Uniform Civil Code Debate: कॉमन सिविल कोड का आखिर मुसलमान ही क्यों विरोध करता है?

सिर्फ भारत ही नहीं इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में जब कॉमन सिविल कोड की मांग उठती है तो मुसलमान उसका विरोध करते हैं। आखिर ऐसा क्या कारण है कि भारतीय उपमहाद्वीप का मुसलमान अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक वह कॉमन सिविल कोड का विरो

 Muslim

भारत में हिन्दू बहुसंख्यक होकर कॉमन सिविल कोड की मांग करता है और मुस्लिम अल्पसंख्यक के नाम पर विरोध। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दू कॉमन सिविल कोड की वकालत करता है जबकि बहुसंख्यक मुसलमान इसको सिरे से खारिज कर देता है। इसलिए सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि कॉमन सिविल कोड की मांग या विरोध अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के सिद्धांत से परे है। वास्तविकता यह है कि मुसलमान अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक, वह समान नागरिक कानूनों को कभी स्वीकार नहीं करता।

वह जहां अल्पसंख्यक है वहां अल्पसंख्यक के नाम पर अपने शरई कानूनों की रखवाली करता है लेकिन जहां बहुसंख्यक है वहां गैर मुस्लिमों को अपने बराबर नागरिक अधिकार देने से मना कर देता है। दुनिया के ज्यादातर वो देश जहां मुसलमान बहुसंख्यक है वहां कुरान और हदीसों की शरई रोशनी में संविधान या कानून बना दिये गये हैं। इसलिए मुसलमान अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक कभी भी गैर मुस्लिमों को अपने बराबर मानने को तैयार नहीं होता।

जब आप इसको समझने जाएंगे तो पायेंगे कि इस्लाम में गैर मुस्लिमों को लेकर बहुत खराब बातें कही गयी हैं जबकि मुसलमानों को संसार की सबसे आला दर्जे की कौम ठहराया गया है। कुरान में गैर मुस्लिम इंसान को नजिस (गंदा, नापाक), काफिर (अल्लाह और नबी पर ईमान न लानेवाला) मुशरिक (मुर्तिपूजा करनेवाला) बदतरीन मखलूख (सबसे खराब प्रजाति) कहा गया है। स्वाभाविक है अपने कुरान की हर बात माननेवाला मुसलमान यह बात अच्छी तरह से जानता है कि गैर मुस्लिम उसके लिए क्या हैसियत रखते हैं। ऐसे में भला वह उनके समान नागरिक अधिकारों पर कैसे राजी हो सकता है?

इसलिए मुसलमान जहां अल्पसंख्यक है वहां किसी न किसी तरीके से समान नागरिक अधिकारों का विरोध करता है। इसके लिए वह हमेशा यह तर्क देता है कि उस देश का संविधान उसके नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है। लेकिन वह यह बात कभी जाहिर नहीं होने देता कि असल में वह गैर मुस्लिमों को गंदा और नापाक तथा अपने आप को श्रेष्ठ समझता है। वह अपने इस्लामिक रिवाजों को बाकी समाजों के रीति रिवाज से श्रेष्ठ मानता है। वह ऐसा मानता है कि वह जो जीवन जी रहा है वैसा जीवन जीने के लिए उसके अल्लाह ने खुद कुरान में हुक्म दिया है।

अगर मुसलमान गैर मुस्लिम के बराबर नागरिक अधिकारों को स्वीकार कर लेगा तो यह उसका अपने अल्लाह के साथ किया गया गुनाह होगा। इसीलिए जहां वह बहुसंख्यक है, वहां वह गैर मुस्लिम को कभी मुसलमानों के बराबर दर्जा दे ही नहीं सकता। जहां अल्पसंख्यक है वहां संविधान की आड़ में अपनी इस्लामिक शरीयत का बचाव करता है। इस मामले में एक बार टीवी शो में जब पाकिस्तान के इस्लामिक जानकार डॉ इसरार अहमद से सवाल किया गया तो उन्होंने साफ कहा था कि पाकिस्तान में अकलियत (अल्पसंख्यकों) को कभी भी मुसलमानों के बराबर अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि जिस दिन पाकिस्तान में सही मामलों में इस्लामिक शरीयत लागू हो जाएगी, सभी गैर मुस्लिमों को दोयम दर्जे का शहरी (नागरिक) बना दिया जाएगा।

