हम शर्मिंदा हैं कि हम इस 'जहरीली दुनिया' में अव्वल हैं

नई दिल्ली। 2 मार्च को इंडिया टुडे कॉनक्लेव में पीएम नरेंद्र मोदी ने इस समूह के टीवी चैनल का टैग लाइन 'सबसे तेज' से अपनी सरकार के कामकाज की तुलना की थी और अपनी उपलब्धियों को 'सबसे तेज' के तौर पर पेश किया था। मसलन पीएम मोदी ने कहा था कि हमारी सरकार सबसे तेज ऑप्टिकल फाइबर, सबसे तेज एफडीआई, सबसे तेज स्वच्छता का माहौल....बना रही है। मगर, 50 घंटे भी नहीं हुए होंगे जब दुनिया में सबसे प्रदूषित राजधानी के रूप में दिल्ली उभरकर सामने आ गयी। साबित ये हुआ कि मोदी सरकार सबसे तेज प्रदूषित राजधानी और शहर भी बना रही है।

हम शर्मिंदा हैं कि हम इस जहरीली दुनिया में अव्वल हैं

एनजीओ ग्रीन पीस की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर गुरुग्राम भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र- एनसीआर- का हिस्सा है। जो टॉप के 6 प्रदूषित शहर हैं उनमें 5 भारत से हैं। इनमें भी दिल्ली समेत एनसीआर के पांच शहर हैं-गुरुग्राम, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद और नोएडा। इसके अलावा राजस्थान का भिवाड़ी इस सूची में शामिल हैं। हालांकि बतौर शहर दिल्ली का नम्बर 11वां है जो राजधानी के रूप में दुनिया में पहले नम्बर पर है। दुनिया के 10 ट़ॉप के प्रदूषित शहर में 7 भारत से हैं, दो पाकिस्तान से और एक चीन से है।

केजरीवाल को ठहराएं दोषी या मोदी को?

केजरीवाल को ठहराएं दोषी या मोदी को?

बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। इस हिसाब से गुरुग्राम और फरीदाबाद के लिए मनोहर लाल खट्टर और गाज़ियाबाद व नोएडा में प्रदूषण के लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार को दोषी ठहराया जाना चाहिए। राजस्थान में भिवाड़ी का नाम है इसलिए नव निर्वाचित अशोक गहलोत सरकार का भी नाम जिम्मेदार के तौर पर लिया जा सकता है।

दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी के तौर पर जब नयी दिल्ली का नाम सामने है तो उसकी जवाबदेही दिल्ली सरकार, जिसे पूर्ण राज्य का दर्जा तक हासिल नहीं है, पर थोपना दरअसल प्रदूषित राजनीतिक विचार ही माना जाएगा। आश्चर्य है कि बनारस को क्योटो बनाने का सपना दिखा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वच्छता मिशन चला रहे पीएम मोदी, गांव-गांव में शौचालय बना रहे मोदी राष्ट्रीय राजधानी की दुर्दशा पर ध्यान नहीं दे सके। राष्ट्रीय राजधानी के अलावा एनसीआर के जो चार शहर हैं वे सभी दुनिया के प्रदूषित शहरों में टॉप के शहर हैं। यह ऐसी विफलता है जो ‘सबसे तेज' विकास का एन्टी क्लाइमेक्स कहा जा सकता है जिसका ज़िक्र न पीएम ने किया और न आगे वे कर पाएंगे।

रहने लायक नहीं रह गयी है दिल्ली

रहने लायक नहीं रह गयी है दिल्ली

दिल्ली की हालत अचानक ऐसी नहीं हुई है। 2017 में कोस्टारिका की राजदूत दिल्ली में स्मॉग की वजह से बीमार हो गयीं थी, तब उन्हें बेंगलुरू जाना पड़ा। तब नवभारत टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में दलबीर भंडारी की नियुक्ति के लिए भारत की ओर से राजनयिक संपर्क तेज करने की जरूरत समझी जा रही थी, मगर दुनिया भर के राजनयिक राजधानी दिल्ली में नहीं मिल रहे थे। किसी न किसी बहाने से ज्यादातर राजनयिक दिल्ली से तब दूर थे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 में दिल्ली को ‘गैस चेम्बर' में बदल चुकी राजधानी बताया था। बात सिर्फ राजधानी या एनसीआर की नहीं है। प्रदूषण से दुनिया में सबसे ज्यादा लोग भारत में ही मर रहे हैं। यह बात भी द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन की रिपोर्ट में सामने आ चुकी है। इस भयावह सच्चाई ने देश को चौंका दिया कि है कि वायु प्रदूषण की वजह से हर मिनट में दो लोगों की जान जाती है। यह तथ्य तब है जब अध्ययन का आधार ताजा आंकड़े नहीं, 2010 के आंकड़े हैं।

दिल्ली के प्रदूषण में किस-किस का कितना योगदान

दिल्ली के प्रदूषण में किस-किस का कितना योगदान

· दिल्ली में 40 फीसदी प्रदूषण 1 करोड़ से ज्यादा गाड़ियां फैलाती हैं जिनमें 45 लाख गाड़ियां दिल्ली से बाहर की हैं। दिल्ली में गाड़ियों की औसत रफ्तार 20 से 22 किमी प्रति घंटा है। यह भी प्रदूषण का बड़ा कारण है।
· दिल्ली में 23 फीसदी प्रदूषण लैंडफिल साइट और उद्योगों के कारण है।
· 10 फीसदी प्रदूषण का कारण लैंडफिल साइट से उड़ने वाला धुआं, उड़ता कचरा और कचरे से बिजली बनाने वाले कारखाने शामिल हैं।
· 19 फीसदी प्रदूषण दूसरे राज्यों के धूल, धुंआ और प्रदूषण के कारण है।
· 12 फीसदी प्रदूषण का कारण कंस्ट्रक्शन, जलाने वाले कूड़े, शवदाह हैं।
· 6 फीसदी प्रदूषण रिहायशी इलाकों में निकलने वाले धुंए हैं।

दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना मुश्किल

दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना मुश्किल

वायुप्रदूषण की ये स्थिति बताती है कि दिल्ली में सांस लेना मुश्किल है। अगर हम अपने बच्चों को दिल्ली में रख रहे हैं, पढ़ा रहे हैं तो उनकी ज़िन्दगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। पानी का संकट भी दिल्ली में वैसा ही है। दिल्ली में पानी 100 मीटर तक गहरा चला गया है, ज्यादातर तालाब अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। नदी का जल इतना प्रदूषित है कि उपयोग के लायक नहीं रह गया है। इस स्थिति में चाहे प्रधानमंत्री चाहे जितना योग कर लें या करा लें, प्रदूषित हवा सेहत को कभी सुधार नहीं सकती। योग दिवस का क्या फायदा, स्वच्छता अभियान भी निरर्थक है और देश व दुनिया को सेहत का पाठ पढ़ाना भी ढोंग लगता है। अच्छा होता अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हवा को साफ-सुथरी करने पर जोर देते, औद्योगिक कचरा बंद कराते, लैंडफिल का विकल्प खोजते, इलेक्ट्रिक या इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियां चलवाते, ऑड-ईवन लागू कराते, ट्रैफिक की रफ्तार को बढ़ाते और दूसरे ऐसे उपाय करते जिससे राष्ट्रीय राजधानी के शहर रहने लायक हो जाता।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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