BJP State Presidents: भाजपा ने क्यों बनाया बाहरी नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष?

BJP State Presidents: भारतीय जनता पार्टी ने चार राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष बदले हैं| जिनमें केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री जी. कृष्ण रेड्डी को उनके गृह राज्य तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है, वहीं पूर्व केन्द्रीय मंत्री और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी को झारखंड का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है| ये दोनों ही भाजपा के पुराने कार्यकर्ता हैं, हालांकि बाबू लाल मरांडी एक बार भाजपा छोड़ गए थे| बाकी दोनों नए प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस से भाजपा में आए हैं| यह पहली बार हुआ है कि बाहर से आए दो नेताओं को पार्टी की प्रदेश ईकाईयों की कमान दे दी गई है, जिसकी संगठन के भीतर काफी आलोचना हो रही है|

भाजपा में एक विभाजन रेखा रही है कि दूसरे दलों से आए जमीनी आधार वाले नेताओं को सत्ता में भागीदार तो बनाया जाता था, लेकिन संगठन में निर्णायक भूमिका वाली जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी| पार्टी संगठन पर विचारधारा का नियंत्रण रहे, इसके लिए राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक पार्टी के संगठन महामंत्री पद पर संघ से लाए गए प्रचारक ही रहते हैं| संगठन में नियुक्तियों के मामले में राष्ट्रीय अध्यक्ष उनकी सलाहों पर अमल करते थे|

what bjp strategy behind make outside leaders as state presidents?

दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को प्रवक्ता बनाया जाता था या भर्ती वाले पदों पर बिठाया जाता था, जैसे उपाध्यक्ष या सचिव| महामंत्री या प्रदेश अध्यक्ष जैसी जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी| लोकदल और कांग्रेस से होते हुए भाजपा में आए सत्यपाल मलिक को भी पहले राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था, वहीं से वह अमित शाह के नजदीक आए और राज्यपाल बन गए| उन्होंने राज्यपाल पद पर रहते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था| तृणमूल कांग्रेस से आए मुकुल रॉय को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था, उन्हीं के साथ तृणमूल कांग्रेस से आए अनुपम हाजरा को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया था| इन दोनों ने पार्टी के वरिष्ठ पदों पर रहते हुए पार्टी छोड़कर भाजपा की किरकिरी करवाई|

बीजू जनता दल से आए बैजयंत पांडा को भी उपाध्यक्ष बनाया गया था, वह अभी भाजपा में बने हुए हैं| लेकिन 2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई पुरंदेश्वरी देवी को पहले उपाध्यक्ष और बाद में 2020 में राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया और अब आंध्र प्रदेश के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई है| वह आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम के संस्थापक अध्यक्ष एन.टी. रामाराव की बेटी और पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की साली हैं|

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जब 1996 में अपने ससुर और पार्टी संस्थापक एन.टी. रामाराव का तख्ता पलट कर चंद्रबाबू नायडू मुख्यमंत्री और टीडीपी के अध्यक्ष बन गए थे, तब पुरंदेश्वरी देवी और उनके पति वेंकटेश्वर राव भी उनके साथ थे, लेकिन चन्द्रबाबू नायडू ने अपनी साली और साढू का इस्तेमाल करके पार्टी से निकाल बाहर किया था| तब दोनों कांग्रेस में शामिल हो गए थे| पुरंदेश्वरी देवी 2004 और 2009 में कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा सदस्य और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री थी| 2014 में आंध्र प्रदेश के बंटवारे के विरोध में वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थी|

पुरंदेश्वरी देवी का अपने जीजा चंद्रबाबू नायडू से राजनीतिक तौर पर छत्तीस का आंकड़ा है| चंद्रबाबू नायडू विपक्षी दलों से दूरी बनाए हुए हैं और एनडीए में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं| इससे पहले चर्चा यह थी कि पूर्व उपराष्ट्रपति वैंकयानायडू के साढू सत्य कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाएगा| मौजूदा राष्ट्रीय सचिव सत्य कुमार को चन्द्रबाबू नायडू के नजदीकी और जगन मोहन रेड्डी के विरोधी के तौर पर जाना जाता है|

सत्य कुमार के बजाय पुरंदेश्वरी को आंध्र प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाने का मतलब यह निकलता है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व चन्द्रबाबू नायडू की बजाए जगनमोहन रेड्डी को अपने पाले में लाना चाहता है| पुरंदेश्वरी देवी की नियुक्ति जगनमोहन रेड्डी की दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से पांच जुलाई को होने वाली मुलाक़ात से ठीक पहले की गई| हालांकि मुलाक़ात का समय खुद जगन मोहन रेड्डी ने मांगा था, लेकिन संसद सत्र से ठीक पहले हुई इन मुलाकातों के राजनीतिक मायने हैं, क्योंकि भाजपा को दिल्ली प्रशासन नियंत्रण वाला अध्यादेश पास करवाने के लिए जगनमोहन रेड्डी का समर्थन चाहिए|

