UCC and Population Control: चार घटनाएं जो देश की दशा और दिशा बदल सकती हैं

यदि जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिकता पर 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले क़ानून बन जाते हैं, तो 2024 के बाद नए भारत का उदय होगा, जिसमें सभी को बराबरी का अधिकार होगा, जो संविधान सभा की मंशा थी।

UCC and Population Control Four events that can change condition and direction of country

शुक्रवार 9 दिसंबर को एक साथ चार घटनाएं हुई हैं। ये चारों घटनाएं, देश और समाज की दशा दिशा बदलने वाली हैं।ये चारों घटनाएं संसद और सुप्रीम कोर्ट से जुडी हैं। इन चार घटनाओं के दो मुद्दे हैं।आने वाले कुछ महीनों में देश में इन दोनों मुद्दों पर राजनीतिक बवाल मचा रहेगा।ये दो मुद्दे हैं कामन सिविल कोड और जनसंख्या नियन्त्रण क़ानून।

पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला के तलाक के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा था कि विवाह और तलाक के मामले में देश में एक ही क़ानून होना चाहिए।अदालत ने इस से भी आगे बढ़ कर यहां तक कहा कि कॉमन सिविल कोड की कल्पना क्या संविधान में ही लिखी रह जाएगी, अब वक्त आ गया है कि देश में कॉमन सिविल कोड यानि समान नागरिक संहिता लागू की जाए।सुप्रीम कोर्ट ने यही बात 1988 में शाहबानों के गुजारा भत्ते केस की सुनवाई के समय भी कही थी।

अब यही बात केरल हाईकोर्ट ने एक ईसाई महिला के तलाक के मुद्दे पर कही है।शुक्रवार को एक केस की सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने कहा कि ईसाईयों के तलाक का ब्रिटिश राज के समय से लागू क़ानून आउटडेटिड है।इस क़ानून के अनुसार पति पत्नी को तलाक से पहले दो साल तक अलग रहना पड़ता था।

जवाहर लाल नेहरू ने हिन्दुओं की परंपराओं पर आधारित ब्रिटिश काल के क़ानून रद्द कर के नया हिन्दू कोड बना दिया, लेकिन ईसाईयों और मुसलमानों के क़ानून उन्हीं पर छोड़ दिए।बाद में एक कोर्ट ने ईसाई पति पत्नी के अलगाव की अवधि घटा कर एक साल की थी, लेकिन अब केरल हाई कोर्ट ने उस शर्त को भी खत्म कर दिया।हाईकोर्ट ने कहा कि यह शर्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

UCC and Population Control Four events that can change condition and direction of country

केरल हाईकोर्ट ने सही सवाल उठाया है कि कांग्रेस ने मुस्लिम और ईसाई महिलाओं के मौलिक अधिकारों की चिंता क्यों नहीं की।ऐसा नहीं है कि संसद में यह सवाल नहीं उठा था। यह मुद्दा उठा था, लेकिन नेहरू ने यह कह कर सांसदों की मांग को खारिज कर दिया था कि ईसाई और मुस्लिम समाज अभी बदलावों के लिए तैयार नहीं है।
हिन्दू कोड बिल के अंतर्गत 1955 में हिन्दुओं से संबंधित पांच क़ानून बनने के 67 साल बाद सुप्रीमकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट की तरह अब केरल हाईकोर्ट ने भी विवाह और तलाक का सबके लिए एक समान क़ानून लागू करने पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है।

शुक्रवार को ही दूसरी घटना सुप्रीमकोर्ट की है, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय महिला आयोग की उस याचिका पर संज्ञान लिया है, जिसमें मांग की गई है कि सभी धर्मों की महिलाओं के विवाह की आयु एक समान तय की जाए।सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके उसका पक्ष पूछा है।

