Rahul, Tshirt and Ram: राजनीति में चाटुकारिता की परंपरा और टीशर्ट वाले राहुल की राम से तुलना
राजनीति में चाटुकारिता का अपना विशिष्ट महत्व है। अपने नेता की बात को ब्रह्मवाक्य मानकर सुनना और उसकी तुलना समाज में पूजनीय व्यक्तित्व से करना, कोई नयी बात नहीं। इस समय राहुल गांधी की भगवान श्रीराम से ऐसी ही एक तुलना के क

भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी जैसे ही दिल्ली पहुंचे, पदयात्रा से ज्यादा टी शर्ट और राम से की गयी तुलना के कारण उनकी चर्चा होने लगी। 26 दिसंबर को सुबह सुबह वो राजघाट स्थित समाधियों पर गये। यहां उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भी समाधि है। दिल्ली में उस दिन ठंड बहुत थी और पारा 4 डिग्री तक गिर गया था। फिर भी सुबह सुबह 8 डिग्री की ठंड में राहुल गांधी टी शर्ट पहने नजर आये। एक स्वाभाविक प्रश्न उठा कि क्या राहुल गांधी को ठंड नहीं लगती?
असल में दक्षिण होकर उत्तर भारत पहुंचे राहुल गांधी लगातार टीशर्ट और जीन्स में ही नजर आ रहे हैं। जबकि इस समय उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। जिस दिन वो पदयात्रा करते हुए दिल्ली में दाखिल हुए उस दिन भी उन्होंने सिर्फ टी शर्ट और जीन्स ही पहन रखी थी। लालकिले पर मंच से उन्होंने ठंड में टीशर्ट पहनने पर उठे सवालों का जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि "लोग मुझसे पूछते हैं कि इतनी ठंड में मैं टीशर्ट क्यों पहन रहा हूं? मैं उनसे पूछता हूं कि यही सवाल वो किसान और मजदूर से क्यों नहीं पूछते?" उनका कहना था कि इस देश में आज भी ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनको भोजन कपड़े का संकट है।
सोशल मीडिया पर उनके जो समर्थक पक्षकार हैं उन्होंने भी भांति भांति से आश्चर्य व्यक्त किया कि इतनी ढंड में राहुल गांधी जी टीशर्ट में क्यों है? किसी ने लिखा कि इसका रहस्य उनकी योग साधना में है तो किसी ने कहा कि यही असली 56 इंची है जिन्हें ठंड नहीं लगती।
अपने नेता की चापलूसी करना, उसका महिमांडन करना ये कोई नयी बात नहीं है। उसमें हर महान आदर्श भर देना भी राजनीतिक चापलूस और चाटुकार बहुत अच्छे से करते हैं। कांग्रेस में इसकी परंपरा बहुत पुरानी है। ठीक से हिन्दी भी न बोल पाने वाली सोनिया गांधी को एक कांग्रेसी नेता राजेशपति त्रिपाठी ने संस्कृत का प्रकांड विद्वान घोषित कर दिया था। राजेशपति बनारस से दिग्गज कांग्रेसी नेता पं. कमलापति त्रिपाठी के पोते हैं, इसलिए कांग्रेस में उनकी अच्छी पहुंच थी। फिर भी जब इतनी प्रकांड चाटुकाकिता भी काम न आयी तो 2021 में राजेशपति त्रिपाठी और उनके बेटे ललितेशपति त्रिपाठी कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये।
इसलिए कांग्रेस में तो चाटुकारिता की होड़ हमेशा ही लगी रहती है। एक समय ऐसा भी था जब कांग्रेस नेता अजीत जोगी ने छत्तीसगढ में मुख्यमंत्री बनने के लिए सोनिया गांधी को अपनी मां ही नहीं, देश की मां भी घोषित कर दिया था। हालांकि ये बात दूसरी है कि अपेक्षित लाभ नही मिला तो अजीत जोगी ने 2016 में कांग्रेस को ही छोड़ दिया।
