Telangana Elections: क्या तेलंगाना में बनेगी त्रिशंकु विधानसभा?

हिंदी पट्टी के विधानसभा चुनावों के बीच दक्षिण भारतीय राज्य तेलंगाना की उतनी चर्चा नहीं हो रही है जितना महत्त्वपूर्ण यहां का चुनाव हो गया है। 02 जून, 2014 को आंध्रप्रदेश से अलग गठित तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (बाद में नाम परिवर्तित होकर भारत राष्ट्र समिति) का एकतरफा प्रभुत्व रहा है क्योंकि पृथक तेलंगाना की मांग को लेकर मुखर के. चंद्रशेखर राव ने राज्य की जनता की भावनाओं का जमकर दोहन किया है।

आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस का राज्य में दखल न के बराबर है या यूं कहें कि दोनों ही आंध्र दलों को तेलंगाना की जनता ने अपने राज्य से निकाल फेंका है, क्योंकि दोनों दलों के ही नेता तेलंगाना की मांग के विरुद्ध संयुक्त आंध्र को प्राथमिकता देते थे। इसलिए तेलंगाना में इस बार मुख्यतः बीआरस, कांग्रेस और बीजेपी के मध्य त्रिकोणीय राजनीतिक संघर्ष है।

Telangana Elections: Will there be a hung assembly in Telangana?

अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी एंटी-इन्कंबेंसी का सामना कर रहे केसीआर को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिल रही है। वहीं दक्षिण भारत में अपने एकमात्र दुर्ग कर्नाटक को गवां कर भाजपा तेलंगाना को भागवामय करना चाहती है ताकि उस पर से उत्तर भारतीय पार्टी होने का तमगा धुल सके। तीनों ही दल 30 नवंबर को होने वाले चुनावी मतदान के हिसाब से मतदाताओं के सामने जा रहे हैं और अब तक जनता के मूड से कांग्रेस इस बार सरकार बनाने के करीब दिख रही है। हालांकि कांटें उसकी राह में भी कम नहीं हैं किंतु केसीआर के विरुद्ध असंतोष, बीजेपी के नेताओं का 'हाथ का साथ' थामना और सहानुभूति कांग्रेस के पक्ष में जाती दिख रही है।

पूर्व गृह मंत्री की माफी से कांग्रेस ने बदला माहौल
तेलंगाना गठन के बाद और उससे पहले से केसीआर परिवार कांग्रेस पर तेलंगाना के लोगों की भावनाओं का दोहन करने और उनके नरसंहार का आरोप लगाता रहा है। 1969 में जब अलग राज्य की मांग की गई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर सुरक्षा बलों की फायरिंग में 369 युवा काल-कलवित हो गए थे। इसके बाद उग्र हुए आंदोलन के दौर से लेकर 2014 तक सैकड़ों लोगों ने या तो अलग राज्य के लिए आत्महत्या कर ली अथवा वे धरना-प्रदर्शन के दौरान मारे गए।

केसीआर की अब तक की राजनीति कांग्रेस के इसी 'इंदिरम्मा राज्यम' के विरोध पर उन्हें अजेय बना रही थी। किंतु पूर्व गृह मंत्री और गांधी परिवार के विश्वस्त पी. चिदंबरम ने तेलंगाना की जनता से जनांदोलन में मारे गए राज्य के निवासियों के लिए माफी मांगकर पार्टी के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की है। राहुल गांधी ने भी तेलंगाना गठन का श्रेय सोनिया गांधी को देकर राज्य की जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस देश में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी है, दक्षिण भारतीय राज्यों ने ही उसे उबार कर संबल दिया है। कर्नाटक का उदाहरण सामने है और अब यदि तेलंगाना में भी कांग्रेस की माफी काम कर गई तो केसीआर के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती होगी। वे देश में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस दलों का ऐसा तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में लगे थे जिससे वे स्वयं प्रधानमंत्री की रेस में शामिल हो सकें। अपनी पार्टी के नाम से तेलंगाना हटाकर भारत करना भी इसी रणनीति का हिस्सा था।

यदि तेलंगाना में कांग्रेस उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन करती है तो केसीआर के सामने भाजपा से गठबंधन करने का मार्ग ही बचेगा। ठीक वैसा ही जैसा कर्नाटक की हार के बाद जेडीएस ने किया। राज्य की जनता इस समीकरण को भी समझ रही है और बीआरएस के नेताओं से प्रश्न किए जा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस की रणनीति के विरुद्ध ओवैसी-केसीआर की राजनीतिक गलबहियां उसकी राह में रोड़े अटका रही है।

