Savarkar and Congress: सावरकर से दिक्कत किसे है - कांग्रेस को या सिर्फ सोनिया परिवार को?
वीर सावरकर का 26 फरवरी 1966 को मुंबई में निधन हुआ था। उनका अंतिम संस्कार शहर के चंदनवाड़ी श्मशानघाट पर किया गया। वे शहर के शिवाजी पार्क इलाके में रहते थे, जहाँ से चंदनवाड़ी की दूरी छह मील थी।

उस दिन हजारों की संख्या में लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए सड़कों पर मौजूद थे। हुजूम इतना बड़ा था कि उनकी शवयात्रा को श्मशानघाट तक पहुँचने में साढ़े पांच घंटों से भी अधिक समय लग गया। जबकि उनका पार्थिव शरीर फूलों से सजे एक ट्रक में रखा गया था।
स्वाधीनता के बाद, इस प्रकार की शवयात्राओं की तस्वीरें महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल सरीखे नेताओं की सामान्यतः देखी गयी है। मगर वीर सावरकर के लिए स्वाभाविक रूप से ऐसी भीड़ का जुटना स्पष्ट दर्शाता है कि उनका कद उस दौर के किसी नेता से कमतर नहीं आँका जा सकता। साथ ही, यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि सावरकर पिछले तीन दशकों से सक्रिय राजनीति का भी हिस्सा नहीं थे और स्वाधीनता के बाद उन्होंने अपना जीवन एकान्तवास में ही गुजारा था।
उनके अंतिम संस्कार में मुख्य रूप से तीन बड़े राजनेता मौजूद थे, जो एक प्रकार से भारतीय राजनीति की हर विचारधारा का प्रतिनिधित्व भी कर रहे थे। इसमें राजनेता, कवि एवं मराठा समाचार-पत्र के संस्थापक प्रह्लाद केशव अत्रे शामिल थे। वे महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य और वामपंथियों एवं समाजवादियों द्वारा महाराष्ट्र राज्य के गठन के लिए बनाई संयुक्त महाराष्ट्र समिति के भी सदस्य रहे।
दूसरा नाम, श्रीनिवास गणेश सरदेसाई का था जोकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से महाराष्ट्र विधानसभा सहित राज्यसभा के सदस्य रहे। वे सीपीआई की केंद्रीय कार्यसमिति के भी सदस्य थे। तीसरा नाम, भारतीय जनसंघ के बच्छीराज व्यास का था।
सीपीआई के सबसे बड़े नेताओं में से एक रहे, हिरेन मुखर्जी ने तत्कालीन केंद्र सरकार से संसद में वीर सावरकर को श्रद्धांजलि देने का अनुरोध किया था। हालाँकि, उनकी यह मांग तो पूरी नहीं हुई लेकिन संसद से बाहर हर किसी ने सावरकर के प्रति न सिर्फ अपनी शोक संवेदनाओं को प्रकट किया बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान को भी याद किया।
इनमें सीपीआई के संस्थापक सदस्य, श्रीपाद अमृत डांगे, समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया, और कांग्रेस नेता यशवंतराव चव्हाण जैसे नाम शामिल थे। चव्हाण तो बाद में भारत के गृह, रक्षा, वित्त, विदेश और उप-प्रधानमंत्री भी बने।
तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्लि राधाकृष्णन ने वीर सावरकर को याद करते हुए कहा था कि वे स्वतंत्रता के नियमित एवं मजबूत स्तंभ थे। उपराष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने कहा कि सावरकर ने कई युवाओं को मात्रभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी सावरकर को देशभक्त एवं क्रांतिकारी कहकर संबोधित किया।
साल 1965 में सावरकर की तबियत ठीक नहीं रहती थी और उन्हें आर्थिक सहायता देने के लिए थोड़ी कशमकशें चल रही थी। तब संसद की एक बहस में तब कांग्रेस के नेता इंद्र कुमार गुजराल ने उन्हें 'नेशनल हीरो' कहा था।
बाद में इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री भी बने। इसी प्रकार 1989 में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और तत्कालीन उप-राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने मुंबई में सावरकर मेमोरियल का उद्घाटन करते हुआ कहा था कि यह मेमोरियल राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करेगा, जिसकी वर्तमान में सर्वाधिक जरुरत है। इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के राज्यपाल ब्रह्मानंद रेड्डी और मुख्यमंत्री शरद पवार भी मौजूद थे। इन सभी के राजनैतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से हुई थी।
