Vulgar Content: सॉफ्ट पोर्न हब बनते सोशल मीडिया प्लेटफार्म
Vulgar Content: आज से दो दशक पहले जब भारत में इंटरनेट युग की शुरुआत हो रही थी उस समय न सर्च इंजन होते थे और न ही सोशल मीडिया प्लेटफार्म। न्यूज वेबसाइट्स और ईमेल ही इंटरनेट रिवोल्यूशन के वाहक बने थे। लेकिन 2005 में गूगल प्रवेश के साथ इसका दायरा बढना शुरु हुआ। सर्च इंजन आया। यूनिकोडिंग के कारण अपनी भाषा में कन्टेन्ट देखने की सुविधा हुई। देखते ही देखते इंटरनेट एक रिवोल्यूशन बन गया।
पहले ब्लॉग, फिर सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने बड़े स्तर पर लोगों को अपने साथ जोड़ लिया। इंटरनेट एण्ड मोबाइल एसोसिएशन की इसी साल मई में आई रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट के कुल एक्टिव यूजर्स की संख्या 759 मिलियन (75.9) करोड़ हो गयी है। 2025 तक इनकी संख्या 90 करोड़ हो जाएगी। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में 39.9 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं तो शहरी क्षेत्र में 36 करोड़। महिला और पुरुष समान रूप से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और एसोसिएशन को उम्मीद है कि 2025 तक इंटरनेट पर उपभोक्ताओं की संख्या में भविष्य में जो बढोत्तरी होगी उसमें 65 फीसदी महिलाएं ही होंगी।

स्वाभाविक है महिला हो या पुरुष अब इंटरनेट वाला स्मार्टफोन उसका जीवनसाथी है। सूचना, मनोरंजन, काम, वित्तीय लेन देन अधिकांश मोबाइल और इंटरनेट के जरिए ही हो रहा है। ऐसे में न्यूडिटी और पोर्न कन्टेट की उपस्थिति नहीं होगी इसकी कल्पना नहीं करनी चाहिए। दुनिया के सभी देशों में पोर्न कन्टेट की मांग है और अनुमान है कि इंटरनेट पर लगभग 100 अरब डॉलर का कारोबार पोर्न कन्टेट से हो रहा है। यूरोप के देशों या अमेरिका के लिए यह कोई समस्या नहीं है बल्कि व्यक्ति की जरूरतों के हिसाब से एक सर्विस है जिससे पैसा पैदा होता है।
स्टैटिस्टा का डाटा है कि अकेले अमेरिका में 100 से अधिक कंपनियां पोर्न कारोबार में लगी हुई हैं और उनकी अपनी एक यूनियन भी है। वो इसे शुद्ध रूप से एक व्यापार के तौर पर संचालित करते हैं और दुनियाभर में उनके द्वारा बनाये गये कन्टेन्ट देखे भी जाते हैं। इन देशों के ऊपर संस्कृति या नैतिकता का कोई वैसा बोझ भी नहीं है कि वहां की सरकारें इसको रेगुलेट करने के लिए कड़े कदम उठायें। हां, बच्चों का इस्तेमाल इस व्यापार में न हो इसको लेकर अमेरिका ने जरूर कानून बना रखे हैं, बाकी का पोर्न कारोबार तो उनके लिए एक सॉफ्ट पॉवर जैसा है जिसका वो "टैक्टिकल" इस्तेमाल करना भी जानते हैं।
लेकिन भारत या चीन जैसे देशों के लिए इंटरनेट के जरिए आये इस पोर्न कारोबार से समस्या है। इसका कारण यहां की सामाजिक संरचना और लोगों की मनोदशा है। हमारे समाज में सेक्स या पोर्न सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं हैं तो सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय कैसे हो सकते हैं? इसलिए भारत जैसे देश में पोर्न कन्टेट को लेकर समय समय पर त्यौरियां चढती रहती हैं। कुछ साल पहले 2018 में केन्द्र सरकार ने 857 वेबसाइटों को बैन कर दिया था जिसमें अधिकांश पोर्न वेबसाइटें थीं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि भारत में पोर्न वेबसाइटों के प्रसार और इससे पैदा होनेवाले कारोबार पर कोई खास असर पड़ा नहीं।
सस्ते साहित्य के नाम पर 'मस्तराम की कहानियां' पढकर चरमसुख की कल्पना करनेवालों ने इसके लिए इंटरनेट पर नये नये तरीके खोज लिये। इन तरीकों में सॉफ्ट पोर्न एक बड़ा जरिया बना। ओटीटी प्लेटफार्म के उदय और सोशल मीडिया प्लेटफार्म के विस्तार ने भारत में सॉफ्ट पोर्न को एक बड़ी कारोबारी संभावना के रूप में पैदा कर दिया। यह भारत की मस्तराम मानसिकता के अनुरूप भी था और इसमें बहुत कानूनी अड़चन भी नहीं थी।
भारत के एक शोध संस्थान इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन ने इसी मुद्दे को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। "अनरेगुलेटेड कन्टेन्ट ऑन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स एण्ड इट्स इम्पैक्ट ऑन सोसायटी" में इस बात पर चिंता जाहिर की गयी है कि डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया प्लेटफार्म ऐसी जगह बन गये हैं जहां समाज के लिए आपत्तिजनक कन्टेन्ट परोसे जा रहे हैं। अगर इनका नियमन नहीं किया जाएगा तो इसका समाज पर बहुत बुरा असर होगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि फेसबुक के आंतरिक सर्वेक्षणों में यह बात सामने आयी थी कि सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफार्म के मुकाबले यूजर फेसबुक पर अधिक 'डिस्टर्बिंग कन्टेन्ट' देखते हैं।
