Uttar Pradesh Mafia: क्या अब माफिया मुक्त हो जाएगा उत्तर प्रदेश?
ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश से धीरे धीरे माफियाओं का अंत होता जा रहा है। मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या से जो सिलसिला चला वो मुख्तार अंसारी तक पहुंच गया है जिसकी जेल में ही हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी है। मुख्तार की मौत से एक सवाल यह जरूर उठता है कि क्या यूपी अब माफिया मुक्त हो जाएगा?
अगर हम यूपी में माफियाओं के इतिहास पर नजर डालें तो इसकी शुरुआत सत्तर के दशक में हरिशंकर तिवारी से होती है जिनकी पिछले साल ही मौत हुई है। इसके बाद नब्बे के दशक में जिन माफिया सरगनाओं का नाम तेजी से सामने आया उसमें श्रीप्रकाश शुक्ला वह पहला अपराधी था जिसने यूपी के प्रशासन को घुटने पर ला दिया था। उसे खत्म करने के लिए एक स्पेशल फोर्स का गठन करना पड़ा जिसे एसटीएफ कहा जाता है।

इसके बाद मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैया), कृष्णानंद राय, अतीक अहमद, अभय सिंह, प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी, विजय मिश्र, बबलू श्रीवास्तव, संजीव जीवा और धनंजय सिंह ऐसे नाम उभरे जो माफिया थे लेकिन बाहुबली बना दिये गये। राजनीति में उनकी दखल के कारण कुछ तो माननीय विधायक भी बन गये। इनमें से कई मारे जा चुके हैं। कुछ जेल में है और कुछ अपराध से विमुख होकर बिजनेस की ओर चले गये हैं।
अपराधियों, माफियाओं के बारे में कहा जाता है कि उनकी उम्र 40-50 साल से अधिक नहीं हुआ करती। इस उम्र तक आते आते या तो आपसी रंजिश का शिकार हो जाते हैं या फिर शासन प्रशासन की ओर से निपटा दिया जाता है। जिनके साथ ऐसा नहीं होता वो खुद ही अपराध का रास्ता छोड़कर या तो राजनीति में चले जाते हैं या ठेके पट्टे वाला बिजनेस व्यापार करने लगते हैं।
कुछ ऐसा ही इस समय उत्तर प्रदेश में हो रहा है। 9 जुलाई 2018 को बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या एक दूसरे माफिया सुनील राठी ने कर दी थी। राठी ने बजरंगी के सिर में 10 गोलियां दागी थीं। यह वह समय था जब योगी सरकार को सत्ता में सालभर हो गया था और प्रदेश भर में माफियाओं, गुण्डों, अपराधियों के खिलाफ ठोक दो वाली एनकाउण्टर नीति पर सख्ती से अमल कर रही थी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक बहुत सारे छुटभैया गुण्डों, शार्प शूटरों को इस अभियान के तहत निपटा दिया गया था। विकास दुबे का एनकाउण्टर तो देशभर में चर्चा का कारण बना था। इसी तरह संजीव जीवा भरी कचहरी में मार दिया गया। अतीक अहमद को भी इसी तरह दो छुटभैया अपराधियों ने पुलिस के बीच घुलकर गोली मार दी थी।
जो माफिया बच गये उन्होंने या तो सरेण्डर कर दिया था या फिर अपराध जगत से ही तौबा कर लिया था। इनके कमजोर पड़ते ही बड़े माफियाओं को भी संकट पैदा होने लगा क्योंकि इनके अपराध का कारोबार इन्हीं छुटभैया गुण्डों और शूटरों के भरोसे चलता था।
लेकिन योगी सरकार के निशाने पर वो बड़ी मछलियां भी थीं जिन्होंने राजनीति और अपराध का सहारा लेकर अरबों रूपये की बेनामी संपत्तियां खड़ी कर ली थी। इस कड़ी में सबसे पहले नंबर लगा इलाहाबाद के अतीक अहमद और गाजीपुर के मुख्तार अंसारी का। ये दोनों पहले से ही किसी न किसी अपराध में जेल में बंद थे और जेल से ही अपना आर्थिक और आपराधिक कारोबार चला रहे थे।
योगी सरकार ने सबसे पहले इनकी बेनामी संपत्तियों पर हमला बोला। जिन जिन शहरों में इनकी बेनामी संपत्तियां थीं उन्हें कुर्क किया जाने लगा। माफिया अपराध के जरिए जो पैसा कमाता है उसे रियलिटी या फिर ऐसे ही किसी अन्य व्यापार में लगाता है। इसलिए योगी सरकार के इस प्रहार से माफियाओं के आर्थिक साम्राज्य को धक्का लगा।
इस लिस्ट में ताजा नाम भदोही में ज्ञानपुर से विधायक विजय मिश्र का शामिल हुआ है जिनकी 113 करोड़ की संपत्ति मुख्तार की मौत से एक दिन पहले ही नीलाम कर दी गयी। 2020 में उन्हें एक स्टेज शो करनेवाली महिला से रेप का दोषी पाये जाने पर 15 साल की सजा सुनायी गयी है और वो जेल में ही हैं। उनकी नामी बेनामी संपत्तियों को या तो खंडहर बना दिया गया है या फिर उसे नीलाम किया जा रहा है।
