Dalit Literature: दलित साहित्य में दलित लड़कियों के दमन पर चुप्पी क्यों?
कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है एवं उसमें समाज का वह पक्ष परिलक्षित होता है, जो सामान्य लोग नहीं देख पाते हैं। लेकिन दलित साहित्य में दलित लड़कियों की पीड़ा को लेकर ही भेदभावपूर्ण चुप्पी क्यों है?

Dalit Literature: साहित्य जगत में भी कई प्रकार के वर्गीकरण है, जिनमें स्त्री साहित्य, दलित साहित्य या दलित स्त्री लेखन वर्तमान में मुख्य हैं। भारत में दलित लेखन का आरम्भ हाल का परिदृश्य नहीं है बल्कि वर्ष 1980 तक यह अपनी अवधारणाओं का विकास कर चुका था। कथित ब्राह्मणवाद से लड़ने की तैयारी थी और उसके समानांतर साहित्य की एक ऐसी लकीर खींचनी थी, जो वास्तविक साहित्य हो।
यह कहा गया कि दलित अस्मिता विमर्श में तमाम छोटे बड़े अन्तर्निहित संघर्षों एवं दमन का प्रतिकार होगा, उसमें स्त्री शोषण की उन रणनीतियों का अंत होगा, जो अब तक चलती आई हैं। इस विमर्श के अंतर्गत जो व्यवस्था होगी वह शोषणरहित, समतामूलक एवं वर्तमान व्यवस्था से कहीं अधिक मानवीय होगी। दलित साहित्य की जो भी रचनाएँ प्राप्त होती हैं, जिन पर विमर्श होता है या जिन्हें अंतरराष्ट्रीय विमर्श के दायरे में लाया जाता है, वह सभी कथित रूप से उस शोषण का आख्यान होती हैं, जो सदियों तक कथित उच्च वर्ण ने उन पर किया।
परन्तु साहित्य का अर्थ मात्र अतीत में ही रहना नहीं होता है, जैसा वर्ष 1935 में प्रगतिशील साहित्य मंच की स्थापना के समय कहा गया था कि "भारत का समाज बदल रहा है। भूख, और गरीबी, सामाजिक पिछड़ापन आदि की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं और हमें अब तार्किक होकर सोचने की आवश्यकता है। हमें हर संस्था और प्रथा को तर्क की दृष्टि से देखना है, जिससे हम स्वयं को परिवर्तित कर सकें और व्यवस्थित कर सकें और हम इसे प्रगतिशील साहित्य के रूप में स्वीकार करते हैं।"
अर्थात प्रगतिशील साहित्य में उसी को प्रगतिशील कहा गया है जो तर्क के आधार पर यथार्थ पर बात करे। वर्तमान में जो विमर्श उत्पन्न हो रहा है, उसमें दलित और स्त्रियों की पीड़ा का कारण क्या है? और सबसे बढ़कर कि क्या उन पीड़ाओं को विमर्श में स्थान मिल पा रहा है, जिसका सामना आज दलित लड़कियां कर रही हैं?
