Jai SiyaRam and Jai ShriRam: 'जय सियाराम' के जरिए 'जय श्रीराम' को ललकारने की कोशिश
हिन्दुत्ववादी विचारधारा के आम अभिवादन में प्राय: 'जय श्रीराम' का उद्घोष सुनाई देता है, जिसके विकल्प में सेकुलर विचारधारा वालों ने जय सियाराम का नारा फूंका है। क्या जय श्री राम और जय सियाराम के बीच कोई द्वंद्व है?

Jai SiyaRam and Jai ShriRam: राजनीति के नए दौर में जय सियाराम और जय श्रीराम के बीच बहस चल पड़ी है। सनातन धार्मिक मूल्यों की नासमझी से उपजे इस विवाद को लेकर राजनैतिक धड़े दलगत क्षुद्रता को ही प्रदर्शित कर रहे हैं। आध्यात्मिक भाव विकास की उच्चता को राजनैतिक क्षुद्रता से परखा जाना लगभग असंभव ही है। यही कारण है कि जय सियाराम और जय श्रीराम को लेकर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं।
रामानंद संप्रदाय की काशी स्थित प्रधान आचार्य पीठ श्रीमठ के प्रमुख स्वामी रामनरेशाचार्य का कहना है कि 'साधु-संतों ने बहुत सोच-विचारकर जय सियाराम कहने का क्रम स्थापित किया था। इसे बदलना या बिगाड़ना, दोनों परंपरा के लिए ठीक नहीं है। साधु समाज में सदा से जय सियाराम या जय सीताराम ही चलता आ रहा है। अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2019 में नेपाल में जनकपुर की यात्रा के दौरान परंपरा का ध्यान रखते हुए 'जय सियाराम' लिखा था।'
आज जिस बात पर विवाद है वह यह है कि जय श्रीराम और जय सियाराम में कौनसा उद्घोष पुरातन है? हालांकि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि राम के नाम से अभिवादन करने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भ मजूबत हैं। पर भारतीय साधना शिखर पर विराजमान श्रीराम के नाम पर राजनीति करने वालों ने इस नाम का अपनी अपनी सुविधा के अनुसार उपयोग किया है।
देश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों ने एक दूसरे की विचार शैली में अभाव को उठाकर उसे ऐसा प्रचारित किया, जिसे जनता की मान्यता मिली और उस मान्यता ने सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोल दिया। यह सांस्कृतिक सामंजस्य के बीच बढ़ते विरोध का ही परिणाम है कि राम के नाम से जुड़े श्री और सिया शब्द को लेकर राजनीति चरम पर है। हालांकि श्री और सिया दोनों ही शक्ति को संबोधित शब्द हैं। फिर भी यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि दोनों ही दल दोनों उद्घोषों को स्वीकारने की बजाय इन पर बयानबाजी कर रहे हैं।
राम परमात्मा का गौण नहीं बल्कि सारे नामों से बढ़कर प्रमुख नाम है। 'राम' वह प्यारा नाम है जिसे महादेव सतत जपते हैं। राम नाम वेदान्तियों का ब्रह्म है। दार्शनिकों का कर्ता है। कर्मवादियों का कर्म है। निर्गुणी संतों का आत्माराम है। ईश्वरवादियों का ईश्वर है। अवतारवादियों का अवतार है। इस नाम के वाहक मर्यादा पुरुषोत्तम राम महर्षि वाल्मीकि की 'रामायण' के धीरोदात्त नायक हैं तो तुलसीदास की रामचरितमानस में सामाजिक महानायक हैं। वे एक साथ राजा भी हैं और संत भी। वे हर कसौटी पर खरे हैं। वाल्मीकि उन्हें 'रामो विग्रहवान्धर्म:' कहकर मूर्तिमान धर्म ही बताते हैं।
एक राम कबीर के हैं, जिनके वे प्रिय हैं। एक राम अवध के हैं, जिनसे भारत की माटी बनती है। उसकी खुशबू बनती है। वे संस्कृति पुरुष हैं। इसलिए हिन्दू और मुसलमान, दोनों के आपस में मिलने का प्यारा सम्बोधन 'राम-राम' है। शताब्दियों से 'जय सियाराम' और 'राम-राम' हमारे मन की आवाज को, भाव को और प्रेम को एक-दूजे तक पहुँचाने वाले शब्द हैं।
सात शताब्दियों पहले मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी रामानंद ने राम नाम का आश्रय लेकर निर्गुण और सगुण रामभक्ति के आध्यात्मिक लोकतंत्र की भावभूमि खड़ी की। भक्ति परंपरा में भक्तों ने भगवान के दो रूप स्वीकार किए हैं। एक तो गुणातीत और समस्त शक्तियों के उत्स तथा दूसरी ओर नवधा भक्ति में बंटे अवतारी परमात्मा जो भक्तों की भक्ति भावना के अनुरूप ह्रदय में आविर्भूत होते हैं। पर दोनों ही भक्ति धाराओं का आधार नाम जप और नाम सेवा है।
