Rajiv Assassination Case: राजीव हत्याकांड के दोषियों की रिहाई पर उत्तर दक्षिण की राजनीति क्यों?
राजीव के हत्यारों की रिहाई के लिए 2008 में जयललिता सरकार ने प्रस्ताव पारित किया था। उसे तत्कालीन राज्यपाल ने राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। तब से यह मामला राष्ट्रपति के पास लम्बित था।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों की रिहाई भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत की हो, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु के प्रमुख दल अन्नाद्रमुक की बड़ी भूमिका रही है। राजीव के हत्यारों की रिहाई के लिए 2008 में जयललिता सरकार ने प्रस्ताव पारित किया था। उसे तत्कालीन राज्यपाल ने राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। तब से यह मामला राष्ट्रपति के पास लम्बित था।

बाद में साल 2018 में फिर से अन्नाद्रमुक़ सरकार ने इससे सम्बंधित प्रस्ताव पारित किया। हालांकि कांग्रेस को इस फैसले पर आपत्ति है। अपने सर्वोच्च नेता के हत्यारों की समयपूर्व रिहाई को वह स्वीकार नहीं कर पायी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है, 'पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को (समय-पूर्व) रिहा करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह अस्वीकार्य और त्रुटिपूर्ण है। कांग्रेस पार्टी स्पष्ट रूप से इसकी आलोचना करती है और इसे समर्थन के लायक नहीं समझती है।' रमेश ने यह भी कहा है, 'यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर भारत की भावना के अनुरूप कदम नहीं उठाया।'
यहां थोड़ी चर्चा संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय को मिली शक्तियों की भी कर लेनी चाहिए। अनुच्छेद-142 के तहत, शीर्ष अदालत 'पूर्ण न्याय' प्रदान करने के लिए जरूरी कोई भी फैसला या आदेश जारी कर सकती है। राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का आदेश देते हुए अदालत ने कहा है, 'अदालत (उच्चतम न्यायालय) ने माना कि धारा-302 के तहत दोषी ठहराए गए एक अपीलकर्ता की सज़ा में छूट के मामले में राज्यपाल राज्य मंत्रिमंडल की सलाह मानने को बाध्य हैं। निर्विवाद रूप से, मौजूदा मामले में मंत्रिमंडल ने सभी आवेदकों को छूट प्रदान करने का संकल्प पारित किया है।'
दरअसल अनुच्छेद-142 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बीती 18 मई को इसी मामले में सजा काट रहे पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश दिया था, जिसने जेल में 30 साल से अधिक की सज़ा पूरी कर ली थी। तब से बाकी सात दोषियों की रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में मामला लम्बित था।
संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार देता है कि अगर कोई मामला लम्बे समय से अनिर्णीत हो, जिस पर कोई स्पष्ट कानूनी व्यवस्था न हो, उस पर वह निर्णय दे सकता है। इसी प्रावधान के तहत देश की सबसे बड़ी अदालत ने राम मंदिर पर फैसला देते हुए मस्जिद के लिए अलग से जमीन अलॉट करने का आदेश सुनाया था।
राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का जो अदालती आदेश आया है, उस पर कॉंग्रेस ने आपत्ति उठाई है, उसका आधार उसने आजीवन कारावास को बनाया है। अतीत में सर्वोच्च न्यायालय ही व्यवस्था दे चुका है कि उम्र कैद का मतलब आजीवन सजा है। लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले पर अपने फैसले का आधार तमिलनाडु सरकार का आदेश और उस पर राष्ट्रपति के अनिर्णय को आधार बनाया है। इसलिए कॉंग्रेस के सवाल किनारे रखे जा सकते हैं। लेकिन कुछ प्रश्न द्रविड़ राजनीति की ओर उंगली उठाने का आधार जरूर देते हैं।
