Tamil Nadu Politics: सामाजिक कटुता पैदा करनेवाला राजनीति का द्रविड़ मॉडल
Tamil Nadu Politics: उदयनिधि स्टालिन के बयान से चाहे विपक्षी गठबंधन "इंडिया" के घटक दलों ने पल्ला झाड़ लिया हो पर सच्चाई यही है कि 2024 के आम चुनाव की कड़क शुरुआत भारतीय राजनीति के मूल में समाये "ध्रुवीकरण" से कर दी गई है। अबकी यह "राजनैतिक नीतिपरक बंटवारा" हिंदू- मुस्लिम से आगे बढ़कर "उत्तर बनाम दक्षिण" "हिंदी बनाम गैर-हिंदी" और "हिंदू बनाम अन्य" करने की कोशिश की गई है।
दक्षिण भारत में कर्नाटक को छोड़ दिया जाए तो भाजपा की स्थिति लोकसभा या विधान सभा में कहीं भी सही नहीं है। दक्षिण भारत के 6 राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में इस समय कहीं भी भाजपा की सरकार नहीं है। दक्षिण भारत के इन राज्यों में 130 लोकसभा सीटें हैं, जिसमें से अभी केवल 29 सीटें बीजेपी के पास हैं। इसमें 25 अकेले कर्नाटक से ही हैं, जबकि चार सीट तेलंगाना में जीती थी।

भाजपा की इसी कमज़ोर कड़ी को विपक्ष द्वारा भुनाने की कोशिश की जा रही है। इसके हथियार के तौर पर दशकों से "द्रविड़ बनाम आर्य" या "संस्कृत/हिंदी बनाम द्रविड़ भाषा" या "ब्राह्मणवाद बनाम गैर ब्राह्मणवाद" को बनाया जाता रहा है। आधुनिक काल में "तमिल स्वाभिमान" के नाम पर जिस द्रविड़ मॉडल की दुहाई दी जा रही है उसके स्वरूप को समझने के लिए इसके प्रारम्भ को समझना जरूरी है। आखिर ब्राह्मणवाद विरोध की धुरी पर नाचता द्रविड़ मॉडल का इतिहास क्या रहा है?
18 वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों ने भारत की जड़ें खोदने की शुरूआत कर दी थी। उन्होंने अपने धार्मिक प्रचार प्रसार के लिए भाषा को हथियार बनाया विशेष रूप से तमिल। 1832 तक केवल तमिल भाषा में ही 40 हज़ार से ज़्यादा ईसाई धार्मिक पर्चे और किताबें छापी गयी थीं। 1852 तक इनकी संख्या 2 लाख 10 हज़ार तक पहुंच गई थी। 1852 तक तत्कालीन मद्रास में 1185 ईसाई मिशनरी स्कूल थे, जिनमें क़रीब 38 हज़ार बच्चे पढ़ते थे। इन्हें हिंदू धर्म के खिलाफ ब्रेनवाश किया जाता था। जब हिंदुओं ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार का विरोध किया, तब ईसाई मिशनरियों ने हिंदू देवी-देवताओ और उनकी आस्था का अपमान और दुष्प्रचार प्रारम्भ कर दिया।
इन मिशनरियों के खिलाफ दक्षिण भारत में वेदों के जानकार ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इकट्ठा हुआ था। इनका ध्येय सनातन परंपराओं, संस्कृति, लोक आस्था को बचाना था। धर्म की इस लड़ाई में ब्राह्मणों ने इंजीनियरिंग, सचिवालय, जिला प्रशासन और कोर्ट जैसी जगहों पर अपनी पकड़ मजबूत रखी ताकि मिशनरियों के विरुद्ध वो पद, पैसे और पावर को बनाकर रखें। जन साधारण में चेतना जगाकर हिंदुत्व को बचाये रखने की कवायद शुरू हुई।
मिशनरियों के विरोध में शुरू की गई लड़ाई के खतरे को समझते हुए मिशनरियों ने धीरे-धीरे तमिल समाज में ही सनातन विरोधी विचार भरना शुरू कर दिया क्योंकि मिशनरियों से जो तमिल ब्राह्मण लड़ रहे थे वो स्थानीय जनसंख्या में मात्र 3 प्रतिशत थे और संस्कृत के विद्वान थे। वे अपने पूर्वज "आर्य" को मानते थे और "वेद आधारित हिंदुत्व" को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान कहता है कि कोई भी तबका जब बहुसंख्यक हो तब संख्या बल में कम लोगों का प्रभुत्व और वर्चस्व सहन नहीं करता। भले ही यह वर्चस्व उस बहुसंख्यक समाज को बचाने के लिए ही उपयोग किया जा रहा हो। तमिलनाडु में यही हुआ।
