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जातीय हो या आर्थिक, आरक्षण की उपयोगिता पर लग रहे प्रश्नचिन्ह

आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों उन याचिकाओं पर बहस चल रही है, जो 103वें संविधान संशोधन द्वारा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने के विरुद्ध दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को संविधान के विरुद्ध बताते हुए दलील दी है कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक असमानता या जातीय भेदभाव को दूर करना था, न कि आर्थिक सहायता पहुंचाना। उन्हें इस बात पर भी एतराज है कि ईडब्ल्यूएस को दिये आरक्षण से जातीय आधार पर पहले से आरक्षण प्राप्त कर रहे वर्गों को अलग क्यों रखा गया है, जबकि आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग तो उनमें भी हैं।इन दलीलों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो अभी नहीं आया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने याचिकाकर्ताओं से इतना ज़रूर पूछा है कि गरीबों के लिए आरक्षण संविधान के खिलाफ कैसे है?

Questions over effectiveness of reservation

आरक्षण का बढता दायरा

लेकिन इन तमाम बहसों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें यह बात सिरे से नदारद रहती है कि आरक्षण की व्यवस्था देश में पिछले 72 वर्षों से लागू है और लगातार इसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। पहले यह केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों (एससी-एसटी) के लिए कुल 22.5 प्रतिशत था। फिर मंडल आयोग की सिफारिशों के आलोक में इसमें अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए भी 27 प्रतिशत आरक्षण जोड़ा गया। फिर ईडब्ल्यूएस के लिए भी 10 प्रतिशत आरक्षण आ गया। बढ़ते-बढ़ते आज देश में 59.5 प्रतिशत आरक्षण लागू है और अब भी इसका अंतिम छोर दिखाई नहीं दे रहा।

पिछले वर्षों में अनेक जातियों और समुदायों ने आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन किये हैं, जिनमें अनेक बेगुनाह लोगों की जानें भी गई हैं। इनमें जाट, पटेल और कापू जैसे कई समुदाय शामिल हैं। हाल यह है कि अनेक राजनीतिक दल अब यह कह रहे हैं कि जिसकी जितनी आबादी है, उसको सरकारी नौकरी में उतना आरक्षण मिलना चाहिए। इसी के मद्देनज़र देश में जातीय जनगणना की मांग भी ज़ोर पकड़ने लगी है। यह एक ऐसी मांग है जो 100 प्रतिशत आरक्षण पर जाकर भी खत्म नहीं होगी, क्योंकि फिर विभिन्न वर्गों के अंदर यह असंतोष भड़केगा कि व्यावहारिक रूप से कुछ जातियों को आरक्षण का ज्यादा लाभ मिल रहा है, कुछ जातियों को कम।

क्रीमी लेयर तय किये जाने की दिक्कतों के कारण पहले से ही उलझन की स्थिति बरकरार है। जहां कुछ परिवारों के कई-कई लोग और कई-कई पीढ़ियां आरक्षण का लाभ प्राप्त किये जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अनेक जरूरतमंद परिवार ऐसे भी हैं, जिन्हें आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिल सका है। यानी यदि आरक्षण का उद्देश्य कुछ वर्गों और जातियों के लोगों को अवसरों की समानता उपलब्ध कराना था, तो यह स्वयं में असमानता पैदा कर रहा है। यह उन लोगों, जातियों और समुदायों के समानता के अधिकार का उल्लंघन तो है ही, जिन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा।

आरक्षण से हमने क्या प्राप्त किया?

कायदे से आज विमर्श इस बात पर होना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था से पिछले 72 वर्षों में हमने क्या प्राप्त किया है? इसके द्वारा उन उद्देश्यों को प्राप्त करने में और कितने साल या दशक लगेंगे, जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी? क्या भारत में आरक्षण-प्राप्त कोई जाति या वर्ग ऐसा है, जो 72 साल बाद भी यह कहने की स्थिति में हो कि आरक्षण के उद्देश्यों को हमने प्राप्त कर लिया है और अब हमें आरक्षण की जरूरत नहीं है या अब यह उन लोगों, जातियों और वर्गों को दिया जाए, जिन्हें इसकी हमसे अधिक ज़रूरत है?

