USA Debt Crisis: अमेरिका में उपजा गहरा आर्थिक संकट
यदि एक जून तक अमेरिका अपनी आर्थिक देयता के निपटान के लिए संसाधन नहीं जुटा पाता और डिफॉल्ट हो जाता है तो न सिर्फ उसकी साख खत्म हो जाएगी, बल्कि विश्व के वित्तीय बाजार में भी भूचाल आ जाएगा।

USA Debt Crisis: अमेरिकी आर्थिक साम्राज्य के प्रतीक वॉल स्ट्रीट में इन दिनों अफरा तफरी मची है। आशंका है कि अमेरिका डिफॉल्ट होने वाला है। क्योंकि उसके पास अपनी वित्तीय देयता चुकाने के लिए पर्याप्त फंड नहीं है। डिफॉल्ट होने का सीधा सा मतलब है कि अमरीका अपने कर्ज, ब्याज और बांड की मैच्योरिटी का भुगतान नहीं कर पायेगा और अगर ऐसा हुआ तो जून में दुनिया का सबसे बड़ा धनी देश एक फेल्ड स्टेट (असफल देश) के तमगे से सुशोभित किया जाएगा।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति और रिपब्लिकन नेताओं के बीच अमेरिकी ऋण सीमा बढ़ाने को लेकर बातचीत सकारात्मक रही है पर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के अध्यक्ष केविन मैक्कार्थी का कहना है कि इस मामले में अभी किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं।
डेमोक्रेट्स कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए एक बिल पर साधारण वोट की मांग कर रहे हैं जबकि रिपब्लिकन संघीय बजट में खर्च में कटौती की शर्त रख रहे हैं। जब तक दोनों पक्षों में कोई समझौता नहीं हो जाता, तब तक अमेरिका द्वारा ऋण देयता में विफल होने का खतरा बरकरार रहेगा जिसके कारण वैश्विक बाजारों पर इसका प्रभाव हर दिन नकारात्मक दिखाई देगा। अमेरिका वर्ष 1789 के बाद कभी डिफॉल्ट की श्रेणी में नहीं आया है। यदि इस बार ऐसा होता है तो वाशिंगटन की स्थिति चीन के सामने कमजोर होती है जो नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है।
राष्ट्रपति बाइडेन परेशान हैं संभवत: इसीलिए उन्होंने क्वाड बैठक समेत अपने बाहर के कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। अचानक अमेरिका में उपजे संकट पर चीन गहरी नजर बनाए हुए है। वह कोई मौका नहीं छोड़ता चाहता कि इस बहाने वाशिंगटन को नीचा दिखाया जाए। उसकी कोशिश उन देशों को भड़काने की भी है जो अमेरिका के साथ मिलकर चीन के खिलाफ मोर्चाबंदी में लगे हैं।
चीन के सरकारी मीडिया 'ग्लोबल टाइम्स' ने इस आर्थिक संकट के कारण जो बाइडेन द्वारा सभी विदेशी दौरे रद्द किए जाने पर चुटकी लेते हुए लिखा है कि "वाशिंगटन का व्यवहार दर्शाता है कि किस तरह अमेरिका अपने सहयोगियों और भागीदारों को शतरंज के मोहरे के रूप इस्तेमाल करता है, जब इसके घरेलू मुद्दे इसके राजनीतिक एजेंडे पर हावी हो जाते हैं, तो यह आसानी से अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट जाता है।" ग्लोबल टाइम्स आगे लिखता है कि "अपने कर्ज के मुद्दे पर फंसकर अमेरिका लगातार अपना आधिपत्य खो रहा है। इस कारण उसके नेतृत्व और प्रतिष्ठा को लेकर उसके सहयोगियों के बीच संदेह पैदा होना शुरू हो गया है।"
अमेरिका को यदि डिफॉल्ट से बचना है तो उसे अभी कर्ज की अधिकतम सीमा 31.4 खरब डॉलर को बढ़ाना होगा और यह बाइडेन प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि एक तो डिफॉल्ट का खतरा एकदम मुहाने पर आ गया है और किसी तरह आर्थिक समायोजन के लिए समय नहीं है और दूसरे अमेरिकी बैंक कर्ज की सीमा बढ़ाने को लेकर काफी परेशान हैं। वो कर्ज का बोझ बढ़ने के बाद की स्थिति का आंकलन करने के लिए लगातार बैठकें कर रहे हैं। मालूम हो कि अमेरिकन बैंकों की हालत ठीक नहीं है। सिलिकॉन वैली बैक के बिक जाने के बाद कुछ और बैंक दिवालिया होने की कगार पर हैं, जिनमें यूएस बैंक और फर्स्ट रिपब्लिक बैंक शामिल हैं।
