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इंडिया गेट से: आज चुनाव हो जाएं तो मोदी को कहां नफा, कहां नुकसान

भारत अपनी स्वतंत्रता के 75वें वर्ष का जश्न मना रहा है, लेकिन जिस कांग्रेस पार्टी ने आज़ादी के बाद लगभग 50 वर्ष भारत पर एकछत्र राज किया, वह तीन साल से नेतृत्वहीन पड़ी हुई है। लोकसभा चुनावों में खुद की हार और पार्टी की लगातार दूसरी बार हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी अनौपचारिक रूप से अभी भी अध्यक्ष बने हुए हैं।

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कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है, और तीन साल से कांग्रेस का पूर्णकालीन अध्यक्ष ही नहीं है। सोनिया के बाद राहुल, और राहुल के बाद सोनिया हो रहा है। तीन साल से कोई कांग्रेस का अध्यक्ष बनने को भी तैयार नहीं। इन बीते तीन सालों में जिन 14 विधानसभाओं के चुनाव हुए उन सभी चुनावों के सभी निर्णय राहुल गांधी ही ले रहे थे। इन 14 राज्यों में एक भी राज्य में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बन सका। दो राज्यों महाराष्ट्र और झारखंड में उसके कुछ मंत्री बन सके थे, अब सिर्फ झारखंड बचा है। इस बीच कांग्रेस ने पंजाब में आम आदमी पार्टी के हाथों सत्ता गवाई है।

दूसरी तरफ इन साढ़े तीन सालों में भाजपा का ग्राफ देखें, तो उसने उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, असम और मणिपुर में स्पष्ट बहुमत से दुबारा सरकारें बनाईं हैं। गोवा में तीसरी बार सरकार बनाई। हरियाणा में भी बाहरी समर्थन से दुबारा सरकार बनी। और पुदुचेरी में पहली बार सरकार बनी। महाराष्ट्र में सियासी उठापटक के बाद भाजपा गठबंधन की और बिहार में सियासी उठापटक के बाद क्षेत्रीय दलों की सरकार बनी है। एक तरह से देखा जाए तो इन सभी 8 राज्यों पर भाजपा का प्रभाव बना हुआ है।

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और दिल्ली में क्षेत्रीय पार्टियों का और केरल में कम्युनिस्टों का कब्जा बरकरार है। लोकसभा चुनावों से पहले इस साल हिमाचल और गुजरात के चुनाव हैं और अगले साल छतीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, मिजोरम, नागालेंड, त्रिपुरा और तेलंगाना के चुनाव हैं।

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    देश की दिशा थोड़ी बहुत गुजरात और हिमाचल के चुनावों से दिखने लगेगी। लेकिन असली दिशा अगले साल होने वाले 9 राज्यों की विधानसभाओं से तय होगी। क्योंकि ये सभी राज्य देश के हर कोने में बिखरे हुए हैं। हम 2024 का इन्तजार नहीं करते, क्योंकि विपक्ष अभी से सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणियां करने लगा है। इसलिए आकलन यह करना होगा कि अगर आज चुनाव होते हैं, तो नरेंद्र मोदी और भाजपा कहां खडी होगी।

    अगर हम पिछले साढे तीन सालों में हुए विधानसभा चुनावों को सामने रख कर आकलन करते हैं, तो भाजपा की स्थिति थोड़ी कमजोर दिखाई देती है। भाजपा की उतर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा में सीटें घटी हैं, जबकि असम और गोवा में बढी हैं। लेकिन बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा की ताकत बढी है। बिहार में गठबंधन टूटने का क्या असर होगा, उस पर अभी कुछ भी भविश्यवाणी करना ठीक नहीं, लेकिन यह तय है कि भाजपा को पिछली बार मिली 17 सीटों को बरकरार रखने में कोई मुश्किल नहीं आएगी।

    इसी तरह बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की वापसी और भाजपा के नेताओं के वापस तृणमूल में लौटने के बाद भाजपा को 18 सीटें बरकरार रखना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इस बीच सीबीआई और ईडी के छापों में मंत्रियों के ठिकानों पर मिली अपार धनराशी से ममता सरकार की छवि इतनी खराब हो चुकी है कि उसका उलटा असर भी हो सकता है और भाजपा की सीटें बढ़ भी सकती हैं । बंगाल में भाजपा एक बड़ी ताकत बन कर उभर चुकी है, कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों लगभग खत्म हो गए हैं ।

    जहां तक सबसे बड़े प्रदेश उतर प्रदेश का सवाल है तो रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा सीटों के उपचुनाव जीतने के बाद अभी भाजपा की 80 में से 64 सीटें हैं। दस सीटों के साथ दूसरे नम्बर पर बहुजन समाज पार्टी है, समाजवादी पार्टी के पास सिर्फ तीन सीटें बची हैं और कांग्रेस के पास सिर्फ एक सोनिया गांधी की सीट बची है। जो संकेत मिल रहे हैं, शायद सोनिया गांधी भी इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगी।

    आज के हालात यह हैं कि सपा और बसपा दोनों ही कमजोर हुई हैं, इसलिए यूपी विधानसभा में भाजपा की सीटें घटने के बावजूद लोकसभा में भाजपा की सीटों में इजाफा होगा। अगर आज चुनाव होते हैं, तो भाजपा को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और तेलंगाना में भी फायदा होगा। यहाँ तक कि भाजपा पंजाब में भी लोकसभा की पांच सीटें जीत सकती है, क्योंकि कांग्रेस और अकाली दल अपनी साख खो चुके हैं। इस बीच कांग्रेस के कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हुए हैं।

    पंजाब में भाजपा और आम आदमी पार्टी में सीधा मुकाबला सकता है। कर्नाटक में इस समय भाजपा जातीय संतुलन के हिसाब से काफी मजबूत स्थिति में है। फिर भी 28 सीटों में से मौजूदा 25 सीटों को बरकरार रख पाएगी या नहीं, इस पर संशय है। जहां तक दक्षिण के बाकी तीन राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू और केरल, तथा पश्चिम के राज्य उड़ीसा का सवाल है, तो क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व वाले इन चारों राज्यों में भाजपा की यथास्थिति यथावत रहेगी। उसकी सीटें बढने के आसार नहीं हैं।

    कुल मिलाकर, यह जो हवा बनाई जा रही है कि विपक्ष एकजुट हो कर भारतीय जनता पार्टी को हरा सकता है या कड़ा मुकाबला दे सकता है, तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है। जब तक कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और हरियाणा में भाजपा को नुकसान पहुँचाने और सपा या बसपा यूपी में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की स्थिति में नहीं आती, भाजपा को तीसरी बार सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता। और इन पाँचों राज्यों में भाजपा आज भी मजबूत है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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