BJP Punjab: पंजाब और उड़ीसा में क्यों नहीं हो पाया भाजपा का गठबंधन?
भारतीय जनता पार्टी पंजाब और उड़ीसा के अपने पूर्व सहयोगियों को एनडीए में लाने में नाकाम रही। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा ने आख़िरी समय तक अपने पूर्व सहयोगियों से गठजोड़ की कोशिश की। लेकिन भाजपा की ज्यादा सीटों की मांग के चलते गठबंधन नहीं हो सका।
उड़ीसा में भारतीय जनता पार्टी ने बीजू जनता दल से दो तिहाई लोकसभा सीटें और एक तिहाई विधानसभा सीटें माँगी थी। इसका मतलब यह था कि भाजपा लोकसभा की 21 में से 14 और विधानसभा की 147 में से कम से कम 49 सीटें मांग रही थी, जबकि 2019 में बीजू जनता दल लोकसभा की 12 लोकसभा सीटें जीता था, भाजपा सिर्फ 8 सीटें जीती थीं।

इसी तरह लोकसभा चुनावों के साथ हुए विधानसभा चुनावों में भी बीजू जनता दल ने 147 के सदन में 112 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा सिर्फ 23 सीटें जीती थीं। बीजू जनता दल से कहा जा रहा था कि वह अपनी जीती हुई पांच लोकसभा सीटें और 14 विधानसभा सीटें छोड़ दे।
स्वाभाविक है कि जब तक कोई बड़ा कारण न हो तो कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं करेगा और बीजू जनता दल ने अपनी जीती हुई सीटें देने से इंकार कर दिया। भारतीय जनता पार्टी अगर 9 लोकसभा सीटों और 35 विधानसभा सीटों के लिए तैयार हो जाती तो उड़ीसा में आसानी से गठबंधन हो जाता।

भाजपा लोकसभा की 9 सीटों पर तो सहमत हो रही थी, लेकिन विधानसभा की 55 सीटें मांग रही थी। अगर गठबंधन हो जाता तो भाजपा को उड़ीसा में पैर फैलाने में ज्यादा मदद मिलती। भाजपा को उड़ीसा में उसी तरह फायदा होता, जैसे बिहार में जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंधन के चलते वह जदयू से बड़ी पार्टी बन चुकी है। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव तक वह जेडीयू की जूनियर पार्टनर थी।
भारतीय जनता पार्टी 400 पार का लक्ष्य हासिल करने के लिए अपना कुनबा बढ़ाने की कोशिश कर रही थी। इसलिए उसे जमीनी हकीकत को समझ कर मांग रखनी चाहिए थी। जैसे आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम के साथ लोकसभा की 25 में से छह सीटों पर और विधानसभा की 175 सीटों में से सिर्फ दस सीटों पर गठबंधन कर लिया। वही दृष्टिकोण उड़ीसा में भी रखा जाना चाहिए था।
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की लोकप्रियता में गिरावट आई है, जबकि तेलुगु देशम की स्थिति में सुधार हुआ है। इसलिए चुनावी आकलन यह है कि आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी गठबंधन वाईएसआर कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर सकता है। जिस आंध्र प्रदेश से पिछली बार एनडीए का एक भी सांसद नहीं था, अगर वहां इस बार एनडीए के 20-22 सांसद जीत कर आते हैं, तो एनडीए को 400 तक पहुंचने में बहुत मदद मिल सकती है।
अगर बीजू जनता दल के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन हो जाता, तो वही स्थिति उड़ीसा में भी बन जाती। भाजपा को यह याद रखना चाहिए था कि 2008 में बीजू जनता दल से उसका गठबंधन भी सीट शेयरिंग के मुद्दे पर टूटा था।
पंजाब में अकाली दल के साथ भी भाजपा का चुनाव गठबंधन सीट शेयरिंग पर विवाद के कारण नहीं हो सका। अकाली दल के साथ जनसंघ का चुनावी तालमेल 1967 में शुरू हुआ था, तब जनसंघ हिन्दुओं की पार्टी मानी जाती थी और अकाली दल तो सिखों की पार्टी थी ही। इसलिए पंजाबी सूबा आन्दोलन में पैदा हुए तनाव के बाद अकाली-जनसंघ गठबंधन हिन्दू- सिख एकता का प्रतीक बन गया था। जनसंघ के भाजपा बनने के बाद 2020 तक गठबंधन जारी रहा था।
2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुए पंजाब के किसान आन्दोलन के कारण अकाली दल एनडीए से बाहर आ गया था। नवजोत सिंह सिद्धू जब अमृतसर से भाजपा के सांसद थे, तब अकाली दल के साथ भाजपा के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था।
2004 और 2009 में भाजपा की टिकट पर अमृतसर के सांसद रहे सिद्धू का भाजपा आलाकमान पर दबाव था कि अकाली दल के साथ गठबंधन तोड़कर भाजपा अकेले लड़े, लेकिन उन दिनों भाजपा में पंजाब को लेकर कोई भी फैसला अरुण जेटली की सहमति के बिना नहीं होता था। प्रकाश सिंह बादल के दबाव में अरुण जेटली ने नवजोत सिंह सिद्धू का टिकट कटवा कर खुद अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में सिद्धू को राज्यसभा का सदस्य भी बना दिया था, लेकिन वह अरुण जेटली से इतने खफा थे कि राज्यसभा से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