यदि एक जून तक अमेरिका अपनी आर्थिक देयता के निपटान के लिए संसाधन नहीं जुटा पाता और डिफॉल्ट हो जाता है तो न सिर्फ उसकी साख खत्म हो जाएगी, बल्कि इक्विटी, डेब्ट और अन्य वित्तीय बाजार में भूचाल आ जाएगा। खास कर सेकेंडरी मार्केट में अमेरिकन बांड के लिवाल नहीं मिलेंगे। यदि बांड मार्केट टूटा तो इसका सीधा असर डेरिवेटिव, मॉर्गेज और कमोडिटी बाजार पर भी पड़ेगा। शेयर बाजार टूटेगा, साथ में महंगाई भी बढ़ जाएगी और दुनिया का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर से भरोसा खत्म हो जाएगा। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका के डिफॉल्ट होने पर वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव आएगा और साथ ही अमेरिकी डॉलर में वैश्विक निवेशकों का विश्वास खत्म हो जाएगा।
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दूसरी तरफ यदि कर्ज की अधिकतम सीमा बढ़ाई गई तो इसका सीधा असर बैंक ब्याज दर पर होगा, यानी लोन लेना महंगा हो जाएगा और अमेरिका मंदी के दौर में तेजी से प्रवेश कर जाएगा। अभी ही अमेरिका में मॉर्गेज लोन की दर 8 फीसदी से अधिक है। बाजार में बिखराव की आशंका के कारण बैकों, शेयर दलालों और ट्रेडिंग कंपनियों में डर का माहौल अभी से ही पैदा हो गया है और वे संभावित आर्थिक भूचाल से निबटने के लिए खुद को तैयार करने मे जुटे हुए हैं।
दरअसल अमेरिका की पूरी अर्थ नीति कर्ज लेकर घी पीने वाली रही है। कुल जीडीपी का 120 फीसदी से भी अधिक अमेरिका का कर्ज है। अप्रैल 2023 के आकड़े के अनुसार कर्ज के ब्याज पर 460 अरब डॉलर पिछले साल खर्च हुआ, जो कुल सरकारी व्यय का 13 प्रतिशत है। अब अमेरिका में इस बात पर बहुत तेज मशविरा हो रहा है कि किसी तरह अगले दस साल में बजट घाटे और ब्याज देनदारी को 500 अरब डॉलर कम किया जाए। अमेरिका के कांग्रेसनल बजट ऑफिस ने सुझाव दिया है कि फेडरल गवर्नमेंट को मेडिकेड स्कीम, हेल्थ बीमा, सोशल सिक्योरिटीज स्कीम, मैंडेटरी प्रोग्राम, डिफेंस खर्च और इन्कम टैक्स में छूट में भारी कटौती करनी चाहिए तथा पे रोल टैक्स, कंजप्शन टैक्स, ग्रीन हाउस इमिशन टैक्स में भारी इजाफा करना चाहिए।
पर अमेरिका में ऐसा करना आसान नहीं है। वहां भी चुनाव मुफ्त की रेवड़ी के नाम पर ही लड़ा जाता है। 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भी होना है। इसके पहले बराक ओबामा का ओबामा केयर, ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट और बाइडेन का अमेरिका इज बैक जैसे नारे फेडरल गवर्नमेंट पर वित्तीय बोझ डालने वाले साबित हुए हैं। जॉब मार्केट और बेरोजगारी भत्ता अमेरिका के दो बड़े चुनावी नारे रहे हैं। इसलिए तुरंत अमेरिका में आर्थिक अनुशासन अपना लिया जाएगा, इसकी गुंजाइश कम ही है।
अमेरिका का यह संकट भारत के लिए भी एक चेतावनी है, जहां चुनाव जीतने के लिए इस बात की परवाह कोई पार्टी नहीं कर रही कि मुफ्त रगड़ने के लिए चंदन का पैसा सरकार के पास कहां से आएगा। धीरे धीरे भारत पर भी कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और यह आशंका है कि आने वाले चुनावों के बाद इसमें और बढ़ोतरी आएगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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