अजीत जोगी जैसा कुछ काम इस समय सलमान खुर्शीद कर रहे हैं। सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी की तुलना भगवान श्रीराम से कर दी है। 26 दिसंबर को मुरादाबाद में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के संबंध में प्रेस कांफ्रेस करने पहुंचे सलमान खुर्शीद ने कहा कि "भगवान श्रीराम की खड़ाऊं बहुत दूर तक जाती है। कभी-कभी खड़ाऊं लेकर भी चलना पड़ता है। हमेशा भगवान राम हर जगह नहीं पहुंच पाते हैं। उनके भाई भरत जी उनकी खड़ाऊं लेकर चलते हैं। खड़ाऊं लेकर हम उत्तर प्रदेश में पहुंच गए हैं। अब रामजी भी पहुंचेंगे, यह हमारा विश्वास है।"
उनके इस बयान पर राजनीतिक हंगामा होना ही था। जब विश्व हिन्दू परिषद सहित साधु संतों ने भी विरोध किया तो उन्होंने अपने बयान से पलटते हुए राहुल को राम बताने की बजाय बीजेपी को रावण बता दिया। हालांकि यहां भी वो अपनी राजनीतिक चाटुकारिता से बाज नहीं आये। राहुल गांधी के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि "राहुल गांधी अलौकिक हैं। जब हम ठंड में ठिठुर रहे हैं और जैकेट पहन रहे हैं तो वह टी-शर्ट में बाहर जा रहे हैं। वह एक योगी की तरह हैं जो फोकस के साथ अपनी 'तपस्या' कर रहे हैं।"
राजनीति में ऐसे ऊटपटांग बयान अनायास नहीं दिये जाते। चापलूसी में माहिर नेता बहुत सोच समझकर ऐसा बोलते हैं। इससे एक तो उन्हें तत्काल मीडिया कवरेज मिल जाता है और उस व्यक्ति तक उनका मैसेज भी पहुंच जाता है जिसके बारे में वो ऐसा बयान देता है। अब कोई आपकी प्रशंसा करे, आपकी अतुलनीय तुलना करे तो आप उसे पार्टी से तो नहीं निकाल देंगे? आखिर कौन सा नेता होगा जिसे अपनी प्रशंसा बुरी लगेगी?
इसलिए चाटुकारिता पूर्ण ऐसे बयान देने वाले नेताओं को राजनीतिक लाभ भी मिलता रहता है। भाजपा में इस तरह की चाटुकारिता वाली परंपरा पहले नहीं रही लेकिन नरेन्द्र मोदी के उभार के साथ भी उनके बारे में ऐसी बेतुकी तुलनाएं समय समय पर होती रहती हैं। 2014 के आम चुनाव से पहले चापलूसों ने मोदी को लेकर ऐसे ऐसे बयान दिये कि चर्चा में आ गये। इसका उनको लाभ भी मिला और मोदी सरकार में आठ साल से मंत्री बने बैठे हैं।
महाराष्ट्र भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने चार साल पहले मोदी को भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार घोषित कर दिया था। इसी साल फरवरी में लोजपा नेता पशुपति पारस ने कहा था कि मोदी साक्षात भगवान हैं, मैं नियमित उनकी पूजा करता हूं। लोजपा तोड़ने के बाद से पशुपति पारस केन्द्र की मोदी सरकार में मंत्री हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री गुलाब देवी हों या मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार में मंत्री कमल पटेल। दोनों मोदी को राम कृष्ण जैसा ईश्वर का अवतार घोषित कर चुके हैं। भाजपा की एक और महिला नेता रश्मिधर सूद तथा राजस्थान से भाजपा विधायक ज्ञानचंद पारेख मोदी को भगवान शिव का अवतार घोषित कर चुके हैं।
राजनीतिक नेताओं द्वारा ऐसी उटपटांग तुलना नयी नहीं है। कांग्रेस से शुरु हुआ ये छूत का रोग भाजपा सहित सभी छोटे दलों तक पहुंच चुका है। हर दल के कुछ नेता अपने वरिष्ठ नेताओं की चाटुकारिता में ऐसी बातें करते रहते हैं। यह राजनीति की गिरावट है। ऐसे बेसिर पैर के बयानों को रोकने के लिए जरुरी है कि शीर्ष के नेता ही ऐसे चाटुकारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें ताकि ये परिपाटी बंद हो। फिर सवाल वही उठता है कि कार्रवाई तो तब होगी जब किसी को ऐतराज हो। आखिर राजनीति में वो नेता कहां है जिसे अपनी चाटुकारिता और प्रशंसा पर ऐतराज हो?
Recommended Video

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications