Opposition Unity: क्या विपक्षी एकता से भाजपा को होगा नुकसान?

एक तरफ मल्लिकार्जुन खड़गे कह रहे हैं कि कांग्रेस किसी को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं करेगी।दूसरी तरफ राहुल को पर्दे के पीछे से प्रोजेक्ट करने की कोशिशें जारी हैं। इसलिए विपक्षी एकता में बार बार अड़चन आ जाती है।

Will the opposition unity harm the BJP

24 अप्रैल को ममता बनर्जी ने पहली बार यह संकेत दिया है कि वह लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और यहां तक कि वामपंथी दलों के साथ भी सीट एडजस्टमेंट कर सकती हैं। वैसे यह बात गले नहीं उतरती, लेकिन उन्होंने कहा है कि भाजपा के सामने एक ही उम्मीदवार खड़ा हो, इसके पूरे प्रयास किए जाएंगे। ममता बनर्जी विपक्षी एकता में सबसे बड़ी अड़चन रही हैं, अभी पूर्वोतर में हुए तीन राज्यों के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने विपक्षी दलों कांग्रेस और सीपीएम को काफी नुकसान पहुंचाया। इससे पहले गोवा में तृणमूल कांग्रेस के साथ साथ आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया था।

आम आदमी पार्टी विपक्षी एकता में दूसरी बड़ी अड़चन है, जिसने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस से सत्ता छीनने के बाद गुजरात में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। इसीलिए 12 अप्रेल को मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात के बाद अगले ही दिन नीतीश कुमार आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मिले थे। अब 24 अप्रेल को लखनऊ में अखिलेश यादव से और कोलकाता में ममता बनर्जी से मिले। उनके साथ लालू यादव के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी थे।

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नीतीश कुमार की अगली मुलाक़ात तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव से होगी, जो विपक्षी एकता में तीसरी बड़ी अड़चन हैं। लेकिन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक विपक्षी एकता में कहीं फिट नहीं बैठते। फिलहाल दोनों भाजपा और कांग्रेस से बराबर की दूरी का नारा लगाते हुए मोदी सरकार के साथ खड़े दिखाई देते हैं।

विपक्षी एकता से भाजपा को कितना नुकसान होगा, या कुछ फायदा होगा, इस चुनावी गणित को समझना आसान नहीं। विपक्षी एकता शब्द लगता बहुत अच्छा है, लेकिन कई जगहों पर यह भाजपा के लिए फायदे का सौदा भी हो सकता है। इसलिए नरेंद्र मोदी सभी विपक्षी दलों को खुली चुनौती दे रहे हैं।

तीनों ही क्षेत्रीय दलों के नेताओं पर सीबीआई और ईडी के छापे पड़ रहे हैं, इन छापों से इन तीनों दलों के अनेक नेता भ्रष्टाचार में गिरफ्तार हुए हैं, अनेकों के ठिकानों से धन का अंबार मिला है। विपक्षी एकता अभी हुई नहीं है, बैठकों का दौर जारी है, प्रयास हो रहे हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने विपक्षी एकता के बारे में एक नेरेटिव पहले से बनाना शुरू कर दिया है कि यह राजनीतिक गठबंधन नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचारी एकजुट हो रहे हैं। विपक्षी एकता से संदेश भी यह जा रहा है कि क्योंकि मोदी सरकार ने विपक्षी नेताओं के भ्रष्टाचार पर हमले शुरू किए हुए हैं, इसलिए सभी का लक्ष्य किसी न किसी तरह मोदी को सत्ता से बाहर करने के लिए ही विपक्षी एकता की कोशिश हो रही है।

दूसरा सवाल यह भी है कि क्या सचमुच विपक्षी एकता होने से भाजपा हार जाएगी। चलिए पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब और तेलंगाना की ही बात करते हैं। ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल और के. चन्द्रशेखर राव इन चारों राज्यों में सत्तारूढ़ हैं। इन तीनों नेताओं की अपनी अपनी जेबी पार्टियां हैं, जिनका अपने अपने राज्य में अच्छा खासा प्रभाव है, लेकिन इन चारों राज्यों में तीनों दलों की मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस है। अगर वे कांग्रेस से चुनावी गठबंधन करती हैं, और अपने अपने राज्य में कुछ कुछ सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ देती हैं, तो फायदा किसको होगा।

क्या दिल्ली में आम आदमी पार्टी का वोट कांग्रेस को जाएगा, क्या तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति का वोट कांग्रेस को जाएगा। क्या पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का वोट कांग्रेस को ट्रांसफर होगा। ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस विरोध का वोटर भाजपा की तरफ शिफ्ट हो जाएगा। इन सभी राज्यों में पहले कांग्रेस का दबदबा रहा है, दिल्ली को छोड़कर कहीं भाजपा का दबदबा नहीं रहा।