यदि इसका उत्तर "नहीं" है तो इसका मतलब साफ है कि आरक्षण को एक ऐसी "आउट ऑफ वे" सुविधा या सहूलियत के रूप में देखा जा रहा है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहता। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित होता है कि किसी प्रतियोगिता में पिछड़ने के बावजूद कोई व्यक्ति केवल जातीय या आर्थिक आधार पर उस प्रतियोगिता में बेहतर करने वाले लोगों से अधिक लाभ पा सकता है। न्याय के तकाजे से देखा जाए, तो यह उन तमाम बेहतर प्रदर्शन करने वाले लोगों के साथ अन्याय, असमानता और भेदभाव को सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था बन जाती है।

इसलिए जातीय या आर्थिक किसी भी आधार पर आरक्षण दिये जाने से ज्यादा आज यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि देश में एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू हो, जो सबके लिए समान, अनिवार्य और मुफ्त हो। इससे सरकारों को शिक्षा का बजट तो अवश्य बढ़ाना पड़ेगा, लेकिन व्यवस्था सबके लिए एक समान, भेदभाव-मुक्त और अधिक पारदर्शी बन सकेगी। यह आरक्षण से अधिक प्रभावी और परिणामदायी व्यवस्था सिद्ध हो सकती है।

आरक्षण चाहे जातीय आधार पर हो या आर्थिक आधार पर - दोनों के फायदे कम हैं, कमियां अधिक हैं। जातीय आधार पर आरक्षण ने देश में जातिवाद को पहले से अधिक मज़बूत कर दिया है एवं देश की राजनीति को पूरी तरह से जाति-केंद्रित बना दिया है। जातीय आधार पर आरक्षण की वकालत करने वाले लोग एक तरफ जहां चार वर्णों वाली कथित मनुवादी वर्ण व्यवस्था का विरोध करते हैं, और कथित मनु-स्मृति को जलाते रहते हैं, वहीं लगभग चार हज़ार जातियों वाली व्यवस्था से वे बाहर ही नहीं आना चाहते। यह विरोधाभास केवल और केवल जातीय आरक्षण की वजह से पैदा हुआ है। लोग जातिवादी व्यवस्था में घुट तो रहे हैं, लेकिन आरक्षण के लोभ के कारण इससे बाहर भी आना नहीं चाहते।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की दो बड़ी दिक्कत

इसी तरह आर्थिक आधार पर आरक्षण के साथ भी कम से कम दो बड़ी दिक्कतें हैं। एक तो अगर सिस्टम और समाज को इसकी लत लग गई, तो इसे भी कभी खत्म नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि आर्थिक असमानता एक ऐसी सच्चाई है, जो सृष्टि के आरंभ से कायम है और सृष्टि के अंत तक कायम रहेगी। समाज में अमीर और गरीब दो वर्ग हमेशा रहेंगे। किसी भी तरह के प्रयास से इन दोनों वर्गों को कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि गरीबी केवल अभाव का ही नाम नहीं, भाव का भी नाम है और सापेक्ष भी है।

दूसरी दिक्कत यह है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण होने से इसका दायरा केवल हिन्दू जातियों तक ही सीमित नहीं रह जाएगा, बल्कि तमाम संप्रदायों तक फैल जाएगा। यानी परजीविता की एक ऐसी बीमारी, जो सभी जातियों, संप्रदायों को अपनी चपेट में ले लेगी। इसलिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने से ज्यादा आवश्यक यह है कि गरीबी को कम करने के प्रयासों के साथ-साथ जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों पर भी बल दिया जाए। क्योंकि भारत में अति-गरीबी की समस्या जनसंख्या के अति-विस्फोट से भी सीधी जुड़ी हुई है। जिन परिवारों ने सुविधा और संसाधनों के अभाव के बावजूद अनेक बच्चे पैदा कर लिये हैं, वे गरीबी का रोना कैसे रो सकते हैं और इस आधार पर सरकार से विशेष सुविधाओं और सहायता की मांग कैसे कर सकते हैं? क्या इस देश में हम एक ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहते हैं, जिसमें सरकारें कम बच्चे पैदा करने वाले लोगों का शोषण करके अधिक बच्चे पैदा करने वालों की सहायता करने के लिए बाध्य हो?

दोहरा आरक्षण पाने की चाह

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण के विरोध में दी जा रही दलीलों में भी इन बड़ी और बुनियादी बातों का कोई ज़िक्र नहीं है। याचिकाकर्ताओं की दलीलों से पता चलता है कि यदि इसमें पहले से ही जातीय आधार पर आरक्षण पा रहे वर्गों को भी शामिल कर दिया जाए, तो उनका विरोध समाप्त हो जाएगा। यानी कुछ लोगों को अब जातीय आधार पर भी आरक्षण चाहिए और आर्थिक आधार पर भी।
कहना नहीं होगा, कि आरक्षण एक ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्तियों और समाजों को पंगु बनाती है। इसे प्राप्त करने की लालसा कभी खत्म नहीं होती, निरंतर बढ़ती ही चली जाती है। और इसका अंतिम परिणाम यह होता है कि कुछ परिवार और राजनीतिक दल भले इसका फायदा उठा लेते हैं, लेकिन समाज वहीं का वहीं रह जाता है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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