिषद के केंद्रीय कार्यालय मंत्री संजीव सिन्हा ने दिया।
राष्ट्रभाव का सशक्त संदेश
परिषद के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मनोज कुमार ने कहा कि 'आनंदमठ' ने भारत माता को सगुण और साकार रूप में स्थापित किया। इस कृति में 'भारत माता की जय' का उद्घोष केवल नारा नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य का आह्वान है। उन्होंने बताया कि उपन्यास में प्रकृति, सौंदर्य और शृंगार का भावपूर्ण चित्रण है, लेकिन उसका मूल स्वर राष्ट्र के प्रति समर्पण है।

जन्मभूमि की रक्षा सर्वोपरि
अध्यक्षीय उद्बोधन में विनोद बब्बर ने कहा कि 'आनंदमठ' एक कालजयी साहित्यिक रचना है, जिस पर समय-समय पर चर्चा होती रही है, लेकिन इसके मर्म पर अभी और चिंतन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इसमें वाल्मीकि रामायण से प्रेरित होकर मातृभूमि की रक्षा को पवित्र कर्तव्य बताया गया है।
स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा
वक्ताओं ने याद दिलाया कि 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास राष्ट्र को देवी और मां के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इसी कृति में शामिल 'वंदे मातरम्' गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बना। उपन्यास के पात्र अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए निजी सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च धर्म मानते हैं।
गोष्ठी में राकेश कुमार, वरुण कुमार, प्रिया वरुण कुमार, सुरेंद्र अरोड़ा, सुनीता बुग्गा, बबीता किरण, मंजुल शर्मा, वेद प्रकाश मिश्र, मनोज शर्मा और ममता वालिया सहित कई साहित्यकारों ने विचार रखे। कार्यक्रम में नीलम राठी, रजनी मान और बृजेश गर्ग समेत बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, शोधार्थी और पाठक मौजूद रहे।












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