जहां तक दिल्ली का सवाल है तो लोकसभा की सभी सीटें तो पिछले दो चुनावों में भाजपा ही जीती है, लेकिन विधानसभा में पिछले 25 साल से भाजपा नहीं जीती। कुछ राज्यों में कांग्रेस विरोधी वोटर इसलिए क्षेत्रीय दलों के साथ हैं, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। जहां तक लोकसभा चुनाव का सवाल है तो उनके पास भाजपा का विकल्प है।

दिल्ली, बंगाल और तेलंगाना की राज्य विधानसभाओं में मामूली प्रभाव होने के बावजूद 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रभावशाली प्रदर्शन दिखाया। इसलिए यह केवल एक धारणा है कि विपक्षी एकता कोई बहुत बड़ा बदलाव कर सकती है।

पहले के ऐसे अनेक अनुभव हैं कि विपक्षी दलों के वोट एक दूसरे को ट्रांसफर नहीं होते। जैसे उत्तर प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है। पिछ्ला लोकसभा चुनाव बसपा और सपा ने मिलकर लड़ा था। भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए इससे बड़ी कोशिश और क्या हो सकती थी। माना जा रहा था कि इन दोनों के हाथ मिला लेने से भाजपा को करारा झटका लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भाजपा की आंधी चली और गठबंधन हवा हो गया। भाजपा ने राहुल गांधी की पारंपरिक पारिवारिक सीट अमेठी को भी छीन लिया और कांग्रेस सोनिया गांधी की एक रायबरेली सीट पर ही जीत सकी।

यूपी के प्रयोग को इस बार विपक्ष पूरे देश में दोहराना चाहता है। कांग्रेस विपक्षी एकता के प्रयासों में जुटी है, कांग्रेस को कर्नाटक विधानसभा चुनावों से बहुत उम्मीदे हैं। अगर कांग्रेस और जेडीएस मिलकर सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं, तो यह देशभर में विपक्षी एकता के लिए बड़ा मौक़ा होगा। इसलिए कांग्रेस ने 30 अप्रेल को होने वाली विपक्षी दलों की बैठक को टाल दिया गया है। अब अगली बैठक 10 मई को कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद ही होगी। शायद यह बैठक बिहार में होगी और उस का न्योता नीतीश कुमार देंगे।

कांग्रेस नीतीश कुमार को आगे कर रही है, वह एक तरह से विपक्षी एकता का चेहरा बन गए हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय यह काम पहले शरद पवार कर रहे थे। कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि संसद सत्र के दौरान हुई बैठकों में जिन 19 राजनीतिक दलों ने एकता दिखाई थी, वे सभी दल गठबंधन के लिए राजी हो जाएंगे। इसलिए राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इन सभी 19 दलों के नेताओं के साथ वन-टू-वन मुलाकातों की रणनीति बनाई है।

कांग्रेस इस बार विपक्षी एकता के लिए बहुत ज्यादा गंभीर इसलिए भी है कि अगर यह चुनाव भी कांग्रेस हार गई, तो कांग्रेस बिखर जाएगी। विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष भी गांधी परिवार से बाहर से दक्षिण के एक दलित को बनाया है। पहले गांधी परिवार से नफरत करने वाले कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस से बात करने से भी कतराते थे।

कांग्रेस ने यह भी कह दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद के लिए किसी का चेहरा सामने नहीं रखेगी। हालांकि राहुल गांधी से 3500 किलोमीटर की पदयात्रा करवा कर कांग्रेस ने उनका कद विपक्षी दलों के कद्दावर नेताओं से बड़ा बनाने की कोशिश की है। कांग्रेस समर्थक मीडिया ने भी लिखना शुरू कर दिया है कि लोकसभा सदस्यता से बर्खास्त किए जाने के बाद राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ी है।

एक तरफ मल्लिकार्जुन खड़गे कह रहे हैं कि कांग्रेस किसी को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं करेगी। दूसरी तरफ राहुल गांधी को पर्दे के पीछे से प्रोजेक्ट करने की कोशिशें जारी हैं। इसलिए विपक्षी एकता में बार बार अड़चन आ जाती है। 13 अप्रेल को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात कर के मुम्बई लौटे शरद पवार ने अगले ही दिन कांग्रेस के एजेंडे की हवा निकाल दी। अब उन्होंने यहां तक कह दिया है कि महाराष्ट्र में भी महाविकास अघाडी मिल कर चुनाव लड़ सकेगी या नहीं, अभी नहीं कहा जा सकता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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