Punjab BJP: क्या भाजपा पंजाब में सिखों का समर्थन भी जुटा पाएगी?

पंजाब में अकाली दल के साथ भाजपा का गठबंधन जनसंघ के जमाने से पचास साल से भी लंबा रहा। यह गठबंधन एक तरह से हिंदुओं और सिखों का गठबंधन माना जाता था, क्योंकि अकाली दल सिखों की नुमाइंदगी करता है, और भाजपा हिन्दुओं की।

भाजपा और अकाली दल ने 2022 में पहला विधानसभा चुनाव अलग अलग लड़ा, जिसमें अकाली दल की ऐसी दुर्गति हुई कि वह कभी सोच भी नहीं सकता था। एक आध बार को छोड़ दें, तो भाजपा में पहले भी एक से लेकर सात विधायक बनते थे, इस बार भी दो ही बने थे, लेकिन अकाली दल जो कभी तीस सीटों से कम नहीं जीता था, वह तीन सीटों पर आ गया।

Will BJP be able to garner the support of Sikhs in Punjab

अकाली दल और भाजपा दोनों दलों के एक वर्ग को एहसास है कि दोनों को मिलकर लड़ना चाहिए, लेकिन इस पर भाजपा में पूरी तरह सहमति नहीं है, इसके बावजूद भाजपा ने अपनी शर्तों पर दुबारा गठबंधन के लिए अकाली दल से बातचीत शुरू की थी।

बदली परिस्थियों में भाजपा ने लोकसभा की सात सीटों की मांग रखी थी, जिनमें पहले से उसके कोटे वाली अमृतसर, होशियारपुर और गुरदासपुर के अलावा चार शहरी सीटें पटियाला, लुधियाना, जालन्धर और आनंदपुर साहिब शामिल थीं। लेकिन अकाली दल तीन की जगह ज्यादा से ज्यादा चार सीटें देने को तैयार था।

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बातचीत टूट गई, तो अब भाजपा ने सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है, होशियार और आनंदपुर साहिब को छोड़कर भाजपा ने छह सीटों पर उम्मीदवारों का एलान भी कर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले दो सालों में आम आदमी पार्टी का प्रभाव कम होना शुरू हुआ है, लेकिन कांग्रेस या अकाली दल उसकी जगह नहीं ले रहे, क्योंकि इन दोनों दलों की सरकारों के भ्रष्टाचार से पंजाब की जनता का मन पहले ही भर चुका है।

इस बीच बड़ी तादाद में सिख भाजपा से जुड़े हैं। मोदी ने पंजाब में भाजपा की हिन्दुओं की पार्टी होने की छवि उसी तरह बदलने की रणनीति बनाई है, जैसे उन्होंने देश भर में बनी ब्राह्मण बनियों की पार्टी की छवि तोड़ कर ओबीसी पार्टी की छवि बना दी है। सिखों के बड़ी तादाद में जुड़ने के बाद भाजपा पंजाब में कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर रही है, जो आम आदमी पार्टी को सीधी टक्कर देने की स्थिति में आती नजर आ रही है।

अकाली दल से बातचीत टूटने के बाद भाजपा ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में बड़ी सेंधमारी शुरू की है। आम आदमी पार्टी के जालन्धर के सांसद और घोषित उम्मीदवार सुशील कुमार रिंकू दलबदल करके भाजपा के उम्मीदवार हो गए हैं। कांग्रेस की पटियाला की सांसद परनीत कौर और लुधियाना के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू भी भाजपा के उम्मीदवार हो गए हैं।

अमृतसर में इस बार भाजपा ने अमेरिका में भारत के राजदूत रहे तरनजीत सिंह संधू को उम्मीदवार बनाया है, ये चारों ही भाजपा ज्वाइन करते ही टिकट पा गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए और दिल्ली से भाजपा टिकट पर जीत कर सांसद बने हंस राज हंस को फरीदकोट सीट से टिकट दिया है।

भाजपा ने संघ बैकग्राउंड का सिर्फ एक उम्मीदवार दिया है, वह हैं गुरदासपुर से दिनेश सिंह बाबू। इस तरह अब तक जो छह उम्मेदवार घोषित किए गए हैं, उनमें तीन हिन्दू और तीन सिख हैं। पिछले दो सालों में बड़ी तादाद में कांग्रेस से जुड़े सिख नेताओं के भाजपा में आने के कारण इस लोकसभा चुनाव में भाजपा पहली बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विकल्प के रूप में हिन्दुओं और सिखों की पार्टी के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है।