2017 में विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर ऐसा मौक़ा आया था जब पंजाब प्रदेश भाजपा अकाली दल से गठबंधन तोड़ना चाहती थी। संघ परिवार के अन्य संगठन भी इस मत के थे कि अकाली दल के साथ गठबंधन के चलते भाजपा के विस्तार की संभावनाएं खत्म हो गई हैं।
जिन दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना पंजाब के प्रभारी थे, उन दिनों भाजपा ने अकाली दल से लोकसभा की तीन सीटों और विधानसभा की 23 सीटों पर समझौता किया था। इससे भाजपा का क्षेत्र उन्हीं सीटों तक सीमित हो गया था। 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले अंतिम फैसला करने के लिए अरुण जेटली के घर पर हुई बैठक में पंजाब प्रदेश भाजपा का फैसला पलट दिया गया।
2017 के चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन की जबर्दस्त हार हुई, कांग्रेस सत्ता में आ गई। अकाली दल ने जब कृषि कानूनों के खिलाफ 2020 में खुद गठबंधन तोड़ा तो पंजाब प्रदेश भाजपा ने राहत की सांस ली थी, भाजपा ने सोच लिया था कि अब पुराने फार्मूले पर गठबंधन नहीं होगा।
2022 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बार फिर गठबंधन की बात चली, लेकिन अकाली दल पुराने फार्मूले पर ही अड़ा हुआ था, इसलिए गठबंधन नहीं हो सका। चुनावों में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत मिली, कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी, अकाली दल तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। भाजपा को विधानसभा में सिर्फ एक सीट मिली थी।
2017 और 2022 के सबक के बाद दोनों ही दल चाहते थे कि 2024 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन हो जाए। तीन बार बातचीत टूटी, फिर शुरू हुई। लेकिन अंतत: बातचीत टूट गई, और भाजपा की तरफ से घोषणा हो गई है कि वह सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। भाजपा लोकसभा की 13 में से सात सीटें मांग रही थी, क्योंकि कांग्रेस टूटने के बाद भाजपा की ताकत में काफी बढ़ोतरी हुई है। अब वह सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी नहीं रही। कांग्रेस और अकाली दल के कई सिख नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
2017 से 2022 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे अमरिंदर सिंह और पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ इस समय भाजपा में है। पंजाब में कांग्रेस के तीन बड़े परिवार रहे हैं, तीनों परिवारों के वारिस अब भाजपा में शामिल हो गए हैं। एक परिवार अमरिंदर सिंह का है, दूसरा परिवार लोकसभा के स्पीकर रहे बलराम जाखड़ का है और तीसरा परिवार है पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का, जिनकी आतंकवादियों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी।
अमरिंदर सिंह के बाद उनकी पत्नी और पटियाला की कांग्रेसी सांसद परणीत कौर भी हाल ही में भाजपा में शामिल हो गई हैं। बेअंत सिंह के पोते और लुधियाना के कांग्रेसी सांसद रवनीत सिंह बिट्टू भी 26 मार्च को भाजपा में शामिल हो गए। आनंदपुर साहब के कांग्रेसी सांसद मनीष तिवारी के भी भाजपा में शामिल होने की अटकलें कई दिनों से लग रही थीं।
इसलिए भाजपा ने पंजाब की सभी सात शहरी सीटें पटियाला, लुधियाना, जालन्धर, अमृतसर, आनंदपुर साहिब, गुरदासपुर और होशियारपुर पर दावा किया है। जबकि अकाली दल 13 में से चार सीटों को देने से आगे नहीं बढ़ा।
अगर अकाली दल अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर के साथ पटियाला, लुधियाना, आनंदपुर साहिब देने को तैयार हो जाता तो गठबंधन हो सकता था। अगर गठबंधन हो जाता तो एनडीए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को दूसरे और तीसरे स्थान पर पहुँचाने में कामयाब हो जाता। अभी भी मुकाबला आम आदमी पार्टी और भाजपा में होने के आसार बन रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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