यहाँ याद किया जाना चाहिए कि 21 मई 1991 को जब तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदुर में राजीव गांधी की हत्या हुई थी, तब तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की न सिर्फ सरकार थी, बल्कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक का कॉंग्रेस के साथ गठबंधन था। हत्या से उपजी सहानुभूति के बाद राज्य में गठबंधन को भारी जीत मिली थी। यह बात और है कि बाद में न सिर्फ गठबंधन टूटा, बल्कि दोनों दलों के बीच अविश्वास भी बढ़ा।
बाद में राजीव हत्या के लिए जो जांच आयोग बना, उस जैन आयोग में बाद की करूणानिधि की द्रमुक़ सरकार पर आरोपियों को बचाने के आरोप भी लगे। इस मामले में बाद के दिनों में कॉंग्रेस के सहयोग से चल रही राष्ट्रीय मोर्चा की इंद्रकुमार गुजराल की सरकार गिर गई। इसलिए कि कॉंग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था। तब राष्ट्रीय मोर्चा के साथ द्रमुक का गठबंधन था।
तमिल राजनीति की विशेषता अति स्थानीयता के प्रति आग्रह है। वैसे तो हिंदीभाषी इलाके को छोड़ पूरे देश की अपनी उपराष्ट्रीयताएँ कहीं ज्यादा प्रभावी रहती हैं। इसलिए राजीव के हत्यारों को लेकर राजनीति भी तमिल उपराष्ट्रवाद से प्रभावित रही है। चूंकि सारे दोषी तमिलनाडु से रहे, इसलिये बाद के दिनों में इनके लिए किंचित सहानुभूति भी रही है। राजीव की हत्या के दौरान कॉंग्रेस और राजीव गांधी से सहयोग और गठबंधन रहा, इस नाते जयललिता सरकार को हत्या के साथ ही दोषियों के खिलाफ होना चाहिए था।
लेकिन बदली राजनीति, तमिल उपराष्ट्रीयता का दबाव और चुनावी मैदान में लोकसमर्थन का व्यापक समर्थक आधार प्राप्त करने के लिए जयललिता ने रिहाई का दांव चला। इसलिए वह उत्तर भारत, विशेषकर कॉंग्रेसी खेमे की नज़र में राजनीतिक दांव बन जाता है।
चूंकि तमिल राजनीति पर स्थानीय भावनाएं हावी रहती हैं, इसलिए कॉंग्रेस से गठबंधन वाली मौजूदा स्टालिन सरकार को कांग्रेस से इतर रुख अपनाना पड़ रहा है। रिहाई के अदालती आदेश का स्टालिन को किंचित समर्थन भी करना पड़ रहा है। द्रमुक़ और उसके मुखिया के सामने बड़ी चुनौती है। द्रमुक अगर कॉंग्रेस के साथ जाती है तो उसके खिलाफ जनमानस उठ खड़ा हो सकता है। इसलिए वह कांग्रेस के साथ खड़ी होने से पूरी तरह परहेज कर रही है।
वैसे अतीत में राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा एक दोषी नलिनी से न सिर्फ मिल चुकी हैं, बल्कि उसे माफ करने का सार्वजनिक ऐलान कर चुकी हैं। रिहाई पर जारी राजनीति करते हुए कांग्रेस इस तथ्य को भूल रही है। पार्टी को पता है कि तमिलनाडु में उसका कुछ भी दांव पर नहीं है, इसलिए वह इस बिंदु पर खुलकर खेल रही है।
राजनीति में भावनाओं की बुनियाद को इन दिनों खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा भावनात्मक है। इसलिए राजीव हत्या के दोषियों की रिहाई भी बेहद भावनात्मक मुद्दा है।
उत्तर भारत की राजनीति में इस मसले पर भले ही सवाल उठ रहे हों, तमिलनाडु में या तो मौन समर्थन है या चुप्पी। इन चुप्पियों में एक हद तक समर्थन के पुट को ढूंढा जा सकता है। इस रिहाई के विरोध में उठी उत्तर की हल्की आवाजों को दक्षिण, विशेषकर तमिलनाडु ज्यादा महत्व नहीं दे रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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