झारखंड के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए बाबूलाल मरांडी विश्व हिन्दू परिषद में सक्रिय तौर पर काम करने के बाद 1991 में भाजपा से जुड़े थे| भाजपा ने उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, अटल-आडवानी ने बाबू लाल मरांडी को झारखंड मुक्ति मोर्चा के सामने प्रोजेक्ट किया था| वह उसमें सफल भी रहे, 1998 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन को लोकसभा चुनाव में हरा कर आदिवासी संथाल परगना में भाजपा के लिए जमीन तैयार की|

दूसरी बार सांसद बनने पर वाजपेयी ने 1999 में उन्हें अपनी सरकार में मंत्री बनाया और बाद में 2002 में झारखंड राज्य बनने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बना कर भेजा गया। लेकिन 2005 में पार्टी की गुटबाजी के चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया, तो उन्होंने भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा बनाया था| लेकिन 2019 में बाबू लाल मरांडी के भाजपा में लौटते ही पार्टी के भीतर के समीकरण बदल गए| पहले उन्हें झारखंड में विपक्ष का नेता बनाया गया और अब चुनावों से ठीक पहले उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने मजबूत आदिवासी चेहरे के रूप में प्रस्तुत कर दिया है|

कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ को पंजाब प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाकर भाजपा आलाकमान ने दो राजनीतिक कदम उठाए हैं| जहां जाखड के रूप में पंजाब में भाजपा को नया हिन्दू चेहरा मिला है, वहीं राजस्थान विधानसभा चुनाव के वक्त मौके पर चौका मारा है| सुनील जाखड़ राजस्थान के जाटों को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं| वह पंजाब के हिन्दू जाट हैं, जिनके परिवार की राजस्थान और हरियाणा के जाटों से रिश्तेदारियां हैं|

सुनील जाखड़ का गांव पंजकोसी राजस्थान की सीमा से सिर्फ 10 किलोमीटर पर है, भले ही वह पंजाब की अबोहर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है, लेकिन उस पूरे इलाके में हिन्दी बोली जाती है और राजस्थानी परंपराओं का बोलबाला है| सुनील जाखड़ के पिता बलराम जाखड़ पहली बार 1972 में कांग्रेस की टिकट पर अबोहर विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे| वह पहली बार जीत कर ही ज्ञानी जेल सिंह के मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री बन गए थे| 1977 में जब कांग्रेस पंजाब में हार गई थी, बलराम जाखड़ तब भी जीते थे और विधानसभा में विपक्ष के नेता बने थे|

आपातकाल के बाद जब मोरारजी सरकार इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करना चाहती थी, तब बलराम जाखड़ ने दिल्ली में इंदिरा गांधी के समर्थन में हरियाणा और राजस्थान के जाटों का जोरदार प्रदर्शन करके गिरफ्तारी दी थी| इंदिरा गांधी उनसे इतना प्रभावित हुई थीं कि 1980 में उन्हें फिरोजपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़वा दिया| पंजाब की फिरोजपुर लोकसभा सीट से न उनसे पहले कोई हिन्दू जीता था, न बाद में कभी जीता| इंदिरा गांधी ने पहली बार जीत कर लोकसभा पहुंचे बलराम जाखड़ को लोकसभा का स्पीकर बना दिया था|

1984 में आपरेशन ब्ल्यू स्टार के कारण माहौल कांग्रेस के खिलाफ था, फिरोजपुर से कोई सिख ही जीत सकता था, इसलिए राजीव गांधी ने फिरोजपुर से गुरदयाल सिंह ढिल्लों को कांग्रेस टिकट दिया| जबकि बलराम जाखड़ को राजस्थान की जाट बहुल सीकर सीट से टिकट दिया गया| बलराम जाखड़ राजस्थान में भी जाटों के समर्थन से चुनाव जीत गए और फिर लोकसभा अध्यक्ष बने| वह लगातार दो बार लोकसभा अध्यक्ष रहने वाले अब तक के पहले और आख़िरी स्पीकर रहे हैं|

1980 के बाद सुनील जाखड़ के पिता बलराम जाखड़ की राजनीतिक कर्मभूमि राजस्थान ही रही| हालांकि 1989 में बलराम जाखड़ अपने ही रिश्तेदार और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल से सीकर का लोकसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन 1991 में फिर सीकर से जीते और केंद्र में देवी लाल की जगह पर ही कृषि मंत्री बने| 1998 में बलराम जाखड़ बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीते, लेकिन 1999 में सीकर से हार गए| 2004 में बलराम जाखड़ ने राजस्थान की चुरू सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए| तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार बन गई थी, तो उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया था|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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