यह मुद्दा भी मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा है और मोदी सरकार इस संबंध से कोर्ट से दिशा निर्देश देने की बात कह सकती है, वैसे भी राष्ट्रीय महिला आयोग मोदी सरकार का ही हिस्सा है, जिसने अपनी याचिका में कहा कि मुस्लिम पर्सनल ला के अनुसार मुस्लिम लडकियों की शादी 15 साल की उम्र में वैध मानी जाती है, जो लडकियों की न्यूनतम 18 साल की आयु के क़ानून और पोक्सो एक्ट का भी उलंघन है।फिर मुस्लिम लड़कियों की 15 साल की उम्र में की गई शादी वैध कैसे हो सकती है।यह मामला भी अंतत: समान नागरिक संहिता का ही है।

इसी से जुडी तीसरी घटना राज्यसभा की है।संसद अभी भी समान नागरिक संहिता के लिए तैयार नहीं दिखती, क्योंकि शुक्रवार 9 दिसंबर को राज्यसभा में भाजपा के सांसद किरोड़ी लाल मीना ने समान नागरिक संहिता के लिए प्राईवेट मेंबर बिल पेश किया, तो कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, एम.डी.एम.के, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, एन.सी.पी और दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने बिल पेश करने का विरोध किया।इन सभी दलों का कुतर्क यह था अगर यह बिल पास हो जाता है तो यह देश के सामाजिक ताने-बाने और विविधता में एकता की ख़ूबसूरती को 'नष्ट' कर देगा|

विपक्ष के भारी विरोध के बीच सरकार को बिल के समर्थन में सामने आना पड़ा, यह जरूरी भी था, क्योंकि भाजपा के 2019 के चुनाव घोषणापत्र में समान नागरिक संहिता का वायदा किया हुआ है।सदन के नेता पीयूष गोयल ने कहा कि प्राईवेट मेंबर बिल सांसद का अधिकार है, उसे पेश करने से कैसे रोका जा सकता है।इस पर बिल को पेश करने की स्टेज पर ही वोटिंग करवाई गई, तो विपक्ष को करारा झटका लगा, जब बिल के पक्ष में 63 और विरोध में सिर्फ 23 वोट पड़े।

मोदी सरकार बिल को पास करवाने की स्थिति में है, अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह बिल को पास होने देती है या जनसंख्या नियन्त्रण पर इसी सदन में रखे गए राकेश सिन्हा के प्राईवेट मेंबर बिल जैसा हश्र होगा, जब इसी साल के शुरू में सरकार खुद पीछे हट गई थी और मनोनीत सदस्य राकेश सिन्हा को बिल वापस लेने को मजबूर कर दिया था।

शुक्रवार को हुई तीसरी घटना भी जनसंख्या नियन्त्रण बिल की है, जिसे अब प्राईवेट मेंबर बिल के रूप में ही राज्यसभा की बजाए लोकसभा में रखा गया है।इसे भी भाजपा के ही सांसद रवि किशन ने पेश किया है।जनसंख्या नियन्त्रण एक बड़ा मुद्दा है, भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में इसे भी शामिल किया गया था। लेकिन राज्यसभा में सरकार ने खुद राकेश सिन्हा को बिल वापस लेने को मजबूर किया था।स्वास्थ्य मंत्री लोकसभा में बयान दे चुके हैं कि सरकार का जनसंख्या बिल लाने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है। इसके बावजूद भाजपा और मोदी सरकार पर संघ परिवार का दबाव बना हुआ है।

किरोड़ी लाल मीना और रवि किशन के बिलों का क्या हश्र होगा, अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन अगर संसद में रखे गए दोनों बिल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले क़ानून बन जाते हैं, तो 2024 के बाद नए भारत का उदय होगा, जिस में सभी को बराबरी का अधिकार होगा, जो संविधान सभा की मंशा थी।लेकिन सारे विपक्षी दल इन दोनों ही बिलों का पूरी ताकत के साथ विरोध कर रहे हैं।

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