तपती धरती तड़पते लोग
Badhti Garmi: बेंगलुरु में पानी की किल्लत, ब्राजील की बाढ़, दुबई में बेतहाशा बारिश, उत्तराखंड में लगातार लहकते-जलते जंगल और भारत में विभिन्न इलाकों में लू (हीट वेव) की बढ़ती आक्रामकता से तपती धरती चिंता का सबब बने हुए हैं।
जलवायु बदलाव के ऐसे बहुपक्षीय दुष्परिणामों से दुनिया चिंतित है। इसे लेकर जहां-तहां बौद्धिक विमर्श तो आयोजित होते रहे हैं लेकिन समाधान के लिए जो ठोस पहल होनी चाहिए, उसका सर्वथा अभाव है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्रों में जलवायु संकट को प्रमुखता से रेखांकित करेंगे लेकिन भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के दस्तावेजों में यह मसला महज खाना पूर्ति की तरह एक कोने में दुबका हुआ है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोगों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने का मौलिक अधिकार है, और यह अधिकार स्वाभाविक रूप से जीवन के अधिकार और समानता के अधिकार से प्राप्त है। संविधान में इसकी गारंटी दी गई है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि लोगों के स्वच्छ हवा या स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को भारतीय न्याय शास्त्र में पहले से ही बहुत अच्छी तरह से मान्यता दी गई है और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती तबाही को देखते हुए इसके खिलाफ सुरक्षा का अधिकार बनाना आवश्यक था। क्योंकि प्रतिकूल प्रभाव अपने आप में विशिष्ट अधिकार है।
शीर्ष अदालत के इस फैसले से न केवल जलवायु परिवर्तन को लेकर आम जनता में जागरूकता बढ़ने की बात की गई बल्कि यह भी उम्मीद की गई कि लोग सरकार और संस्थाओं से इस मामले में जवाबदेह कार्यवाही की भी मांग करेंगे। आशा जगी कि सरकार और संस्थाएं ठोस पहल कर आम जन को राहत पहुंचाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाएंगी।
देश का आम जन-जीवन जलवायु बदलाव से उत्पन्न होने वाले खतरों की हद में है। समय-समय पर दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया हर पल, हर दिन, हर महीने, हर साल बदल रही है। पिघलते ग्लेशियर, चटखते हिमखंड और सर्दी गर्मी जैसे हर मौसम में पारा का थोड़ा और ऊपर उछल जाना, यह सब हमें उस भविष्य की ओर ले जा रहे हैं जहां से लौटना शायद मुमकिन न रह जाए।
मालूम हो कि दुनिया के लगातार गर्म होते जाने की जानकारी कोई नई नहीं है। वर्ष 1824 में ही जोसेफ कोरियर ने बताया था कि धरती पर यदि कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ेगी तो धरती का तापमान बढ़ेगा। फलस्वरुप ध्रुवीय हिमखंड पिघल सकते हैं। लेकिन पिछले 200 वर्षों में हमने कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए कुछ नहीं किया। विकसित देशों ने तो घटाने की बजाय अपने बेतहाशा उपभोग के कारण इसे बढ़ाकर चरम पर पहुंचा दिया।
एक अनुमान के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग जिस रफ्तार से बढ़ रही है उसमें 60% से अधिक का योगदान केवल कुछ गिने चुने अमीर देशों का ही है। इसके असली और सर्वाधिक गुनहगार वही है। ऐसे में गरीब और विकासशील देशों का मानना है कि इसको रोकने की शुरुआत विकसित देशों को ही करनी चाहिए। लेकिन लगे हाथ कुछ पर्यावरणविदों का यह भी कहना है कि विकसित देशों ने जिस जीवनशैली को अपना लिया है उसे रातों-रात छोड़ना उनके लिए आसान नहीं है। ऐसे में उन देशों की ओर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए जो तेजी से ग्रीन हाउस गैस को बढ़ाने वाली शैली को अपना रहे हैं। लेकिन यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विकासशील अथवा अविकसित देश यह जोखिम ले सकते हैं कि वे ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए अपनी विकास यात्रा को ही रोक दें।