इसी नाते कबीर, रैदास और नानक जैसे निर्गुणी संतों की वाणी में निर्गुण 'राम' के दर्शन होते हैं तो गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की शुरुआत में 'बंदउँ नाम राम रघुबर को' लिखकर राम नाम के उदात्त महत्व को प्रतिपादित किया है। कबीर ने राम नाम को अलग ही ऊंचाई दी। 'दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना' कहने वाले कबीर राम को आत्मा का पर्याय बना देते हैं।
शवयात्रा में बोले जाने वाला 'राम नाम सत्य है' का आशय कबीर की दृष्टि में यही है कि इस मिथ्या देह से परे आत्मा सत्य है। कबीर पंथ के 'राम' 'आत्मा' के वाचक हैं, अमर, शाश्वत और पुरातन हैं, जो शरीर के मरने पर नहीं मरते हैं।
समर्थ गुरु रामदास का कीर्तन मंत्र 'श्रीराम जय राम जय जय राम' था तो नमस्कार का संबोधन 'श्री रघुवीर समर्थ'। संत दादू के यहाँ अभिवादन 'दादू राम, सत्य राम' हैं, वहीं रामस्नेही संप्रदाय में 'राम जी राम, राम महाराज' है। रामानंद संप्रदाय के नित्यार्चन में 'राम नाम महाराज की जय' बोली जाती है। नित नए रूपों में नाम निरूपण का सिलसिला सैकड़ों सालों का है। शिरडी के साईं बाबा ने उन्हें अपनी और से 'साईं राम' नाम दिया। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने भी 'रघुपति राघव राजा राम' नाम की डोर पकड़ी क्योंकि उनकी कल्पना में ही राम राज्य था। राममनोहर लोहिया तो नास्तिक होते हुए भी 'रामायण मेला' लगवाते थे।
इन सबसे अलग पिछले करीब चार दशकों से जय सियाराम के सामने एक नया नारा 'जय श्रीराम' का आना है। आश्चर्य है कि जिस राम को हम जानते हैं, वे इतने विनम्र हैं कि शिव धनुष तोड़ने पर क्रुद्ध परशुराम से कहते हैं, 'नाथ संभु धनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।' हे नाथ, शिव का धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास ही होगा। ठीक ऐसे ही वे लंका जाने के लिए रास्ता मांगते हुए समुद्र से प्रार्थना करते है। लेकिन रामायण सीरियल में पहली बार सुनाई दिये जय श्री राम के नारे ने उनके आक्रामक स्वरूप को प्रकट किया। बाद में तो वे भगवा पहनकर हाथ में धनुष लिए क्रोधित अवस्था वाले चित्रों में कैद हो गए।
लोकमानस में उनकी तस्वीर 'जय सियाराम' न होकर 'जय श्रीराम' की उभरने लगी हैं, जैसे कोई आक्रामक योद्धा, जो माथे पर भगवा पट्टी बांधे लोगों की भीड़ के नारों का नायक हो। यह भीड़ 'जय श्रीराम' लिखे ध्वजा-पताकाओं से घिरकर उनकी सेना होने का दावा करती है। सत्य, शील और त्याग की मूर्ति राम की एक ऐसी छवि उभरती है, जिसमें वे भगवा वस्त्र में धनुष चलाते हुए एक मजबूत शरीर वाले योद्धा के रूप में चित्रांकित हैं। इन राम का नारा 'जय सियाराम' नहीं बल्कि 'जय श्रीराम' है।
इनकी प्रतिक्रिया में जो जय सियाराम की पैरवी कर रहे हैं, उन्होंने राम के नाम को लेने में काफी देर कर दी है। वे जय श्रीराम को दबाने के लिए जय सियाराम के सहारे राजनीति में उठने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यही कोशिश दशकों पहले शुरू हुई होती तो जय श्रीराम के नारे की आलोचना करने की आवश्यकता ही उन्हें नहीं पड़ती।
गांधी के राम, जय सियाराम और जय श्रीराम के बीच राजनीति के आठ दशक हैं। इन आठ दशकों में लोगों का विश्वास और राजनैतिक प्रतिबद्धताएं बनी और बदली हैं। ऐसे में जय सियाराम के बहाने जय श्रीराम को ललकारने का कोई खास परिणाम नजर नहीं आ रहा है। इस नए उभरे राजनैतिक परिदृश्य में 'जय सियाराम बनाम जय श्रीराम' का अनावश्यक द्वंद्व है, जिसे सुलझा पाना नेताओं के लिए आसान नहीं है।
यह भी पढ़ें: राहुल गांधी बोले 'बीजेपी का नारा 'जय श्री राम' है न कि 'जय सिया राम' क्योंकि...'
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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