इस तरह के कन्टेन्ट को लेकर फेसबुक द्वारा कुछ उपाय तो किये गये हैं लेकिन वो सजावटी और दिखावटी ही साबित हुए हैं। इसी तरह फेसबुक कंपनी से ही जुड़े दूसरे प्लेटफार्म इंस्टाग्राम, वाट्सएप्प भी पोर्न और सेमी पोर्न कन्टेट का अड्डा बन गये हैं। अध्ययनकर्ताओं की चिंता इस कन्टेन्ट से अधिक इनकी प्रस्तुति को लेकर है। इसमें भारतीय परिवार के सामाजिक रिश्तों में प्रेम संबंधों या यौन संबंधों को स्थापित होते हुए दिखाया जाता है जो जीजा साली और देवर भाभी से भी आगे निकल जाता है। दुर्भाग्य से ऐसी विषयवस्तु को देखनेवालों में एक गलत संदेश यह जाता है कि परिवार, समाज या रिश्तेदारों में भी यौन संबंध स्थापित किया जा सकता है।
डिजिटल मीडिया का एक दुष्प्रभाव यह है कि यहां जो देखा जा रहा है उसे व्यक्ति नितांत अकेले में देखता है। इसके कारण अगर यह किसी जिज्ञासु के लिए जानकारी का जरिया भी बन सकता है तो किसी पिपासु के लिए पाप का रास्ता भी खोल सकता है। लेकिन अमेरिका या यूरोप की जड़ों से निकली ऐसी कंपनियां सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को नहीं मानती या उन्हें जानबूझकर तोड़ना चाहती हैं। इसलिए बच्चों के यौन शोषण या उनकी नग्नता आदि से जुड़े कन्टेन्ट की रोकथाम के उपाय तो किये जाते हैं लेकिन 18+ के साथ बननेवाले सेमी पोर्न कन्टेन्ट में किसी प्रकार की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था का ध्यान नहीं रखा जाता।
इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन की रिपोर्ट डिजिटल मीडिया के रेगुलेशन के जरिए इस तरह के कन्टेन्ट को रोकने की दलील देती है लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही लगता है। भारत में पोर्नहब जैसी वेबसाइट को बैन किया गया है लेकिन इसी रिपोर्ट के मुताबिक लोग उसे वीपीएन पर देखते हैं। इंटरनेट पर ऐसे तमाम उपाय होते हैं कि आप किसी भी रेगुलेशन को आसानी से ध्वस्त कर देते हैं। फिर वो सरकारी कानून हों या कॉपीराईट के कानून। इंटरनेट के उपभोक्ता उसे तोड़ने का कोई न कोई रास्ता खोज ही निकालते हैं। जैसे टेलीग्राम एक मैसेजिंग एप्प के रूप में शुरु हुआ लेकिन अब इसका इस्तेमाल पोर्न कन्टेन्ट या फिर फ्री मूवीज को फैलाने के लिए ही अधिक किया जाता है।
फिर सोशल मीडिया प्लेटफार्म चाहे वह फेसबुक हो या यूट्यूब, ट्विटर हो, इंस्टाग्राम हो या टेलीग्राम, सबको यूजर चाहिए। वह यूजर क्या देखता है क्या पढता है इससे उनको कोई खास मतलब होता नहीं है। यही हाल सर्च इंजन का भी है। आप क्या सर्च करते हैं यह उनके लिए मुद्दा नहीं होता है। आप कुछ भी सर्च करने के लिए उनके पास आते हैं, वो बस इतना ही चाहते हैं। इंटरनेट का यूजर ही मार्केट है। वह नहीं रहेगा तो किसी का कारोबार नहीं चलेगा।
ऐसे में सोशल मीडिया का अत्यधिक लीगल रेगुलेशन अंतत: इस मार्केट को ही कमजोर करेगा, जो कंपनियां कभी होने नहीं देना चाहेंगी। फिर ओटीटी से लेकर सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया तक पोर्न कन्टेन्ट का उपभोग भारत और चीन जैसे देशों में ही इतना अधिक क्यों हो रहा है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। देखनेवाले लोग हैं तभी ये कन्टेन्ट बन भी रहे हैं और कमाई भी कर रहे हैं। सरकार एक जगह कुछ रेगुलेशन ले आती है तो लोग दूसरा रास्ता खोल लेते हैं। उल्लू जैसे कुछ ओटीटी प्लेटफार्म इसी का उदाहरण है जो 100 करोड़ सालाना कमाई कर रहे हैं।
यहां एक बात और ध्यान रखने की है कि पोर्न कन्टेन्ट एक समय के बाद किसी के लिए भी अर्थहीन हो जाते हैं। इंटरनेट पर बहुत से लोग इसे चोरी छिपे देख रहे हैं तो बहुत से लोग उपलब्ध होने के बाद भी उसे देखना पसंद नहीं करते। इंटरनेट की आभासीय दुनिया ही क्रमश: ऐसे लोगों को मैच्योर बना देती है। इस तरह के कन्टेन्ट वही देखता है जो देखना चाहता है। जो नहीं देखना चाहता, वह उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता।
इंटरनेट जनित इस आभासीय जगत के बारे में विचार करते समय हमें एक बात याद रखनी होगी कि इंटरनेट सूचनाओं के उस महाजंगल की तरह है जिसमें तरह तरह के जीव जंतु मौजूद हैं। यहां आनेवाले को बहुत संभलकर चलना होगा और इस जंगल में जिन्दा रहने की कला खुद सीखनी होगी। यही इस माध्यम की सच्चाई है, जिसे देर सबेर हमें समझना है और अपने आसपास के लोगों को भी समझाना होगा ताकि वो सूचनाओं और मनोरंजन के जंगल में किसी जहरीले जानवर के शिकार न बन जाएं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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