ईसाई मिशनरी बहुसंख्यक हिन्दू समाज को वैदिक आर्य ब्राह्मणों के विरुद्ध करने में कामयाब रहे। चर्च ने सामाजिक भेदभाव को बढ़ा चढ़ाकर उभारा और ब्राह्मणों को हिंदू समाज में ही दुश्मन घोषित करवा दिया। बीसवीं सदी के आते-आते संस्कृत के जानकार तमिल ब्राह्मणों और वहाँ के अन्य हिन्दुओं के बीच तनाव बढ़ गया। बहुसंख्यक तमिल हिन्दू अब किसी भी कीमत पर ब्राह्मण के वर्चस्व को बर्दाश्त नहीं करना चाहते थे।
1916 में टी.एम. नायर और पिट्टी त्यागराया चेट्टी ने कांग्रेस से बग़ावत करके अपना 'गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र' जारी किया। इसके अलावा 1916 में ही मशहूर आध्यात्मिक गुरू मरिमलाई अडिगल ने तमिल शुद्धिकरण आंदोलन शुरू कर दिया। उनका उद्देश्य तमिल भाषा को संस्कृत के शिकंजे से आज़ाद कराना था। इसने धीरे-धीरे तमिल अलगाववाद का रूप धर लिया। आख़िर में इस आंदोलन के बीच से अलग द्रविड़नाडु यानी तमिल राष्ट्र की मांग उठने लगी। लड़ाई कहाँ से प्रारंभ हुई थी और आज कहाँ आ गई। विरोध का आलम यह है कि आज द्रविड़ लोग अंतिम संस्कार में शव को जलाते नहीं बल्कि दफ़नाते हैं।
मनमुटाव की यह खाई राजनीति स्वार्थ में और गहरी होती जा रही है। आज की स्थिति समझे तो बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय दक्षिण भारत में रोजी-रोटी की तलाश में जाते हैं। दक्षिण भारत आईटी, बीपीएम और स्टार्ट अप कंपनियों का हब है। सिर्फ बैंगलोर, हैदराबाद, चेन्नई में ही लगभग 70-75 प्रतिशत आईटी फर्म हैं। इन कंपनियों में हिंदी भाषी लोग बड़ी संख्या में काम करते हैं। कल कारखानों की बात की जाए तो तमिलनाडु भारत में नंबर वन है। भारत के टॉप 5 राज्य जहाँ उद्योग सबसे ज्यादा हैं उनमें तमिलनाडु पहले स्थान पर है। भारत में लगे सभी उद्योगों में राज्य की हिस्सेदारी 15.7 प्रतिशत है, जबकि आंध्र प्रदेश 19,924 उद्योगों के साथ (6.8 प्रतिशत) चौथे स्थान पर है।
तमिलनाडु के विविध निर्माण क्षेत्र में ऑटोमोबाइल, घटक, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, रसायन, चमड़ा और गैर-चमड़ा निर्माण शामिल हैं। कारखानों में काम करने वाले उत्तर भारतीय मजदूर बड़ी संख्या में हैं। विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में मजदूर यहाँ काम करते हैं। परंतु हिंदी भाषी होने से वो भी असमानता का सामना करते हैं। मजदूरों के अनुसार वो 12-15 घण्टे रोज काम करते हैं और स्थानीय तमिल मजदूर 8 घण्टे। परंतु पगार दोनों को बराबर ही मिलती है। इसी साल जनवरी से शुरु हुआ तमिल बनाम गैर तमिल विवाद इतना गहरा गया कि मजदूरों के पलायन की तस्वीरें और वीडियो अप्रैल तक सोशल मीडिया पर तैरती रही।
कभी द्रविड़ अस्मिता कभी तमिल सम्मान के नाम पर तमिलनाडु से रह रह कर आंदोलन उठते रहे हैं। पेरियार के ब्राह्मण विरोध से पहले से भी भाषा, विद्वता, तथाकथित "विशुद्ध और मूल निवासी" होने के दावे और शैव वैष्णव मत के अंतर के नाम पर द्रविड़ और उत्तर भारत का संघर्ष देखा गया है। यह अंतर वहाँ के जन साधारण के मन मतिष्क में गहरे बैठा हुआ है।
मजदूरों की मलिन बस्ती हो या व्हाइट कालर हाई प्रोफाइल नौकरी, जमीन पर हर जगह द्रविड़ और गैर द्रविड़ का बंटवारा दिखता है। इक्कीसवीं सदी में तमिलनाडु की यही सामाजिक सच्चाई है जिस पर नफरत की फसल काटने का काम द्रविड़ नेता करते रहे हैं। आज भी वो वही कर रहे हैं। यही उनकी द्रविड़ राजनीति का मॉडल है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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