Mukhtar Ansari: कोयले की काली कमाई के लिए हुई थी अवधेश राय की हत्‍या

आज से 32 साल पहले जिन अवधेश राय की हत्या में मुख्तार अंसारी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी है, वह हत्या कोयले के काले कारोबार पर कब्जे के लिए करवाई गयी थी।

why Awadhesh Rai murdered in which Mukhtar Ansari got life sentence

Mukhtar Ansari: माफिया मुख्‍तार अंसारी के खिलाफ पहला मुकदमा 1978 में गाजीपुर के सैदपुर थाने में आपराधिक धमकी देने का दर्ज हुआ था, तब उसकी उम्र महज 15 साल थी। दूसरा संगीन मामला हत्‍या का 1986 में गाजीपुर के मुहम्‍मदाबाद थाने में दर्ज हुआ, इस‍के बाद तो मुख्‍तार ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1978 के पहले मुकदमे से लेकर 2022 तक मुख्‍तार ने सैकड़ों अपराध किये, लेकिन किसी में उसे सजा नहीं मिली, क्‍योंकि उसे सपा-बसपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों का संरक्षण मिला हुआ था। वर्तमान में उस पर 61 मामले दर्ज हैं।

राजनीतिक संरक्षण ने उसे इतना बेखौफ कर दिया था कि मुख्‍तार अंसारी ने जेल में रहते हुए भी भाजपा विधायक कृष्‍णानंद राय की हत्‍या कराने से भी परहेज नहीं किया। संरक्षण का ही नतीजा था कि मुख्‍तार ने सेना के भगोड़े बाबूलाल यादव से एक करोड़ रुपये में एलएमजी खरीदने की डील की थी। डिप्‍टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने इसका खुलासा करते हुए बाबूलाल यादव एवं मुन्‍नर यादव को मय एलएमजी और 200 गोलियों के साथ अरेस्‍ट किया तथा मुख्‍तार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की, लेकिन मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव के दबाव में पुलिस अधिकारी शैलेंद्र को इस्‍तीफा देने को मजबूर होना पड़ा था।

मुख्‍तार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। दरअसल, सियासी संरक्षण ने पुलिस एवं अभियोजन को इतना निरीह बना दिया था कि मुख्‍तार के खिलाफ जोरदार पैरवी करने की हिम्‍मत किसी में नहीं थी, लिहाजा कोर्ट से किसी मामले में उसे सजा मिलने में 44 साल लग गये। वर्ष 2022 में मुख्‍तार को पांच मामलों में सजा हुई है, जिसमें दो मामलों में अधिकतम दस साल कारावास की सजा मिली है। 5 जून को बनारस के एमपी एमएलए कोर्ट ने लगभग 32 साल पुराने अवधेश राय हत्‍याकांड में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मुख्‍तार ने इस हत्‍याकांड की ओरिजनल केस डायरी ही गायब करा दी थी, जिसका मुकदमा उस पर दर्ज है।

जिस अवधेश राय हत्‍याकांड में मुख्‍तार को आजीवन कारावास की सजा मिली है, यह घटना 3 अगस्‍त 1991 की है। बनारस के चेतगंज थाना क्षेत्र के लहुराबीर इलाके में दबंग व्‍यापारी नेता अवधेश राय अपने छोटे भाई अजय राय एवं एक दो अन्‍य लोगों के साथ घर के बाहर खड़े थे। तभी एक मारुति वैन तेजी से वहां पहुंची। उसमें से निकले कुछ अपराधियों ने अवधेश राय को निशाना बनाकर ताब‍ड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। पूरा इलाका गोलियों की आवाज से थर्रा उठा। अवधेश राय वहीं पर धराशायी हो गये।

अवधेश के छोटे भाई अजय राय ने अपनी लाइसेंसी पिस्‍टल से जवाबी फायरिंग शुरू की तो हमलावर कार छोड़कर दूसरे वाहन से फरार हो गये। अवधेश को पास के मैदागिन स्थित कबीरचौरा अस्‍पताल ले जाया गया, जहां डाक्‍टरों ने उन्‍हें मृत घोषित कर दिया। अजय राय ने चेतगंज थाने में मुख्‍तार अंसारी, भीम सिंह, कलीम अंसारी, कमलेश सिंह तथा राकेश श्रीवास्‍तव न्‍यायिक के खिलाफ हत्‍या का मामला दर्ज कराया। बाद में कलीम अंसारी सपा से विधायक चुना गया, जिसकी अब मौत हो चुकी है। एक अन्‍य आरोपी राकेश श्रीवास्‍तव न्‍यायिक ने अपनी पत्रावली अलग करा ली है।

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    दरअसल, इस हत्‍याकांड के नेपथ्‍य में है चंधासी कोयला मंडी। चंदौली जिले में आने वाली यह कोयला मंडी 1997 से पहले बनारस का हिस्‍सा थी। पूरे भारत में कोयले की सबसे बड़ी इस मंडी को काले हीरे की खान कहा जाता था, जहां खूब नोट बरसते थे। काले धन को खपाने और सफेद करने का सुरक्षित अड्डा थी यह मंडी। स्‍थानीय लोग तो इस मंडी में नहीं पनपे लेकिन राजस्‍थान, हरियाणा, बिहार, झारखंड और दिल्‍ली से आये मारवाड़ी, सिंधी, जैन और पंजाबी व्‍यापारी यहां खूब फले-फूले। उनको कोयले का काला व्‍यापार खूब रास आया।