ऐसे बहुत प्रश्न बार-बार इसलिए उठते हैं क्योंकि पिछले दिनों दिल्ली में साहिल द्वारा साक्षी की हत्या कर दी गयी। साक्षी स्वयं उसी दलित वर्ग से आती थी जिसके विमर्श के लिए दलित साहित्य का समानांतर उदय हुआ। परन्तु अभी तक साक्षी की हत्या पर वह दलित विमर्श सामने नहीं आया, जो आना चाहिए था। साक्षी की साहिल द्वारा हत्या पर साहित्य की उस धारा की चुप्पी हैरान करती है जो कथित रूप से शोषण रहित एवं समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहता है।
यह समतामूलक समाज की स्थापना करने वाला दलित साहित्य श्रद्धा वॉलकर की निर्मम हत्या पर भी मौन ही रह जाता है। उसकी लाश के टुकड़ों पर भी इस दलित साहित्य का मौन नहीं टूटता है। श्रद्धा हो या फिर साक्षी, क्या इनकी हत्याएं किसी भी प्रकार का विमर्श उत्पन्न नहीं करती हैं? ऐसा नहीं है कि यह वंचित समुदाय की लड़कियां नहीं थीं। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में आदित्य जाटव ने अपनी बहन आराधना की आत्महत्या के मामले में अनवर खान पर प्राथमिकी दर्ज कराते हुए लिखा था कि दो शादी कर चुके अनवर ने आराधना को अपने प्रेम जाल में फंसा लिया था और उस पर जबरन धर्मांतरण का दबाव डाल रहा था। इसके चलते आराधना ने आत्महत्या कर ली।
ऐसी एक नहीं तमाम घटनाएं हैं, जो लगातार घट रही हैं। साहित्य निरंतरता का नाम है। जो वर्तमान में घट रहा है, उसे जस का तस बिम्ब के माध्यम से उकेरे जाने का नाम है साहित्य, जिससे आने वाले समय के लिए प्रसंग एवं सन्दर्भों का साहित्य के माध्यम से निर्माण हो सके। ऐसा हर काल में हुआ है और होता आ रहा है। स्वतंत्रता संग्राम को लेकर असंख्य रचनाएं हुई हैं। यदि आज झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के विषय में कुछ पढ़ना हो तो बिना प्रयास ही सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम स्मरण हो जाता है जिन्होंने 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' लिखा था।
परन्तु जब हम इस कालखंड में हो रही इन घटनाओं के लिए लिखी गयी रचनाओं को खोजेंगे तो हमारे हाथ में शून्य ही लगेगा, क्योंकि इन घटनाओं को वैश्विक विमर्श के अनुसार लिखा ही नहीं जा रहा है, जबकि यह तमाम घटनाएँ उसी वैश्विक समस्या का हिस्सा हैं, जिसे ग्रूमिंग गैंग का नाम दिया गया है और कई देश अब इस ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ कदम उठा रहे हैं। भारत का दलित स्त्री लेखन अपनी ही बहनों की उन तमाम पीड़ाओं से परिचित क्यों नहीं होना चाहता है यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। यह सीधे तो सीधे उस दलित अस्मिता पर ही प्रहार है जिस अस्मिता लेखन की दलित साहित्यकार बात करते हैं।
क्या दलित स्त्रियों के साथ हुआ शोषण मात्र तभी शोषण माना जाएगा जब उनका शोषण किसी राजनीतिक एजेंडे को पोषित करेगा? दलित साहित्य में स्त्रियों को किस रूप में देखा जाता है, इस पर भी बात होनी चाहिए! हालांकि अभी यह विषयांतर हो जाएगा। क्योंकि यहाँ पर मात्र प्रश्न यह है कि क्यों वंचित समुदाय की कोई भी किशोरी जो किसी सैफ अली सलीम का शिकार पाटन में वर्ष 2022 में होती है, उसके साथ हुए छल का विमर्श दलित स्त्री लेखन में मूल समस्या के साथ स्थान नहीं पा रहा है?
यदि इक्का दुक्का आवाज उठती भी है तो वही पितृसत्ता आदि को लेकर उठती है, परन्तु जबरन धर्मांतरण के विरोध में आत्महत्या, सड़क पर साक्षी की हत्या या फिर श्रद्धा वॉकर के हत्यारे का नाम लेकर दलित विमर्श क्यों नहीं बनता? क्यों बुलंदशहर में रह रही अनुसूचित जाति की एक महिला के साथ समुदाय विशेष का एक व्यक्ति नाम बदलकर हर प्रकार का छल करता है और फिर जब उसका धर्म परिवर्तन करा कर भाग गया और शादी की बात करने पर जातिसूचक टिप्पणियाँ करते हुए शादी से इंकार कर दिया, तो यह पीड़ा इसी स्वरुप में दलित साहित्य में क्यों स्थान नहीं पाती है?
एक समतामूलक समाज में स्त्रियों के स्थान और पीड़ा पर शोषणकर्ता के मजहब के आधार पर भेदभाव एवं दुराव छिपाव उचित नहीं है। यह उस पूरे विमर्श की सार्थकता पर ही जैसे प्रश्न चिह्न लगा देता है जिसे दलित साहित्य का विमर्श कहा जाता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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