आईपीसीसी जो विश्व के जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर में हो रहे शोधों का विश्लेषण कर बड़े निष्कर्ष प्रकाशित करती है, के अनुसार 2023 का वर्ष पिछले लगभग एक लाख साल में सबसे गर्म बरस रहा। यहां तक की जून 2023 से पिछले मार्च 2024 तक लगातार 8 महीने में तापमान रिकार्ड स्तर पर बढ़ता रहा। विश्व का औसत तापमान इस दौरान सामान्य से 0.2 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक था जो बहुत ही असामान्य है। इस साल का मार्च वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म महीना था, औसत तापमान 14.4 डिग्री सेल्सियस था जो मार्च 2016 में पिछले उच्च तापमान से 0.16 डिग्री अधिक था। जलवायु परिवर्तन का सीधा असर फसलों, पीने के पानी की उपलब्धता, बाढ़ और सुखा, भूस्खलन जैसी उग्र घटनाओं पर पड़ता है, वहीं निर्धन परिवारों की स्थिति और विकट हो जाती है।
गर्मी के अधिक प्रकोप के समय भी खेत मजदूर, निर्माण मजदूर, सफाईकर्मी खुले में घंटे मेहनत करने को मजबूर होते हैं, क्योंकि इसके बिना वे अपने परिवार का पेट नहीं भर सकते। किसान तो फिर भी अपने कार्य के समय को मौसम के अनुसार निर्धारित कर लेते हैं लेकिन दूसरों के यहां मजदूरी करने वालों को प्रायः उनकी बात माननी ही होती है। उनका अधिकांश कार्य विशेष कर मार्च से जून तक घोर गर्मी में ही होता है।
इंसानी हरकतें कुदरत को रौद्र रूप दिखाने पर मजबूर कर रही है। वैसे तो चरम मौसमी घटनाओं का समूचा पैटर्न ही भयावह परिणाम दिखाने वाला है, लेकिन जिस प्रकार से जैव विविधता पर असर पड़ रहा है और हमारे खान-पान की चीजों का स्वाद और उसके पोषक तत्वों में बदलाव आ रहा है, वह मानवीय अस्तित्व के लिए बड़े खतरे की तरह है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मौसम के खेल से बेखबर सरकारें पर्यावरण संरक्षण का काम सिर्फ कागजों में ही करती रही हैं। अब तो कागजों में भी महज खानापूर्ति है।
भाजपा का घोषणापत्र मुख्य रूप से मौजूद पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन कार्यक्रमों के विस्तार पर केंद्रित है। वहीं कांग्रेस का घोषणा पत्र पर्यावरण मानकों और जलवायु नीतियों को निर्धारित और लागू करने के लिए एक स्वतंत्र संरक्षण और जलवायु परिवर्तन प्राधिकरण बनाने की बात करता है। बीजेपी की नकल पर कांग्रेस ने भी वर्ष 2070 तक नेट जीरो हासिल करने का लक्ष्य रखा है। त्वरित कदम उठाने या कोई ठोस कार्रवाई किए जाने का वादा कहीं भी नहीं है।
लेकिन अब हाथ पर हाथ धर कर बैठने और एक दूसरे पर दोषारोपण करने का समय निकल चुका है। पर्वत शिखरों में जमी बर्फ के पिघलने की रफ्तार अप्रत्याशित ढंग से बढ़ गई है। यह और न बढ़ने पाए इसके लिए अब तुरंत कदम उठाने का समय आ गया है। हमारा पिछला रिकॉर्ड चाहे जितना भी खराब क्यों ना हो लेकिन हम इसका कोई और समाधान अब भी निकाल सकते हैं बशर्ते सीमा, विश्व व्यापार, क्षेत्रीयता, पराए धन पर नजर गड़ाने एवं सभ्यताओं की जंग जैसे बेवजह के झगड़ों को ही सब कुछ मानकर हम इस चुनौती को ही ना भूल जाए।
मानव सभ्यता और इस सुंदर सृष्टि को बचाना इस दशक का और इस सदी का सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए, क्योंकि अब इसका कोई विकल्प नहीं है। जिस तरह भारतीय 'योग' को अपनाकर दुनिया के लोग लाभान्वित हो रहे हैं, उसी तरह भारतीय जीवन शैली के 6 सूत्रों जिसमें त्याग के साथ उपभोग, अपने को सभी जीवो में देखना, एक सत्य का विविध रूपों में प्रकटीकरण, सभी सुखी रहें, वसुधैव कुटुंबकम् तथा पृथ्वी मेरी मां है एवं मैं पृथ्वी का पुत्र हूं, शामिल है, को आत्मसात कर मानवता के समक्ष खड़े जलवायु बदलाव के बहुकोणीय संकटों से बचा जा सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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