अखिलेश को रोकने से योगी आदित्यनाथ को होगा क्या कोई राजनीतिक लाभ?
नई दिल्ली। अखिलेश यादव को लखनऊ में उड़ान भरने से रोककर क्या योगी आदित्यनाथ की सरकार या बीजेपी को कोई राजनीतिक फायदा होने वाला है? शायद ही कोई कहे कि हां, इससे इन्हें राजनीतिक फायदा होगा। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा किया क्यों गया? अखिलेश को रोकने के बाद से प्रयागराज समेत उत्तर प्रदेश की राजनीति गरम है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर हैं, उद्वेलित हैं। यही स्थिति पश्चिम बंगाल में भी थी। यही सवाल ममता बनर्जी के लिए भी था कि क्या बीजेपी की रैली के लिए इजाजत नहीं देकर या फिर योगी आदित्यनाथ को विमान से उतरने की इजाजत नहीं देकर ममता बनर्जी ने सही किया? क्या इसका कोई राजनीतिक फायदा उन्हें मिलेगा?

ममता-योगी के फैसलों से फायदा तो विपक्ष को ही होगा
दोनों ही उदाहरणों में फायदा विपक्ष को ही मिलता दिखा है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल क्रमश: तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी पर लोकतंत्र का गला घोंटने के आरोप लगे हैं। फिर भी अगर ऐसे फैसले किए गये तो यह सत्ता की हनक है, सत्ताधारी दल के नेता की ठसक है और राजनीतिक सत्ता की सनक है। योगी आदित्यनाथ ने हो सकता है कि अपना बदला पूरा कर लिया। वो बदला जो 2015 में उन्हें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में ऐसे ही एक कार्यक्रम में जाने से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ को अनुमति नहीं दी थी। अखिलेश यादव को अब वो सवाल समझ में आ रहे होंगे कि जो तब उठाए गये थे कि उनके कदम को क्यों नहीं अलोकतांत्रिक कहा जाए। मगर, क्या ममता बनर्जी इस बात को समझने के लिए उस वक्त का इंतज़ार करे जब उनके स्थान पर कोई और मुख्यमंत्री आ जाए?

सत्ता की हनक, ठसक और सनक है अखिलेश को रोकना
इस घटना का दूसरा पहलू ये है कि क्या योगी आदित्यनाथ ये मान कर बैठे हैं कि वो जीवन पर्यंत यूपी के मुख्यमंत्री बने रहेंगे? या यह मान लिया जाए कि न सत्ता की हनक, ठसक और सनक ख़त्म होने वाली है और न विपक्ष की ओर से लोकतंत्र का गला घोंटने वाले डॉयलॉग मरने वाले हैं। योगी आदित्यनाथ ने एक साथ ममता बनर्जी को भी जवाब दिया है और अखिलेश यादव को भी। मगर, ये जवाब राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों किस्म की शालीनता को तहस-नहस करते हैं। योगी आदित्यनाथ ने इस बात की परवाह नहीं की है कि लोकतांत्रिक मूल्यों को चोट पहुंचाने से खुद उनकी सरकार और पार्टी को चोट पहुंचेगी।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में तोड़फोड़, मारपीट और व्यापक आगजनी की आशंका किसी मुख्यमंत्री को हो तो उसके कदम क्या होने चाहिए? क्या एक सरकार एक यूनिवर्सिटी में शांति स्थापित नहीं कर सकती? जो सरकार एक यूनिवर्सिटी में शांति कायम नहीं रख सकती उसे क्या शासन करने का हक होना चाहिए?

कुम्भ के दौरान क्या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं हुए हैं?
इलाहाबाद में कुम्भ चल रहा है और योगी सरकार वहां कोई अशांति नहीं चाहती थी, मुख्यमंत्री का यह तर्क भी गले नहीं उतरता। क्या कुम्भ के दौरान कोई राजनीतिक कार्यक्रम प्रयागराज में नहीं हुए? क्या आगे योगी आदित्यनाथ वहां कोई राजनीतिक कार्यक्रम होने नहीं देगी? या ऐसा है कि केवल उन्हीं कार्यक्रमों को होने दिया जाएगा जिन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार होने देना चाहेगी?

क्या अखिलेश को रोकने से शांति का लक्ष्य पा लिया गया?
शांति भंग नहीं होने की कोशिश कर रही योगी सरकार क्या इस बात को देख नहीं पा रही है कि उसके कदम से पूरे प्रदेश में अशान्ति पैदा हो गयी है? इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में शांति स्थापित करने के लिए सिर्फ अखिलेश यादव को रोकना जरूरी था, यह बात हजम नहीं होती। ममता बनर्जी अपनी पार्टी के प्रमुख हैं, अपनी सरकार के प्रमुख हैं। उनकी मनमानी तो समझ में आती है जिन पर अदालतें अंकुश लगाया करती हैं। मगर, योगी आदित्यनाथ जो मुख्यमंत्री बनते वक्त सांसद थे और जिन्हें बीजेपी आलाकमान के फैसले के बाद मुख्यमंत्री बनाया गया है वो कैसे मनमानी कर सकते हैं? ममता की तरह वे खुद आलाकमान नहीं हैं। ऐसे में क्या योगी की मनमानी में बीजेपी की सहमति है? बीजेपी मानें या न मानें नुकसान योगी आदित्यनाथ का जितना होगा, उससे ज्यादा बीजेपी का होगा। बीजेपी की ओर से लोकतंत्र के सम्मान का दावा इस घटना के बाद कमजोर हो जाता है।
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