सुनने में शायद बुरा लगे लेकिन डॉ इसरार अहमद कुछ भी गलत नहीं बोल रहे थे। पाकिस्तान बनाने के बाद वहां का जो संविधान बनाया गया उसमें इस्लामिक सिद्धांतों का पूरा पालन किया गया। पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 41 और 91 में क्रमश: राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद के लिए गैर मुस्लिमों को अयोग्य करार दे दिया गया। पाकिस्तान का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री संवैधानिक रूप से सिर्फ मुसलमान ही बन सकता है। गैर मुस्लिम हिन्दू, सिख या ईसाई इस पद पर कभी बैठ ही नहीं सकता।

2019 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के एक ईसाई सांसद डॉ नावेद अमीर जीवा ने प्राइवेट मेम्बर बिल पेश किया था। इस बिल में प्रस्ताव था कि पाकिस्तान के शीर्ष पदों पर गैर मुस्लिमों के बैठने पर लगी रोक हटा ली जाए। लेकिन इस बिल का उस समय के संसदीय राज्य मंत्री अली मुहम्मद ने ही विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क है और यहां शीर्ष पदों पर सिर्फ मुसलमान ही बैठ सकता है। स्वाभाविक है यह प्राइवेट मेम्बर बिल सदन में गिर गया।

इधर भारत में अभी तीन दिन पहले राजस्थान के भाजपा सांसद किरोणी लाल मीणा ने एक प्राइवेट मेम्बर बिल राज्यसभा में पेश किया है। उन्होंने किसी का नागरिक अधिकार छीनने नहीं बल्कि समान नागरिक अधिकार की मांग करते हुए यह प्राइवेट मेम्बर बिल राज्यसभा में प्रस्तुत किया था। लेकिन इस प्राइवेट मेम्बर बिल का विरोध उन्हीं दलों ने किया जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं। राज्यसभा में इस पर चर्चा कराने के लिए हुई वोटिंग में 63 वोट समर्थन में तो 23 वोट खिलाफ पड़े।

इसका मतलब है कि संसद में इस समय जो लोग बैठे हैं वो भी चाहते हैं कि देश में समान नागरिक संहिता लागू हो। ऐसा चाहने के पीछे कोई गलत भावना भी नहीं है। देश को एक साथ सेकुलर और अल्पसंख्यक बहुसंख्यक में नहीं बांटा जा सकता। भारत के संविधान निर्माताओं ने जब भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक के अधिकारों की बात की थी तब संविधान को सेकुलर नहीं बताया था। संविधान निर्माता जानते थे कि सेकुलर और अल्पसंख्यक दोनों विरोधाभाषी बातें हैं। जब किसी देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मान लिया गया है तब वह सेकुलर कैसे हो सकता है? अगर कोई देश सेकुलर हो गया तो वहां अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का क्या तुक होता है?

भारतीय संविधान में सेकुलर शब्द इंदिरा गांधी के शासन में 1976 में डाला गया। बयालिसवां संविधान संशोधन करके 1976 में संविधान की मूल प्रस्तावना में सोशलिज्म और सेकुलरिज्म शब्द जोड़ दिया गया। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के कारण अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की नीति को बरकरार रखा गया। इसीलिए भाजपा द्वारा लगातार देश में समान नागरिक संहिता की बात की जाती है।

अब समय आ गया है कि मुसलमान भी अगर देश के सेकुलर ढांचे को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो समान नागरिक संहिता का समर्थन करें। अगर वो ऐसा नहीं करते तो परोक्ष रूप से वो भारत के हिन्दू राष्ट्र होने का समर्थन करते हैं। वो किसी सेकुलर देश में अल्पसंख्यक होने का लाभ भला कैसे ले सकते हैं? अगर उन्हें अल्पसंख्यक होने का ही लाभ चाहिए तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का समर्थन करना चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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