Women’s Day: सौ साल बाद भी महिला अधिकारों पर सवाल
Women's Day: अद्भुत साहस, अकाट्य धैर्य और आकंठ वात्सल्य में निमग्न स्त्री-शक्ति, समाज का अभिन्न और आदरणीय अंग है। 8 मार्च को पूरे विश्व में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस स्त्री-शक्ति के सिर्फ सशक्तिकरण की बात नहीं करता अपितु उसकी असाधारण क्षमता की भी याद दिलाता है।
पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा था- "लोगों को जगाने के लिए, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती हैं तो परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।"

वर्ष 1908 से ''ब्रेड और रोज़'' के नारे से शुरू हुआ महिलाओं के जागरण का अभियान, आर्थिक सुरक्षा और बेहतर जीवन का द्योतक था। इतिहास के अनुसार युद्ध के समय महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार के विरोध में प्राचीन ग्रीस में फ्रेंच क्रांति के दौरान इसकी नींव पड़ी। आम महिलाओं द्वारा समानाधिकार की यह लड़ाई शुरू की गई थी। लीसिसट्राटा नामक महिला ने युद्ध समाप्ति की मांग रखते हुए आंदोलन की शुरुआत की, फ़ारसी महिलाओं के समूह ने भी इसी दौरान आंदोलन का बिगुल बजाया था।
1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका द्वारा पूरे अमेरिका में 28 फ़रवरी को महिला दिवस मनाया गया था। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपेनहेगन में महिला दिवस की स्थापना हुई। 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैली निकाली। इस रैली में मताधिकार, सरकारी नौकरी में भेदभाव खत्म करने जैसे मुद्दों की मांग उठी।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रूसी महिलाओं द्वारा पहली बार शांति की स्थापना के लिए फ़रवरी माह के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया गया। यूरोप भर में भी युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। महिलाओं ने हड़ताल किए और अनेक राजनेताओं के विरोध के बावजूद महिलाओं ने आंदोलन जारी रखा। तब रूस के जार को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी और सरकार को महिलाओं को वोट के अधिकार की घोषणा करनी पड़ी।
धीरे-धीरे विकसित देशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नारी दिवस को सार्वभौमिकता प्रदान की। 1913 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 8 मार्च को नारी दिवस मनाया गया। तब से विश्वव्यापी स्तर पर इसी दिन अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस मनाया जाता है।
महिला दिवस का खाका भले ही सौ वर्ष पूर्व खींचा गया हो मगर आकार अब भी दुरुस्त नहीं है। ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो" शायद किस्से, कहानियों, कविताओं, किताबों में है। अधिकांश विचारों - व्यवहारों में नगण्य! आज सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है हम महिला अधिकारों और हितों के पहले-दूसरे पायदान पर ही खड़े हैं। पुरुष-नारी की समानता की लड़ाई में "धुंधली सशक्त महिला" के चित्र का यथार्थ अब भी "गाढ़े रंग में रंगा पुरुषवादी सोच" ही है।
प्रकृति के निरंतर गतिमयता के लिए स्वयं प्रकृति ने जिसका वरण किया है, वह आबादी स्वयं को आधे हिस्से की हकदार नहीं बना पा रही है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि जन्म दात्री आज भी आजन्म खुल कर सांस लेने के लिए तरस रही है। दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी जैसे महिला अपराध की बढ़ती संख्या लैंगिक भेदभाव को तो बताती ही है, साथ में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, भावनात्मक और शैक्षिक अंतर ले आता है जो देश को पीछे की ओर ढ़केलता है।
यह महत्वपूर्ण है कि महिला दिवस का आयोजन सिर्फ रस्म अदायगी भर नहीं रह जाए। हालांकि महिलायें अधिकारों के प्रति काफी सजग हुई हैं। हर क्षेत्र में नित नये आयाम छू रही हैं। पारिवारिक और बाहरी दुनिया के बीच में सामंजस्य बैठकर जिस क्षमता का परिचय आज की नारी दे रही है वह निः संदेह तारीफ़ के योग्य है।
मगर मंजिलें अब भी बहुत दूर है। महिला दिवस या ऐसा कोई भी आयोजन औचित्यहीन है अगर धरातल स्तर पर मानक बदलाव नहीं आ रहे हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध बुनियादी सामाजिक ढाँचे पर कई सवाल कर रही है। गैरमतलब है महिलाओं के आगे बढ़ने में, जहां तक परिवार और पुरुषों का साथ अब प्रत्यक्ष होता जा रहा है।
वहीं महिलाओं के शोषण और कष्टकारी स्थिति के लिए स्वयं स्त्री जाति भी जिम्मेदार है। भावनात्मक रूप में जहां एक स्त्री को दूसरे की तकलीफ समझनी चाहिए, वहां प्रायः स्त्रियां एक दूसरे का साथ छोड़ देती हैं। कई बार समझ नहीं आता कि वात्सल्य से भरे ह्रदय में ईर्ष्या और इतनी कटुता कैसे आ जाती है जो दूसरे के आगे बढ़ने के मार्ग में स्वयं बाधा बन जाती है।
स्त्री की शक्ति और ऊर्जा को पहचानना होगा और उसे उचित व्यवहार और विश्वास देना होगा। आज स्त्री उन्नति पथ पर है। पहाड़ की चोटियों से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुकी है। खेल का मैदान हो या अखाड़ा, मनोरंजन जगत हो या राजनीति, स्त्री अब हर सीमित परिधि के परे विस्तार पा रही है। अपने पंख खोल आसमान में उड़ान भर रही है। वो अपनी क्षमताओं से कई सीमाओं को लांघ तो गई है, परंतु अब भी ये उसके विकास के नन्हें कदम ही हैं। लिंग भेद के मानसिक दासता को समूल नष्ट कर स्त्री को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है।
प्रश्न यह भी उठता है क्या स्त्री की ऊँगली पर गिनने योग्य सफलताओं से समाज प्रगतिशील बनेगा? सामाजिक कुंठाओं को आगे बढ़ने वाली स्त्रियां भी कई बार एक अदृश्य शीशे की चारदीवारी में कैद होती हैं। जिसे देखा तो नहीं जा सकता मगर इस बाधा को वो महसूस जरूर करती हैं ऊर्जा का बड़ा भाग तो बस इस बेड़ियों और अदृश्य दीवारों को तोड़ने में ही खर्च हो जाता है।
जाति, रंग, धर्म, देश, गांव, शहर इन सबसे ऊपर उठकर सम्पूर्ण विश्व की महिलाओं को पुरुषों के बराबरी का अधिकार देना है। यह तभी तक सम्भव नहीं है जब तक ज़ेहनी तौर पर हमारी सोच-समझ में बदलाव ना आ जाए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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