ओवैसी दिखा रहे कांग्रेस को दिन में तारे
ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन यानी एआईएमआईएम का प्रभाव हैदराबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों तक सीमित है किंतु मुस्लिमों को कांग्रेस से दूर करने की नीयत से इसके नेता असदुद्दीन ओवैसी देशभर में अपनी पार्टी के बैनर तले चुनावों में अपने प्रत्याशी उतारते हैं। बिहार में एमआईएमआईएम का कोई आधार नहीं है किंतु वहां ओवैसी ने 2020 के विधानसभा चुनाव में कई पार्टियों के साथ तालमेल करते हुए सीमांचल के इलाके में 20 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे जिनमें से पांच जीत गए थे। हालांकि बाद में उनके चार विधायक राजद के साथ चले गए।

इसी प्रकार ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में 95 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जिससे कांग्रेस सहित सपा का चुनावी गणित बिगड़ गया था। गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भी उनकी पार्टी ने प्रत्याशी उतारे हैं किंतु यह हास्यास्पद है कि जिस एमआईएमआईएम का वजूद ही तेलंगाना से है, वहां ओवैसी मात्र 9 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतार पाए हैं, वह भी हैदराबाद क्षेत्र के आसपास। तेलंगाना में मुस्लिम आबादी 13 प्रतिशत है और राज्य विधानसभा की कुल 119 सीटों में से करीब 45 सीटों पर मुस्लिम वोट असर डालने की स्थिति में हैं। फिर ओवैसी हमेशा से मात्र 8 या 9 प्रत्याशी ही क्यों उतारते आये हैं?

दरअसल, पूरे देश में ओवैसी की राजनीति भले ही भाजपा को चुनावों में लाभ पहुंचाती हो किंतु तेलंगाना में वे मुस्लिम वोटरों के बीच किसी प्रकार की दुविधा उत्पन्न नहीं करना चाहते और इस कारण वे कम प्रत्याशी उतारकर सीधे तौर पर केसीआर को संजीवनी दे देते हैं। ऐसा करके वे तेलंगाना में भाजपा के संभावित उभार को भी कुंद करते हैं ताकि हैदराबाद के मुसलमान उनसे नाराज न हों। किंतु इन सभी कवायदों से वे कांग्रेस को राज्य की राजनीति में दिन में तारे दिखा देते हैं क्योंकि तब मुस्लिम वोट एकमुश्त केसीआर की ओर शिफ्ट हो जाता है।

ओवैसी और केसीआर की राजनीतिक आत्मीयता को इससे भी समझा जा सकता है कि 12 नवंबर को जारी भारत राष्ट्र समिति के घोषणा-पत्र पर 16 नवंबर को ओवैसी की हद से अधिक सकारात्मक प्रतिक्रिया आई जबकि कांग्रेस के घोषणा-पत्र को उन्होंने 'काला कागज' कहा है।

राहुल गांधी के लिए अहम है तेलंगाना का चुनाव
दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से कांग्रेस की स्थिति थोड़ी मजबूत हुई है। फिर चाहे वह रणनीति के स्तर पर हो अथवा अन्य दलों की ओर से परिवारवाद को लेकर राहुल की आलोचना से संबंधित हो। जिन राहुल पर परिवारवाद का प्रखर आरोप लगता है वे स्वयं केसीआर के परिवारवाद के विरुद्ध राज्य की जनता की अदालत में खड़े हैं।

भ्रष्टाचार पर सवाल, भाई-भतीजावाद की निंदा और केसीआर की जोरदार घेराबंदी ने राज्य में राहुल गांधी की अलग ही छवि प्रस्तुत की है। उदाहरण के लिए, इस बार केसीआर दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। कामारेड्डी में राहुल गांधी ने अपने बेहद करीबी और भरोसेमंद नेताओं में से एक तेलंगाना कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रेवंत रेड्डी को कांग्रेस का उम्मीदवार बना दिया है। इसलिए यहां केसीआर उलझ गए हैं। दूसरी सीट गजवेल से केसीआर के पुराने विश्वस्त साथी और पूर्व मंत्री ई. राजेंद्र कमल दल की ओर से उनकी परेशानी बढ़ा रहे हैं। यानि केसीआर भाजपा से बचने दूसरी सीट पर गए तो राहुल गांधी के कारण अब दोनों सीटों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

राहुल गांधी उन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि इतनी तगड़ी घेराबंदी के बाद भी क्या केसीआर तेलंगाना के बाज बनकर उभरेंगे और तीसरी बार जीत पर झपट्टा मारकर सरकार बना लेंगे? इसे देखने के लिए 3 दिसंबर तक इंतजार करना पड़ेगा। लेकिन इतना तो तय है कि अगर कांग्रेस ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन किया तो वह भले ही सरकार न बना पाये लेकिन त्रिशंकु विधानसभा का रास्ता जरूर साफ कर देगी। सब कुछ प्रदेश में कांग्रेस के प्रदर्शन पर ही निर्भर करेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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