अखिलेश यादव के राजनीतिक प्रयोग फेल होने से उत्तर प्रदेश में सपा के भविष्य पर मंडराता संकट
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के भविष्य को लेकर पार्टी समर्थक ही नहीं बल्कि अब सहयोगी दलों के नेता भी संशय प्रकट कर रहे हैं और समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर जा रहे हैं। सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर और महान दल के केशवदेव मौर्य ने सपा से किनारा कर लिया है। इन नेताओं का आरोप है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा जिस प्रकार से कार्य कर रही है उसमें सपा का कोई अच्छा भविष्य दिखाई नहीं देता।

जनवरी 2012 की शुरुआत थी। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई थी। पार्टी की राज्य इकाई की कमान राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के पुत्र और युवा सांसद अखिलेश यादव के हाथों में थी। बसपा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिये अखिलेश यादव क्रांति रथयात्रा के जरिये पूरे प्रदेश को मथ रहे थे।
जनता के बीच सपा की गुंडों वाली पार्टी की छवि के विपरीत अखिलेश यादव एक संस्कारी पुत्र, वरिष्ठों का सम्मान करने वाले युवा तथा कार्यकर्ताओं से सौम्य व्यवहार करने वाले नेता बनकर उभर रहे थे। मीडियाकर्मियों के तीखे सवालों का जवाब भी धैर्यपूर्वक देकर वह सपा के सुनहरे भविष्य के संकेत देते नजर आ रहे थे। मुलायम सिंह यादव के बाद अब शिवपाल सिंह यादव नहीं बल्कि प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव सपा के खेवनहार बनते दिखने लगे थे।
विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बाहुबली विधायक डीपी यादव, जो 2007 में अपनी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल से चुनाव जीतने के बाद बसपा में शामिल हो गये थे, सपा में आने की कोशिश में जुटे थे। डीपी यादव मानकर चल रहे थे कि वह 2012 का चुनाव साइकिल निशान पर लड़ेंगे। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान और शिवपाल सिंह यादव ने भी उन्हें आश्वस्त कर दिया था, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने डीपी यादव को सपा में शामिल करने से इंकार करके सबको चौंका दिया। अखिलेश ने स्पष्ट किया कि दागी पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिये उनके दल में कोई जगह नहीं है।
इस फैसले का जनता में जोरदार समर्थन दिखा। माना गया कि सपा की गुंडई वाली राजनीति को दरकिनार कर अखिलेश यादव साफ-सुथरी सियासत करेंगे। अखिलेश यादव के इस फैसले का असर चुनाव में भी दिखा। जनता ने अखिलेश पर भरोसा करके सपा को पूर्ण बहुमत से चुनाव जिता दिया। उस समय कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि उसी अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा उत्तर प्रदेश में इस दुर्गति को प्राप्त हो जायेगी कि उसके भविष्य को लेकर सवाल उठने लगेंगे? सपा ने जिस अखिलेश के नेतृत्व में ऊंचाइयों को छुआ था, उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी अपने सर्वाधिक बुरे दौर में पहुंच चुकी है। केवल पार्टी ही नहीं कमजोर हुई है बल्कि अखिलेश की वह छवि भी इन दस सालों में ध्वस्त हुई है, जिस पर भरोसा करके उत्तर प्रदेश की जनता ने 2012 में सपा की बहुमत वाली सरकार बनवाई थी।
सवाल उठ रहे हैं कि अब सपा का भविष्य क्या होगा? क्या मुलायम सिंह यादव की विरासत उनके जीते जी ध्वस्त हो जायेगी? क्या अखिलेश यादव अगले अजीत सिंह बनने की ओर बढ़ चुके हैं? ऐसे बहुतेरे सवाल हैं जो सपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को परेशान कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस सपा के कार्यकर्ता अपने संघर्षशील एवं जुझारू छवि के लिये पहचाने जाते थे, उन्हें सड़क से दूर क्यों कर दिया गया है?
दरअसल, पारिवारिक कलह, आंतरिक गुटबाजी, निष्क्रिय संगठन, गठबंधन सहयोगियों से अनबन और राजनीतिक प्रयोगों ने सपा को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उसका भविष्य स्पष्ट नजर नहीं आ रहा है। कार्यकर्ता भी हताश और निराश हैं। इन सब दिक्कतों के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि अखिलेश 2024 में भाजपा के सियासी चक्रव्यूह को कैसे भेदेंगे?
वर्ष 2014, 2017, 2019 और 2022 में लगातार चार चुनाव हार जाने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। आजमगढ़ और रामपुर का उपचुनाव हारने के बाद तो अब सहयोगी दलों का भरोसा भी सपा से उठने लगा है। उपचुनाव में अपने ही गढ़ से अखिलेश की दूरी ने उसकी सियासी समझ पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। उपचुनाव में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी समेत भाजपा के नेताओं ने आजमगढ़ और रामपुर को मथ डाला था, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश ना जाने किसके भरोसे निश्चिंत बैठे रहे? अब लोकसभा चुनाव में वह भाजपा से किस रणनीति के जरिये निपटेंगे, यह सवाल भी बना हुआ है।
अखिलेश के अब तक के सियासी फैसलों पर नजर डालें तो साफ है कि उन्होंने बीते एक दशक में कई राजनीतिक प्रयोग किये, लेकिन सभी के नतीजे उम्मीद के विपरीत रहे। अखिलेश ने 2017 में उस कांग्रेस से मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया जिसके विरोध की राजनीति करते हुए मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी खड़ी की थी। नतीजा जनता ने दोनों दलों को नकार दिया। 2012 में 224 सीट जीतने वाली सपा सिमटकर 47 पर पहुंच गई तो 28 सीट जीतने वाली कांग्रेस 7 सीटों के साथ दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई।
2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने धुरविरोधी बसपा के साथ गठबंधन किया, लेकिन यहां भी नतीजे उम्मीदों के उलट रहे। गठजोड़ का सियासी फायदा केवल बसपा को हुआ, जिसकी सीटें शून्य से दस तक जा पहुंची। दूसरी तरफ सपा खेमे के लिये यह समझौता आत्मघाती साबित हुआ। पारिवारिक गढ़ कन्नौज से डिंपल यादव एवं बदायूं से धर्मेंद्र यादव को हार का सामना करना पड़ा।
2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने नया प्रयोग किया। बड़े दलों की बजाय छोटी जातीय आधारित पार्टियों के साथ गठबंधन किया। यह प्रयोग पिछले प्रयोगों की तुलना में बेहतर रहा, लेकिन इतना प्रभावी साबित नहीं हुआ कि सत्ता की चाभी हासिल कर सके। मुसलमानों की एकजुटता के बावजूद सपा 111 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि सपा गठबंधन 125 सीटों पर सिमट गया। अब गठबंधन से महान दल के केशव देव मौर्य और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर बाहर हो चुके हैं।
गठबंधन में रहने के दौरान ओम प्रकाश राजभर ने लगातार अखिलेश पर हमले किये तथा एयर कंडीशनर कमरों से बाहर निकलने की नसीहत दी। अब जनवादी पार्टी के संजय चौहान भी अखिलेश पर केवल ट्वीटर के जरिये राजनीति करने का आरोप लगाकर हमला बोल रहे हैं। अपना दल (कमेरा) की विधायक एवं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराने वाली पल्लवी पटेल भी उनसे नाराज हैं। एक बार फिर वही सवाल उठ रहा है कि क्या अखिलेश यादव सचमुच सपा के भविष्य को लेकर चिंतित हैं या फिर ये चिंता सिर्फ गैर सपाइयों को ही हो रही है?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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