चौकोने मुकाबले में भाजपा के विस्तार की संभावनाएं बढ़ गई हैं, इसीलिए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के तीन सांसद अपनी अपनी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं। भाजपा को चार से छह सीटें जीतने की उम्मीद है। अगर ऐसा हो जाता है, तो वह अगले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगी।

भाजपा को अब तक पंजाब में हिन्दुओं की पार्टी के रूप में देखा जाता था, इसलिए पूरे पंजाब में वह अपना विस्तार कभी नहीं कर सकी। दूसरी तरफ अकालियों को सिखों की पार्टी के रूप में देखा जाता है। इस का भी लंबा इतिहास है।

अकालियों की पंजाबी सूबा मांग के समय जनगणना के दौरान पंजाब के हिन्दुओं ने आर्य समाज के प्रभाव में आकर अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखवाई थी। पंजाब का जन संघ भी आर्य समाज के प्रभाव में आ गया था क्योंकि उस समय भी जनसंघ का प्रभाव पंजाब के हिन्दुओं में ही था। हालांकि पंजाब के हिन्दुओं के घरों में पंजाबी ही बोली जाती थी।

तब पंजाब में तीन ही पार्टियां थीं, अकाली दल, कांग्रेस और जन संघ। बाद में जब भाषा के आधार पर पंजाबी सूबा बना तो पंजाबी भाषी पंजाब में जन संघ सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी बन कर ही रह गई। पंजाब राज्य गठन के बाद 1967 में जब त्रिशंकु विधानसभा आई तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए सिखों की पार्टी अकाली दल और हिन्दुओं की पार्टी जन संघ ने मिल कर सरकार बनाई।

तब से एक आध बार को छोड़ कर अकाली-जनसंघ गठबंधन हिन्दू सिख एकता का प्रतीक बन गया। चुनावों के समय सीटों का बंटवारा होता रहा, लेकिन तीन दशक पहले हुए समझौते में लोकसभा की तीन हिन्दू बहुल सीटें अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर भाजपा को दी गईं और बाकी सीटें अकाली दल ने अपने पास रखीं, इसी तरह 117 में से 23 सीटें भाजपा को मिली और बाकी 94 अकाली दल ने खुद के पास रखी।

2002 के परिसीमन के बाद अमृतसर हिन्दू बहुल सीट नहीं रह गई। इसलिए भाजपा ने 2004 से वहां सिख उम्मीदवार देना शुरू किया। 2004, 2007 (उप चुनाव) और 2009 में वहां लगातार भाजपा के नवजोत सिंह सिद्धू जीते, लेकिन जैसे ही 2014 में भाजपा ने अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतारा, देश भर में मोदी और भाजपा लहर के बावजूद वह हार गए। तब से भाजपा गुरदासपुर और होशियारपुर सीटों तक सीमित हो गई।

गुरदासपुर सीट बचाने के लिए भी भाजपा फ़िल्मी हस्तियों का सहारा लेती रही, 2009 में तो विनोद खन्ना की उम्मीदवारी के बावजूद भाजपा कांग्रेस के सिख उम्मीदवार प्रताप सिंह बाजवा से हार गई थी। विनोद खन्ना के देहांत के बाद जब भाजपा ने फ़िल्मी सितारे के बिना उप चुनाव लड़ा, तब भी कांग्रेस के सुनील जाखड़ जीत गए थे।

विधानसभा चुनावों की दृष्टि से भाजपा प्रदेश की सिर्फ 23 सीटों में सीमित हो गई, बाकी 94 सीटों के हिन्दू कांग्रेस के साथ जुड़ गए, इसलिए पंजाबी सूबे के बावजूद पंजाब में अकाली दल के मुकाबले कांग्रेस मजबूत स्थिति में रही। पंजाब प्रदेश भाजपा में विस्तार की छ्टपटाहट हमेशा से रही है, लेकिन भाजपा के आलाकमान ने अकाली दल से गठबंधन तोड़ने की हिम्मत कभी नहीं दिखाई।

अकाली दल ने 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में खुद ही भाजपा का साथ छोड़ दिया था, 2022 का विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने अलग अलग लड़ा। लेकिन इस बीच आम आदमी पार्टी तीसरे विकल्प के रूप में उभर आई और 2022 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की तीनों परंपरागत पार्टियों की दुर्गति हो गई। आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीत कर रिकार्ड कायम किया, जबकि कांग्रेस 18, अकाली दल बसपा से गठबंधन करके तीन सीटों पर सिमट गई, अकेले चुनाव लड़कर भाजपा दो सीट पाई थी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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