अतीक, मुख्तार और विजय मिश्र की संपत्तियों पर तो कार्रवाई हुई लेकिन बृजेश सिंह, धनंजय सिंह और अभय सिंह जैसे माफिया कारोबारी ऐसी किसी कार्रवाई से अछूते रह गये। कभी मुख्तार को मारने की कोशिश से चर्चा में आनेवाले बृजेश सिंह पर दर्जनों हत्या के मुकदमे चले लेकिन अब वो सभी मुकदमों में बेदाग होकर घर पर रह रहे हैं और उड़ीसा से लेकर झारखण्ड तक अपना कारोबार कर रहे हैं। धनंजय सिंह जरूर चुनावी रंजिश में सजायाफ्ता मुजरिम बन गये हैं लेकिन जिस तरह से बंद हो चुके केस में उन्हें सजा सुनाई गयी है, उससे वो ज्यादा दिन अंदर रहेंगे ऐसा लगता नहीं है।
यूपी में माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई में ठाकुर माफियाओं का बच जाना या फिर उनकी नामी बेनामी संपत्तियों के खिलाफ वैसी कार्रवाई का न होना जैसा अतीक, मुख्तार या विजय मिश्र के खिलाफ हुई है, प्रदेश में कई सवालों को जन्म दे रहा है। आरोप है कि ठाकुर माफियाओं को योगी आदित्यनाथ सरकार में संरक्षण मिल रहा है। अगर धनंजय सिंह जेल गये भी हैं तो उसे लेकर पूर्वांचल के ठाकुर मतदाता अपनी नाराजगी दिखाने से नहीं चूक रहे।
सवाल यह उठता है कि क्या गुण्डों माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई में कहीं न कहीं जाति और धर्म देखा जा रहा है? अगर स्थानीय लोगों द्वारा उठाये जाने वाले ऐसे सवालों में जरा भी सच्चाई है तो उत्तर प्रदेश कभी भी माफिया मुक्त नहीं हो पायेगा। जो अपराधी होते हैं उनकी न कोई जाति होती है और न धर्म। उनका अपना स्वार्थ ही उनकी जाति होती है और उस स्वार्थ को पूरा करने के लिए किया जाने वाला अपराध उनका धर्म। अगर ऐसा न होता तो मुख्तार अंसारी के साथ कभी मुन्ना बजरंगी और अभय सिंह काम न करते।
2005 में मुख्तार ने जब भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या करवाई तो उसका मुख्य किरदार मुन्ना बजरंगी ही था। इस बात की सबसे पहली सूचना मुख्तार ने फैजाबाद जेल में बंद अभय सिंह को देते हुए कहा था कि 'काट लीन्हा।' यह काट लीन्हा उसने कृष्णानंद राय की चोटी के लिए कहा था क्योंकि हत्या करने के बाद मुन्ना बजरंगी ने बतौर सबूत कृष्णानंद राय की चोटी काट ली थी। चोटी ही कृष्णानंद राय की पहचान थी। अब अगर प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी अपने आपको हिन्दू मानता तो क्या वो मुख्तार के कहने पर कृष्णानंद राय की हत्या करके उनकी शिखा या चोटी काटकर ले आता?
पहले अतीक के मरने पर और अब मुख्तार के मरने पर मुस्लिम समुदाय द्वारा ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे उनका कोई मसीहा मर गया हो। जबकि सच्चाई इसके उलट है। अतीक अहमद धर्म से मुस्लिम जरूर था लेकिन जाति से ग्वाल था। इसलिए वो अपने आपको मुस्लिम के साथ साथ यादव भी मानता था। जहां तक मुख्तार अंसारी की बात है तो अपने अपराध जगत में वह हिन्दू मुसलमान का भेदभाव नहीं करता था। जो उसके साथ है वह उसका है, जो उसके विरोध में है वो उसका नहीं है फिर वह चाहे किसी जाति धर्म का हो।
लेकिन ऐसे माफियाओं और अपराधियों का जो लोग जातीय और धार्मिक आधार खोज रहे हैं उनकी मानसिकता ही वह समस्या है जिसे देखकर लगता है कि आज कुछ पेड़ जरूर गिरे हैं लेकिन यही मानसिकता रही तो फिर माफियाओं की नयीं कोंपले निकलेंगी। जातीय और धार्मिक विभाजन ही ऐसे अपराधियों को उभरने और फलने फूलने का मौका देती है जिसकी आड़ में वो अपने अपराध का कारोबार चलाते हैं।
जब तक यूपी और खासकर पूर्वांचल के लोग इस मानसिकता से बाहर नहीं निकलते इन माफियाओं की पैदावार होती रहेगी। यह जितना कानून व्यवस्था का मसला है उससे अधिक सामाजिक जड़ता का भी मामला है जो किसी अपराधी या माफिया को बड़े सम्मान से बाहुबलि कहकर संबोधित करता है और अपना कोई न कोई जातीय या धार्मिक रिश्ता भी जोड़ लेता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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