यह एक बड़ा दिलचस्प तथ्य है कि कांग्रेस में अगर सोनिया गांधी और उनके बेटे बेटी सहित कुछ अन्य राजनेताओं को छोड़ दें तो नेताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने अपनी अलग विचारधारा होने के बावजूद भी वीर सावरकर को लेकर कभी तिरस्कारपूर्ण रवैया नहीं रखा। वास्तव में, कांग्रेस के गैर-सावरकर व्यवहार में मुखरता तब से आई है, जब से सोनिया गाँधी इस पार्टी की अध्यक्ष बनी।
उस दौर के शुरूआती वर्षों में ऐसे एक नहीं बल्कि कई उदाहरण मौजूद है, जहाँ कांग्रेस के बड़े नेताओं को सावरकर से कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन सोनिया परिवार का दवाब उन पर दिखाई देता था। जैसे जब संसद भवन में वीर सावरकर की तस्वीर लगाने को लेकर संसदीय समिति की बैठकें बुलाई गयी थी। इन बैठकों में कांग्रेस के शिवराज पाटिल और प्रणब मुखर्जी सहित सीपीएम से सोमनाथ चटर्जी शामिल हुए। खास बात यह है कि इनमें से किसी ने इन बैठकों में सावरकर की तस्वीर का विरोध नहीं किया। मगर जिस दिन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने उस तस्वीर का संसद भवन में अनावरण किया तो कांग्रेस सहित वामपंथी नेताओं ने उस कार्यक्रम से दूरी बना ली।
इस दौरान जब महाराष्ट्र विधानसभा में वीर सावरकर और सुभासचंद्र बोस की तस्वीर का अनावरण उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने उस कार्यक्रम से दूरी बना ली। जबकि इस कार्यक्रम की संरचना मुख्यमंत्री शिंदे के ही निर्देशों पर हुई थी।
जब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनी तो तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव में आकर वीर सावरकर पर एक अनावश्यक टिप्पणी कर दी थी। जिसके बाद, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सितम्बर 2004 में प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से कहा कि वे सावरकर की विचारधारा को नहीं मानते लेकिन सावरकर देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी थे।
साल 2004 से पहले तक कर्नाटक के स्कूलों में आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में वीर सावरकर का एक अध्याय शामिल था। जिसे लेकर किसी ने कोई विवाद नहीं किया जबकि आजादी के बाद से कर्नाटक में कांग्रेस ही सत्ता में अथवा उसके आसपास बनी रहती थी।
भारतीय जनता पार्टी ने तो पहली बार 2007 में वहां सत्ता संभाली। मगर 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा ने पाठ्यक्रम फिर से लिखने के लिए एक समिति का गठन किया और उस समिति ने वीर सावरकर सहित भगत सिंह के अध्याय हटवा दिए।
इसी दौरान, पहली बार वीर सावरकर को विवादित करने के प्रयास शुरू हुए। इसमें नौसेना से बर्खास्त किये गए विष्णु भागवत ने सबसे पहले बयान देकर कहा कि सावरकर ने कई बार ब्रिटिश सरकार से मांफी मांगी थी।
उसके बाद, सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने इसी एक मुद्दे को पकड़ लिया और वीर सावरकर को उसी के इर्दगिर्द रख विवादित बनाने का प्रोपेगंडा शुरू कर दिया। जबकि वीर सावरकर ने जब राजनीतिक बंदियों की रिहाई हेतु पत्र लिखे थे तब महात्मा गांधी सहित हर बड़े नेता को इस बात की जानकारी थी लेकिन किसी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया। बल्कि गांधीजी ने तो पुनः पत्र लिखने का सुझाव भी दिया और यह आश्वासन भी कि वे अंग्रेजों के सामने सावरकर एवं अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई का मुद्दा उठाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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