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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती: क्रांतिकारी संन्यासी से सनातन धर्म के ध्वजवाहक

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पूज्यपाद ज्योतिषपीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ब्रह्मलीन हुये। सनातन धर्म के ध्वजवाहक के रूप में महाराज जी का ब्रह्मलीन होना सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिये अपूरणीय क्षति है।

Swaroopanand Saraswati

वे सदा आडम्बरहीन रहे। धर्म से इतर उन्होंने हर उस विषय पर हिन्दू समाज को मार्ग दिखाया जो उसके लिये अवश्यम्भावी था। वे प्रकांड विद्वान् थे किन्तु ज्ञान का उन्हें लेशमात्र भी अहंकार न था। उनमें जो सहजता, सरलता और गाम्भीर्य था, वह किसी और में दिखना कठिन है। उन्होंने नकली शंकराचार्यों की पदवी पर प्रश्न उठाकर मानो बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया था। इसके कारण भी उनके विरोधी पैदा हुए। लेकिन बाल्यकाल में बनी क्रांतिकारी संन्यासी की छवि को उन्होंने सदा बनाये रखा तो उसका एकमात्र कारण था कि वे पाखंडी नहीं थे और पाखंड के सदा विरोधी रहे।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती भारत की स्वतंत्रता के लिये 15 माह तक अंग्रेजों के कारागाह में रहे। स्वतंत्रता पूर्व के क्रांतिकारी क्रियाकलापों को देखते हुए अंग्रेजों ने उन पर ईनाम भी रखा था। स्वामी करपात्री महाराज के गौरक्षा आन्दोलन में नेतृत्व करने के कारण कांग्रेस की सरकार में उन्हें 3 बार भिन्न-भिन्न स्थानों पर 85 दिन तक जेल में रहना पड़ा। यहाँ तक कि 30 वर्षों तक राम मंदिर आन्दोलन को दिशा देने, न्यायालय में पक्षकार बनने तथा राजीव गाँधी सरकार का विरोध करने के कारण शंकराचार्य रहते हुए भी उन्हें जेल हुई।

राम मंदिर आन्दोलन के चलते जेल में रहने के दौरान उन्होंने राम मंदिर आन्दोलन पर बहुत सा साहित्य लिखा था जो अप्रकाशित है। महाराज जी ने स्वयं यह बात इस लेखक को उज्जैन सिंहस्थ कुम्भ में भेंट के समय बताई थी। वर्तमान राजनीतिक हालात में उसे प्रकाशित करने का साहस कौन करता है यह देखना दिलचस्प होगा।

स्वातंत्र्य, साधुत्व और संन्यास का संगम जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वतीस्वातंत्र्य, साधुत्व और संन्यास का संगम जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती

स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के जीवनकाल में उन पर तमाम आरोप लगाये गये। उनका जीवन भी विवादों का पिटारा बनाया जाता रहा किन्तु यह भी सत्य है कि उन पर आरोप लगाने वालों ने कभी उनके सम्मुख शास्त्रार्थ करने का साहस नहीं किया। क्योंकि अंतर्मन से वे जानते थे कि वे मात्र क्षणिक राजनीतिक लाभ हेतु उनकी छवि मलिन कर रहे हैं और जबकि शंकराचार्य सनातन धर्म की सेवा में रत हैं।

राजनीतिक व्यवस्था तथा हिन्दुओं को बरगलाने के विरुद्ध जाना उनका स्वभाव था और इसी स्वभाव को विवादित बनाने का प्रयास किया गया। जबकि उन्होंने शंकराचार्य रहते हुए जिस प्रकार हिन्दू हितों के लिए न्यायालय तक लड़ाई लड़ी, यह अपने आप में उनके महत्त्व को दर्शाता है। उनके द्वारा देशभर में 100 से अधिक आश्रम संचालित हैं जिनके माध्यम से सनातन का प्रसार तथा सेवा कार्य किये जाते हैं।

शंकराचार्य जी के अधिकांश आश्रम वन क्षेत्र तथा ग्रामीण क्षेत्र में हैं। सभी आश्रमों में भोजन और निवास की नि:शुल्क व्यवस्था दी जाती है। वनवासी क्षेत्रों के आश्रमों द्वारा शंकराचार्य जी के "स्वधर्मानयन अभियान" के तहत ईसाई बन चुके वनवासियों की पुनः सनातन धर्म में वापसी हुई है। इन आश्रमों द्वारा वेदान्त की शिक्षा, वेद पाठ्यक्रम का अनुपालन, सनातन पूजा पद्धतियों का प्रसार किया जा रहा है।

देशभर में उनकी प्रेरणा से उनके अनेकानेक शिष्यगण अनेक प्रकार के सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। इन सेवा प्रकल्पों में देशभर में गरीब जनता, वनवासी समाज, साधु-संत, विद्यार्थी शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा, आवास इत्यादि का लाभ उठा रहे हैं। गोरक्षा को समर्पित महाराज जी ने देशभर में अनेक गोशालाओं की स्थापना की। राम सेतु पर उठे प्रश्नों पर भी उन्होंने खुलकर तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था का विरोध किया।

स्वरुपानंद सरस्वती महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने अपने संयुक्त संदेश में कहा है कि "शारदा पीठ के शंकराचार्य जी के ब्रह्मलीन होने से धर्म क्षेत्र के तपस्वी एवं परम ज्ञानी आचार्य अब अपने मध्य सशरीर नहीं रहे। समस्त हिंदू समाज एवं समूचा राष्ट्र उनके मार्गदर्शन से वंचित रहेगा।"

पूज्यपाद शकराचार्य की स्मृतियों को नमन करते हुए आचार्य शंकर के ही शब्दों में आज समस्त हिन्दू समाज अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।

अर्थात मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं, मैं चैतन्य के रूप में सब जगह व्याप्त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं, न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
swami swaroopanand saraswati from a revolutionary sannyasi to shankaracharya
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