Coronation Park Delhi: ब्रिटिश उपनिवेशवाद की निशानी कोरोनेशन पार्क से मुक्ति कब?
Coronation Park Delhi: आजादी के अमृतकाल में जब ब्रिटिश युग के प्रतीकों से मुक्ति का क्रम चल रहा है तब इंडिया की जगह भारत का आधिकारिक प्रयोग और नये संसद भवन में प्रवेश को भी इसी क्रम में देखा जा सकता है। लेकिन ब्रिटिश युग की निशानियों को दिल्ली लाने वाले उस कोरोनेशन पार्क से मुक्ति कब मिलेगी जो दिल्ली के एक कोने में ब्रिटिश वजूद के होने का अहसास करा रहा है?
दिल्ली के बुराड़ी बाईपास के पास निरंकारी ग्राउंड से लगकर मौजूद कोरोनेशन पार्क में ही साल 1877 में पहला दिल्ली दरबार लगाया गया था। इस दरबार में ही ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया गया था। महारानी विक्टोरिया के बाद साल 1903 में यहीं पर किंग एडवर्ड सप्तम के आगमन का जश्न मनाया गया और तीसरा दिल्ली दरबार भी इसी पार्क में आयोजित किया गया था, जहां जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी का 12 दिसंबर, 1911 को भारत के सम्राट और महारानी के रूप में राज्याभिषेक हुआ था।

जॉर्ज पंचम पहले ऐसे ब्रिटिश शासक थे, जो भारत यात्रा पर आए थे। इसी पार्क से ब्रिटिश सम्राट ने दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की। इससे पहले कोलकाता राजधानी थी। हालांकि इसकी तैयारियां लंबे अरसे से चल रही थी और रायसीना हिल्स पर नई दिल्ली बसाने का काम चल रहा था लेकिन आधिकारिक रूप से नई दिल्ली की घोषणा सम्राट द्वारा कोरोनेशन पार्क के अंदर तीसरे दिल्ली दरबार में ही हुई। इस दौरान सभी प्रमुख रियासतों के राजा व अन्य बड़े अधिकारी भी मौजूद थे।
प्रतिमा लगी है लेकिन पहचान नहीं सकते
आज पार्क में जॉर्ज पंचम और चार वायसराय- लॉर्ड हार्डिंग, लॉर्ड विलिंगडन, लॉर्ड इरविन और लॉर्ड चेम्सफोर्ड की संगमरमर से बनी भव्य प्रतिमाएं लगी हुई हैं। आप इन प्रतिमाओं को जाकर देख सकते हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि जॉर्ज पंचम के अलावा किसी भी प्रतिमा को आप पहचान नहीं पाएंगे। इन प्रतिमाओं को वहां लगाकर छोड़ दिया गया है और किसी भी प्रतिमा पर व्यक्ति का नाम और उसका परिचय नहीं मिलता है।
यह सार्वजनिक पार्क डीडीए के अन्तर्गत आता है और यहां प्रवेश निशुल्क है। पार्क के अंदर मौजूद अंग्रेज शासक और अधिकारियों की प्रतिमाएं पहले इंडिया गेट पर हुआ करती थी। उन दिनों इसका उद्देश्य इंडिया गेट पर अंग्रेजों की महानता का प्रदर्शन मात्र था। इंडिया गेट पर 1938 से 1968 तक जॉर्ज पंचम की प्रतिमा लगी हुई थी। बताया जाता है कि उसके बाद इसे बुराड़ी स्थित कोरोनेशन पार्क में पहुंचाया गया।
पार्क का संक्षिप्त परिचय
कोरोनेशन पार्क करीब 53 एकड़ में फैला हुआ है। इस पार्क में हरे भरे पेड़ पौधे, फूलदार पौधे लगे हुए हैं। यहां बड़ी संख्या में लोग हर रोज घूमने के लिए पहुंचते हैं। इसे डिजाइन करने का श्रेय सर एडवर्ड लुटियंस व हार्डवर्ड बेकर को जाता है। लेकिन उन्होंने जब पार्क को डिजाइन किया था तब इसमें कोई मूर्ति नहीं थी बल्कि कुछ सीढिय़ों के बाद एक 50 फुट ऊंची मीनार बनाई गई थी। जहां जॉर्ज पंचम व क्वीन मैरी बैठे थे। बाद में इन संगमरमर से बनी हुई ब्रिटिशकालीन अंग्रेज गवर्नरों की ऐतिहासिक भव्य प्रतिमाओं को लुटियन जोन से लाकर लगाया गया। ये सभी मूर्तियां लुटियन जोन के प्रमुख चौराहों पर लगीं हुईं थी, जिन पर नई दिल्ली में आज भी सड़कों के नाम देखने को मिल जाते हैं।
पार्क में रखी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की कहानी
लुटियन जोन का आकर्षण केंद्र एडवर्ड लुटियंस व हार्डवर्ड बेकर ने इंडिया गेट को बनाया था। गुलाम भारत के राजा की हैसियत से जॉर्ज पंचम की मूर्ति को इंडिया गेट पर स्थापित किया गया था। मोदी सरकार के आने के बाद ठीक उसी जगह नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा लगाई गई, जहां कभी जॉर्ज पंचम विराजमान थे। अंग्रेजों के प्रति विशेष अनुराग और सम्मान रखने वाले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कभी भी ब्रिटिश शासन की निशानियों को हटाने का काम नहीं किया। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद नागरिकों के दवाब में जॉर्ज पंचम की मूर्ति गुलामी की याद दिलाती है, यह कहकर 1968 में इंडिया गेट से हटाकर कोरोनेशन पार्क में इस मूर्ति को स्थापित कर दिया गया। पहले अंग्रेज राजा की मूर्ति हटाई गई और फिर उसके पीछे-पीछे सभी ब्रिटिश गवर्नरों की मूर्तियों को भी उनके स्थानों से हटा दिया गया। मूर्तियों को उठाने बिठाने में मूर्तियों की नाक कान भी टूटी। क्षतिग्रस्त मूर्तियों को लेकर किसी ने शिकायत नहीं की। वैसे पार्क के अंदर रखी हुई जॉर्ज पंचम समेत सभी ब्रिटिश गवर्नरों की मूर्तियों को जमीन्दोज करने की कई कोशिशें दिल्ली में हुई। ऐसे नारे भी लगे कि जॉर्ज पंचम की मूर्ति आजाद भारत में नहीं चाहिए।
कोरोनेशन पार्क गुलामी का प्रतीक
कोरोनेशन पार्क को लेकर देश के एक वर्ग का मानना है कि हमारी गुलामी का संग्राहालय हमें अपने देश में बनाकर रखने की जरूरत क्या है? 15 अगस्त को प्रत्येक साल हम याद करते ही हैं कि देश को कितने संघर्षो के बाद यह आजादी मिली। फिर इन अंग्रेज अफसरों की मूर्तियों को इतने बड़े पार्क में बचाकर रखने की क्या आवश्यकता है? इनकी मूर्तियों को उठाकर किसी संग्रहालय में रखवाना ही बेहतर है।
देश की राजधानी में औरंगजेब जैसे नृशंस शासक के नाम से एक सड़क इंडिया गेट से होकर दक्षिणी दिल्ली को जाती थी। पिछने दिनों देश को उससे मुक्ति मिली। वर्ष 2015 से लोग उस सड़क को महान वैज्ञानिक और देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानते हैं। इसी तरह इंडिया गेट पर जिस छतरी के नीचे जार्ज पंचम की मूर्ति लगी थी वहां अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लग गयी है।
अंग्रेजों की मूर्ति हटाने की मांग
यह मांग लंबे समय से उठती रही है कि बुराड़ी में स्थित राज्याभिषेक (कोरोनेशन) पार्क का नाम हमारी गुलामी को याद दिलाने के लिए नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि हमारी आजादी की कहानी लिखने वाले हजारों बलिदानियों को यह पार्क समर्पित करना चाहिए। जिनकी वजह से हम एक आजाद देश की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। जिन लोगों ने हम भारतीयों को इंसान नहीं समझा, अपने जूतों के नीचे रौंद कर रखा, उनके राज्याभिषेक को हम क्यों याद रखें?
दिल्ली में एक वर्ग की मांग रही है कि यह पार्क दिल्ली के क्रांतिकारी भाई परमानंद और देशबंधु गुप्ता जैसे हजारों क्रांतिकारियों को समर्पित करना चाहिए। यहां टूटी नाक वाले ब्रिटिश गवर्नर की नहीं बल्कि ऊंची नाक वाले स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्ति लगनी चाहिए। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी से पहले ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर में बना यह पार्क आज भी हमारे नेशनल मेमोरियल में शामिल है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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