Uttar Pradesh BJP: यूपी में भाजपा का ऑपरेशन लोटस
लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में बहुत भारी उलटफेर हो रहा है।हालांकि विधानसभा चुनावों का लोकसभा चुनावों पर ज्यादा असर नहीं होता। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों से भाजपा सचेत हुई है, क्योंकि विधानसभा चुनावों में भले ही उसका वोट 39 प्रतिशत से बढ़ कर 41.29 और गठबंधन का 45 प्रतिशत हो गया था, लेकिन उसकी सीटें घटी हैं।
जबकि दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की सीटें और वोट प्रतिशत दोनों बढ़े हैं।भारतीय जनता पार्टी बारीकी से अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुंची थी कि समाजवादी पार्टी को यादवों के साथ साथ गैर यादव पिछड़ी जातियों का भी समर्थन मिला।

इसकी बड़ी वजह थी जाति आधारित छोटी पार्टियों के साथ सपा का गठबंधन और विधानसभा चुनावों के वक्त भाजपा के कई विधायकों और मंत्रियों का पार्टी छोड़ कर समाजवादी पार्टी में चले जाना।
2017 में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव समाज पार्टी भाजपा के साथ थी, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में वह सपा के साथ थी।इसके अलावा केशव देव मौर्य के महान दल, जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल, कृष्णा पटेल के कमेरावादी अपना दल और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ भी सपा ने गठबंधन किया था।इन सभी छोटी पार्टियों का कुछ कुछ सीटों पर जातिगत आधार है।नतीजा यह निकला कि सपा गठबंधन को 36 प्रतिशत वोट और 125 सीटें मिलीं।इनमें से सपा को 111 सीटें और 14 सीटें गठबंधन के सहयोगियों को मिलीं।
सपा की सहयोगी सुहेलदेव समाज पार्टी ने छह और राष्ट्रीय लोकदल ने आठ सीटें जीती, कमेरावादी अपना दल की एक उम्मीदवार सपा टिकट पर जीती, जबकि महान दल ने भी दो सीटों पर सपा टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन वह कोई सीट नहीं जीत पाई।भले ही सपा के सहयोगी दलों ने कुल मिलाकर सिर्फ 14 सीटें जीती थीं, लेकिन उनके साथ गठबंधन के कारण सपा को राज्य भर में गैर यादव पिछड़ों का समर्थन मिला।
भाजपा का विश्लेषण यह था कि अगर यह गठबंधन लोकसभा चुनावों में भी बना रहता है, तो भाजपा को छह सात लोकसभा सीटों का नुकसान हो सकता था।2019 के लोकसभा चुनाव और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के साथ सिर्फ संजय कुमार निषाद की निषाद पार्टी और अनुप्रिया पटेल का अपना दल था।अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में मंत्री हैं और संजय कुमार निषाद उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं।

भाजपा ने 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले ही इस बात को समझ लिया था, इसलिए इन दोनों दलों को अपने साथ गठबंधन में रखने के लिए भाजपा ने 14 सीटों पर अपने विधायकों का टिकट काट दिया था।नतीजे भी शानदार मिले थे, अनुप्रिया पटेल के अपना दल ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 15 पर जीत हासिल की।जबकि निषाद पार्टी के भी छह विधायक जीते थे।
अब भाजपा के सामने लक्ष्य साफ़ है कि समाजवादी पार्टी के साथ गए गैर यादव पिछड़े वर्ग को कैसे दुबारा एनडीए में लाया जाए।इसी लक्ष्य को साध कर ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव समाज पार्टी को वापस लाया गया है। वह 2018 में नाराज होकर एनडीए छोड़ गए थे।ओम प्रकाश राजभर का भाजपा के साथ जाना अखिलेश यादव के लिए बहुत बड़ा झटका है।उनके लिए दूसरा झटका यह है कि महान दल ने भी सपा का साथ छोड़कर बसपा का समर्थन करने का एलान कर दिया है।
भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनावों से पहले गैर यादव पिछड़ी जातियों को ज्यादा से ज्यादा अपने कुनबे में लाना चाहती है, ताकि 2019 में हुआ नुकसान 2024 में दोहराया न जाए।समाजवादी पार्टी के साथ जहां छोटी छोटी पार्टियां जुड़ी थीं, वहीं भाजपा के कई गैर यादव पिछड़ी जातियों के नेता भी विधानसभा चुनावों के वक्त समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।भाजपा ने उन्हें भी वापस लाना शुरू कर दिया है, दारा सिंह चौहान से शुरुआत हो गई है।चुनाव के समय वह भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे और वह समाजवादी पार्टी की टिकट पर विधायक चुने गए थे।
उन्होंने भाजपा में शामिल होने के लिए विधानसभा से ही इस्तीफा दे दिया है।शनिवार को वह अमित शाह से मिले और तुरंत विधानसभा से इस्तीफा दे दिया।सोमवार को उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली।केन्द्रीय मंत्रिमंडल की तरह योगी मंत्रिमंडल में विस्तार किया जाएगा, जिसमें ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान को भी मंत्री बना दिया जाएगा।वह पिछली योगी सरकार में भी मंत्री थे, भाजपा उन्हें घोसी सीट से लोकसभा का उम्मीदवार भी बना सकती है।दारा सिंह 1996 से 2006 तक राज्य सभा और 2009 से 2014 तक बसपा के लोकसभा के सदस्य रहे हैं।
भाजपा उम्मीदवार से 2014 का चुनाव हारने के बाद वह 2015 में भाजपा में शामिल हुए थे और 2017 में विधानसभा का चुनाव जीत कर मंत्री बने थे।दारा सिंह की भाजपा में वापसी पिछड़ा वोट बैंक की दृष्टि से फायदेमंद है, उतना ही समाजवादी पार्टी के लिए नुकसानदायक है।इस नए घटनाक्रम से अखिलेश यादव सदमे में हैं, उन्हें आशंका है कि आने वाले कुछ दिनों में कुछ विधायक भी समाजवादी पार्टी छोड़ सकते हैं।
अखिलेश यादव शुरू में कांग्रेस के साथ किसी तरह का चुनावी गठबंधन करने के खिलाफ थे, अभी दो महीने पहले तक वह कांग्रेस और भाजपा को एक जैसा ही कह रहे थे।लेकिन जैसे ही ओम प्रकाश राजभर, केशव देव मौर्य ने समाजवादी पार्टी से किनारा करने के संकेत देना शुरू किया, उन्होंने अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए कांग्रेस से गठबंधन की नई रणनीति बनाना शुरू कर दिया।पटना बैठक में जाकर उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन की नींव भी रख दी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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