मां-बाप को अकेला छोड़ विदेश में बसने की प्रवृत्ति पर सख्ती का समय
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव' केवल श्लोक नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना का नैतिक आधार रहा है। किंतु बदलते समय, वैश्वीकरण और बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश जाने की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच एक गंभीर प्रश्न उभर रहा है-क्या आर्थिक उन्नति की दौड़ में हम अपने बुजुर्ग माता-पिता को भावनात्मक और सामाजिक रूप से अकेला छोड़ रहे हैं?

इसी संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के सांसद श्री राधा मोहन दास अग्रवाल ने एक सख्त सुझाव दिया है। संसद के बजट सत्र में उन्होंने कहा है कि जो लोग अपने मां-बाप को भारत में तड़पता छोड़कर विदेश में आनंद ले रहे हैं, उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि माता-पिता से हर छह महीने में संतुष्टि-प्रमाण पत्र लिया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे उपेक्षा या उत्पीड़न का शिकार नहीं हो रहे।
यह प्रस्ताव स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। एक ओर यह विचार भारतीय पारिवारिक मूल्यों की रक्षा की चिंता को दर्शाता है, तो दूसरी ओर यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा भी है। भारतीय समाज की आत्मा उसके परिवार तंत्र में बसती है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से ओतप्रोत हमारी संस्कृति में परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि संस्कार, परंपरा, श्रद्धा और उत्तरदायित्व का जीवंत विद्यालय रहा है। इसी मूल विचार को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी छह प्रमुख गतिविधियों में "कुटुंब प्रबोधन" को विशेष स्थान दिया है।
कुटुंब प्रबोधन का लक्ष्य स्पष्ट है-संयुक्त परिवार, संगठित परिवार, सुरक्षित परिवार, सम्पन्न परिवार, व्यवस्थित परिवार, आनंदित परिवार और सुस्वास्थ्य परिवार की अवधारणा को पुनः सशक्त करना। यह केवल सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जागरण का प्रयास है। वर्तमान समय में अनेक परिवार विभिन्न प्रकार की विकृतियों का सामना कर रहे हैं। तीव्र शहरीकरण, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, पश्चिमी जीवनशैली का प्रभाव और पारंपरिक मूल्यों से दूरी-इन सबने परिवार की संरचना और संबंधों की गहराई को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप अनेक सुंदर, सुरक्षित और शांत परिवार टूटने की कगार पर दिखाई देते हैं।
बुजुर्गों की उपेक्षा, दांपत्य कलह, बच्चों में संस्कारों की कमी और पारिवारिक संवाद का अभाव-ये समस्याएं समाज के व्यापक स्वरूप को भी प्रभावित करती हैं। जब परिवार कमजोर होता है, तो समाज और राष्ट्र भी कमजोर पड़ता है। संघ द्वारा चलाए जा रहे कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रमों का उद्देश्य परिवारों में संवाद, संस्कार और समरसता को पुनर्जीवित करना है। देशभर में सामूहिक प्रबोधन, गोष्ठियां, परिवार मिलन, संवाद सत्र और संस्कार आधारित गतिविधियों के माध्यम से परिवारों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष भविष्य की युवा पीढ़ी को सही दिशा और मार्गदर्शन देना है। यदि बच्चों और युवाओं को परिवार के भीतर ही श्रद्धा, सम्मान, अनुशासन और कर्तव्यबोध का वातावरण मिले, तो वे समाज के जिम्मेदार नागरिक बनते हैं। भारतीय परंपरा में परिवार ही प्रथम पाठशाला है। माता-पिता और स्वजन ही प्रथम गुरु हैं। यदि परिवार संगठित और सुदृढ़ रहेगा, तो सामाजिक ताना-बाना भी मजबूत रहेगा। कुटुंब प्रबोधन का मूल संदेश यही है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बना रहे। संयुक्तता की भावना, परस्पर सहयोग, बड़ों का सम्मान और छोटों के प्रति स्नेह-ये ही वे मूल्य हैं जो परिवार को आनंदित और सुस्वास्थ्य बनाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो शहरीकरण और प्रवासन के कारण लाखों बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भावनात्मक एकाकीपन, स्वास्थ्य देखभाल की चुनौतियां और सामाजिक असुरक्षा उनके सामने बड़ी समस्या बनती जा रही हैं। कई मामलों में संपत्ति विवाद, देखभाल की कमी और मानसिक तनाव जैसी स्थितियां भी सामने आती हैं।
सरकार ने पहले ही 'Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act' के माध्यम से बच्चों को माता-पिता की देखभाल के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया है। किंतु कानून के बावजूद सामाजिक संवेदनशीलता और पारिवारिक उत्तरदायित्व का क्षरण चिंता का विषय बना हुआ है।
पासपोर्ट रद्द करने या अनिवार्य संतुष्टि-प्रमाण पत्र जैसे प्रस्ताव कठोर कदम माने जा सकते हैं। इनके व्यावहारिक और कानूनी पहलुओं पर गंभीर विचार आवश्यक है। क्या हर मामला उपेक्षा का होता है? क्या सभी प्रवासी अपने माता-पिता को असहाय छोड़ देते हैं? अनेक परिवार ऐसे भी हैं जहां विदेश में बसे बच्चे नियमित आर्थिक सहयोग, स्वास्थ्य बीमा और देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं।
इसलिए प्रश्न केवल दंडात्मक कार्रवाई का नहीं, बल्कि संतुलित नीति निर्माण का है। संभव है कि तकनीकी माध्यमों से नियमित संवाद, स्थानीय प्रशासन की निगरानी, सामुदायिक समर्थन प्रणाली और वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन जैसे उपाय अधिक प्रभावी साबित हों।
भारतीय समाज आज एक संक्रमणकाल से गुजर रहा है। एक ओर वैश्विक अवसर हैं, दूसरी ओर पारिवारिक जिम्मेदारियों का नैतिक दायित्व। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन साधें।
माता-पिता की देखभाल केवल कानूनी कर्तव्य नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। यदि सामाजिक चेतना सशक्त होगी तो कठोर कानूनों की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी। दरअसल, यह बहस हमें एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाती है-क्या विकास की परिभाषा केवल आर्थिक उन्नति है, या उसमें पारिवारिक संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व भी शामिल हैं? सख्ती हो या संवाद, लक्ष्य एक ही होना चाहिए-भारत में कोई भी बुजुर्ग अपने ही घर में पराया और असहाय महसूस न करे।
(लेखक राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक हैं)












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