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Reservation: आरक्षण पर नेहरू और मोदी की सोच में फर्क क्या?

जिस दिन नरेन्द्र मोदी संसद के भीतर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोल रहे थे, वो अपनी सरकार में महिला, नौजवान आदि के नाम पर किये गये काम गिना रहे थे। इस बीच किसी विपक्षी सांसद ने यह कहकर टोक दिया कि आपने अल्पसंख्यकों का नाम नहीं लिया।

इस पर प्रधानमंत्री मोदी इतने नाराज हुए कि लगभग बिफरते हुए कहा कि 'कब तक समाज को टुकड़ों में बांटते रहोगे। अगर महिला कहा तो क्या सारी महिलाएं उसमें शामिल नहीं हैं? अगर नौजवान कहा तो क्या सारे नौजवान उसमें शामिल नहीं है?" उनकी बात सही थी। सरकार के लिए नागरिकों में कोई भेद नहीं होता। इसलिए अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का बंटवारा क्योंकर होना चाहिए?

What is the difference between the thinking of Nehru and Modi on reservation?

धार्मिक अल्पसंख्यकों का नाम लिये जाने पर मोदी को गुस्सा संभवत: इसलिए आया क्योंकि वो हिन्दू वोटबैंक द्वारा चुनकर आते हैं। वहां वो समता और समानता का सिद्धांत कायम रख सकते हैं लेकिन वहीं पर जब बात दलितों की आती है तो उनकी भाषा बदल जाती है। उसी संसद में जब वो राज्यसभा में बोलने पहुंचे तो उनका यह समतावादी सिद्धांत स्वयं वोटबैंक की राजनीति का शिकार हो गया।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ही राज्यसभा में बोलते हुए उन्होंने पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पत्र की कुछ पंक्तियां पढ़ी जिसे उन्होंने उस समय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा था। अंग्रेजी में लिखे इस पत्र के पहले पैरा का अनुवाद करते हुए मोदी ने बताया कि "पंडित नेहरु ने लिखा था मैं किसी भी आरक्षण को पसंद नहीं करता और नौकरी में आरक्षण तो कतई नहीं। मैं ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ हूं जो अकुशलता को बढ़ावा दे। जो दोयम दर्जे की तरफ ले जाए।"

प्रधानमंत्री मोदी ने हालांकि नेहरु की चिट्ठी का सिर्फ उतना ही हिस्सा पढ़ा जितना उनको राजनीतिक रूप से फायदेमंद लगा। वरना जिस पैरे का आधा हिस्सा ही मोदी ने पढ़ा था, उसी चिट्ठी के उसी पैरे में नेहरु लिखते हैं "मैं चाहता हूं कि देश हर मामले में फर्स्ट क्लास बने। जैसे ही हम सेकेण्ड रेट को बढ़ावा देंगे, हम खत्म हो जाएंगे।"

इसके बाद नेहरु ने यह भी लिखा है कि "पिछड़े समूहों के उत्थान का सिर्फ एक रास्ता हो सकता है कि उन्हें अधिक से अधिक शिक्षा की ओर ले आया जाए खासकर तकनीकी शिक्षा की ओर। लेकिन अगर हम जाति या धर्म के नाम पर आरक्षण की दिशा में आगे बढते हैं तो हम तेज तर्रार और प्रतिभावान लोगों को खो देंगे और दूसरे या तीसरे दर्जे का (देश) होकर रह जाएंगे।"

अपनी चिट्ठी में नेहरु आगे लिखते हैं "मुझे यह जानकर दुख हुआ कि सांप्रदायिक विचारों के आधार पर आरक्षण का यह व्यवसाय कितना आगे बढ़ गया है। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पदोन्नति भी कभी-कभी सांप्रदायिक और जातिगत विचारों पर आधारित होती है। इस तरह से न केवल मूर्खता होती है, बल्कि विनाश भी होता है। आइए हम पिछड़े समूहों की हर तरह से मदद करें लेकिन दक्षता की कीमत पर कभी नहीं।"

प्रधानमंत्री मोदी ने तो चिट्ठी का उतना ही हिस्सा पढ़ा जितना उनके लिए राजनीतिक रूप से सही था क्योंकि इस हिस्से को पढ़कर वे कांग्रेस पार्टी को आरक्षण विरोधी और दलित विरोधी साबित करना चाहते थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा भी कि ये लोग (कांग्रेस) तो जन्म से आरक्षण के विरोधी हैं। लेकिन इस पूरी चिट्ठी को पढ़ने के बाद तो शायद वे लोग भी नेहरु का विरोध नहीं करेंगे जिन लोगों तक मोदी यह संदेश पहुंचाना चाहते थे।

नेहरु ने ऐसा कुछ नहीं कहा है जिससे उन्हें दलित विरोधी साबित किया जाए। हालांकि एक सत्य यह भी है कि संविधान सभा के निर्णय के चलते उनकी ही सरकार में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सरकारी नौकरी में दस वर्ष के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन दस वर्ष पूरे होने के बाद भी समय समय पर कांग्रेस की सरकारों द्वारा अनुसूचित जातियों और जनजातियों का दायरा बढ़ाया गया और अधिक से अधिक जातियों तक सरकारी नौकरी में आरक्षण का लाभ पहुंचाया गया। इसके अलावा एससी और एसटी के लिए आरक्षण का प्रतिशत भी बढ़ाया गया।

जहां तक मोदी द्वारा संसद में नेहरु के भाषण का उल्लेख है तो उन्होंने यह बोलकर एक तरह से सेल्फ गोल ही किया है। मोदी राजनीतिक रूप से भले ही चाहे जो बयानबाजी करें लेकिन अगर दलित आरक्षण को लेकर नेहरु गलत थे तो मोदी सही हो सकते हैं? जब प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की मर्जी पर छोड़ दिया था कि वह चाहे तो प्रमोशन में आरक्षण दे या न दे। क्या आज तक मोदी सरकार ने प्रमोशन में रिजर्वेशन दिया?

इस तरह तो वो भी नेहरु की ही नीति पर चल रहे हैं कि सरकारी नौकरी में जाति, धर्म के नाम पर आरक्षण एक देश को फर्स्ट क्लास बनने में मदद नहीं कर सकता। संभवत: इसलिए मोदी सरकार के बीते दस साल के कार्यकाल में प्रमोशन में आरक्षण से बचने के लिए कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों को जारी रखा गया है। नेहरु ने अपने जिस समाजवादी आर्थिक मॉडल में नौकरियों में गुणवत्ता की बात कही थी वह तो सफल नहीं हुआ। मोदी जिस बाजारवादी पूंजीवाद पर देश को दुनिया की तीसरी आर्थिक महाशक्ति बनने की बात कर रहे हैं क्या वह श्रेष्ठ और योग्य मानव संसाधन के बिना संभव है?

जिस तरह यह जानते हुए भी कि श्रेष्ठ मानव संसाधन के बिना भारत को सर्वश्रेष्ठ नहीं बनाया जा सकता, नेहरु सरकार ने ही नौकरियों में जातीय आरक्षण दिया। ठीक उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी भले ही सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे पर नेहरु को दोषी ठहरा रहे हैं लेकिन तीव्र गति से निजीकरण को बढ़ावा और सरकारी नौकरियों में कान्ट्रैक्ट सिस्टम को बनाये रखकर मोदी भी एससी, एसटी, ओबीसी के साथ कौन सा न्याय कर रहे हैं?

नेहरु मानते थे कि अयोग्य लोगों को नौकरियों में रखने की बजाय उन्हें योग्य और तकनीकी शिक्षा देकर प्रतियोगिता में खड़े होने लायक बनाया जाए। जब वो ऐसा बन जाएंगे तब उन्हें नौकरी में आरक्षण की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी और वो भी मुख्यधारा के साथ कंधा से कंधा मिलकार आगे बढ़ सकेंगे। नेहरु के आधे अधूरे भाषण को राज्यसभा में सुनाकर मोदी ने नेहरु को तो दोषी करार दे दिया लेकिन क्या वह नेहरु की इस सोच से इंकार करेंगे?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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