    अस्‍सी के दशक के आखिर में जब बनारस में आपसी रंजिश के बाद हुई हत्‍याओं से पनपे माफिया गिरोह संगठित हुए तो खर्च चलाने के लिये उनकी नजर अपहरण के अलावा शराब, कोयला, रेलवे स्‍क्रैप तथा पीडब्‍ल्‍यूडी के ठेके पर पड़ी। बनारस मंडल में माफिया बृजेश सिंह एवं मुख्‍तार अंसारी गैंग के बीच इन ठेकों पर वर्चस्‍व को लेकर जंग शुरू हो गई। बनारस और गाजीपुर की सड़कों पर गैंगवार एवं हत्‍या की घटना आम हो गई। पूरा पूर्वांचल इन दोनों गिरोहों की अदावत से खौफ में था और पुलिस परेशान।

    शराब, रेलवे स्‍क्रैप और पीडब्‍ल्‍यूडी के बाद इन दोनों गिरोहों की नजर खरबों रूपये के टर्नओवर वाली चंधासी कोयला मंडी पर पड़ी। यहां बृजेश सिंह ने मुख्‍तार से बाजी मार ली। बृजेश ने धनबाद के कोयला किंग सूर्यदेव सिंह के सहयोग से चंधासी कोल मंडी और व्‍यापारियों पर अपना दबदबा बना लिया। काला धन सफेद करने वाले व्‍यापारियों को भी बृजेश गैंग का पैसा खपाने में लाभ दिखने लगा। मुख्‍तार चाह कर भी चंधासी कोयला मंडी पर अपना दबदबा नहीं बना पा रहा था, क्‍योंकि बृजेश के लोगों के आगे उसकी कुछ चल नहीं पा रही थी।

    चंधासी कोयला मंडी का काम देखने वाले बृजेश के कुछ चुनिंदा नजदीकी लोगों में अवधेश राय भी थे। अवधेश राय चंधासी कोयला मंडी और मुख्‍तार गैंग के बीच दीवार बने हुए थे। दूसरी ओर मुख्‍तार अंसारी चंधासी कोयला मंडी पर किसी भी कीमत पर अपना दबदबा बनाना चाहता था। अवधेश के चलते मुख्‍तार गैंग व्‍यपारियों से वसूली भी नहीं कर पा रही थी। चंधासी मंडी पर कब्‍जा करने के लिये मुख्‍तार गैंग ने अवधेश राय को रास्‍ते से हटाने का प्‍लान बनाया और उसे अंजाम भी दे दिया।

    इस हत्‍याकांड के बाद मुख्‍तार गैंग का दबदबा धीरे-धीरे चंधासी पर बढ़ने लगा, लेकिन ज्‍यादातर व्‍यापारी अब भी बृजेश गैंग के दबदबे में थे। सियासी संरक्षण की ताकत देख चुका मुख्‍तार 1996 में बसपा के बैनर तले चुनाव लड़कर खुद विधायक बन गया। विधायक बनने के लिए उसे बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी। इस रकम की भरपायी तथा वसूली के लिये मुख्‍तार ने एक बार फिर अपनी नजर चंधासी कोल मंडी की तरफ की। व्‍यापारियों से वसूली तथा मंडी पर अपना दबदबा बनाने के लिये मुख्‍तार ने कोल किंग रूंगटा ब्रदर्स को निशाने पर ले लिया।

    अवैध कोयला कारोबार एवं फैक्‍टरियों के कोल लिंकेज के जरिये नंदकिशोर रूंगटा और उनके तीनों भाइयों ने अरबों का साम्राज्‍य खड़ा किया था। कोल मंडी चंधासी में होने के चलते चार भाइयों में सबसे बड़े नंदकिशोर झारखंड के रामगढ़ से आकर बनारस में ही बस गये और विश्‍व हिंदू परिषद से जुड़ गये। मुख्‍तार ने चुनाव जीतने के बाद अपने गुर्गे अताउर रहमान उर्फ बाबू के जरिये नंदकिशोर रूंगटा का 21 जनवरी 1997 को अपहरण करा लिया। अताउर रहमान हजारीबाग का कोल व्‍यवसायी बनकर रूंगटा से मिला और बहाने से उनका अपहरण कर लिया।

    22 जनवरी 1997 को फोन कर नंदकिशोर के अपहरण की जानकारी उनके परिवार को दी गई तथा तीन करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई। कहा जाता है कि रूंगटा परिवार ने मुख्‍तार गैंग को पहली किस्‍त के रूप में सवा करोड़ तथा दूसरी किस्‍त के रूप में एक करोड़ रुपये की फिरौती दी, इसके बावजूद मुख्‍तार गैंग ने रूंगटा की हत्‍या कर उनका शव गंगा में बहा दिया। आज तक नंदकिशोर का शव नहीं मिल पाया।

    खैर, इस घटना के बाद मुख्‍तार गैंग का दबदबा चंधासी कोल मंडी पर बढ़ गया और योगी आदित्‍यनाथ की सरकार आने तक कायम रहा। फिलहाल चंधासी कोल मंडी भी अब अपने अवसान की ओर है, क्‍योंकि कोल आवंटन लिंकेज अब सीधे सरकार से हो रहा है। माफियाओं पर कठोर कार्रवाई के बाद वैसे भी यूपी में अवैध और कानूनी मंडियों का सजना कम हो रहा है।

    बहरहाल, 32 साल बाद अवधेश राय हत्याकांड में मुख्तार को मिली आजीवन कारावास की सजा न सिर्फ अवधेश राय के परिवार के लिए बल्कि उन सभी के लिए न्याय की जीत का प्रतीक है जो इन माफियाओं से दशकों तक पीड़ित रहे हैं।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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