Electoral Bonds: चुनाव आयोग के गले में फंसी चुनावी चंदे की फांस
Electoral Bonds: चुनावी चंदे को सार्वजनिक करने का मामला चुनाव आयोग के लिए भी गले की हड्डी बनता जा रहा है। शीर्ष अदालत का सख्त आदेश है कि समय सीमा के भीतर जानकारी सार्वजनिक तौर पर साझा की जाए, वहीं उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के मुखिया ने मामले में संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत महामहिम राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने दोबारा सुनवाई करने का आग्रह किया है। हालांकि बार निकाय की कार्य समिति अपने ही अध्यक्ष की मांग से असहमति जताते हुए इसे उच्चतम न्यायालय के अधिकारों को कमतर करने का प्रयास बताया है।

इस बीच जम्मू कश्मीर के दौरे पर गए मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह कहकर कि उचित समय आने पर बैंक द्वारा प्राप्त विवरण साझा किया जाएगा, तमाम तरह की अटकलों को हवा दे दी है। लोग अपने-अपने हिसाब से प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ लोगों की राय है कि जब बैंक ने विवरण दे दिया तो उसे सार्वजनिक कर दिया जाना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ खड़े लोगों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय की अति न्यायिक सक्रियता लोकतंत्र के लिए बहुत शुभ नहीं है। न्यायपालिका बनाम विधायिका होते जा रहे इस विवाद में अब चुनाव आयोग की साख भी दांव पर है।
लगातार बहानेबाजी पर उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद भारतीय स्टेट बैंक ने एक दिन पहले 1 अप्रैल 2019 से 15 फरवरी 2024 के बीच कुल 22,217 चुनावी बांड जारी करने की जानकारी चुनाव आयोग को दी है। बैंक ने यह भी बताया है कि शेष 187 बांड को भुनाकर उसकी राशि नियमों के तहत प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जमा कराया गया है। शीर्ष अदालत के आदेश के मुताबिक बैंक द्वारा साझा की गई जानकारी आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर 15 मार्च 2024 को शाम 5:00 बजे तक प्रकाशित करनी होगी।
उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार योजना से जुड़ा पूरा विवरण बैंक ने दो पीडीएफ फाइल में निर्वाचन आयोग को सौंप दिया है, जो कि पासवर्ड से सुरक्षित है। इसमें चुनावी बांड को बनाने की तारीख, चंदा प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों के नाम और बांड के मूल्य वर्ग जैसे विवरण दिए गए हैं। हलफनामे के मुताबिक 1 अप्रैल 2019 से 11 अप्रैल 2019 के बीच कुल 3,346 चुनावी बांड खरीदे गए और 1,609 भुनाए गये। इसी तरह 12 अप्रैल 2019 से 15 फरवरी 2024 तक कुल 18871 चुनावी बांड खरीदे गए। अब यह जानकारी चुनाव आयोग को अपनी वेबसाइट पर देश की आम जनता के लिए साझा करना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार का वक्तव्य है कि उचित समय आने पर आयोग बैंक द्वारा प्राप्त विवरण साझा किया जाएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस बयान के बाद यह चर्चा जोरों पर है कि देश में आसन्न लोकसभा चुनाव को देखते हुए शायद सरकार भी यह नहीं चाहती कि विवरण बाहर आए।
भारतीय स्टेट बैंक इस बाबत अपनी अर्जी लेकर पहले भी उच्चतम न्यायालय के पास गया था तथा निवेदन किया था कि उसे विवरण देने के लिए 30 जून तक का समय दिया जाए। बैंक ने तर्क दिया था कि बांड खरीदने वाले और राजनीतिक दलों के नाम का मिलान करने में उसे वक्त लग रहा है, क्योंकि यह जानकारियां चुनावी बांड नियमों के मुताबिक सुरक्षा की दृष्टि से डिजिटल रूप में रखने की बजाय हस्तलिखित रूप में दो जगह पर सील बंद लिफाफे में रखी गई है। इसलिए हर दस्तावेज का मिलान करने में समय लगेगा।
लेकिन शीर्ष अदालत ने बैंक की एक नहीं सुनी, और समय सीमा के भीतर जानकारी न देने पर दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। इस बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने मामले में महामहिम राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की। महामहिम को लिखे पत्र में संगठन के अध्यक्ष ने आग्रह किया कि जब तक शीर्ष अदालत मामले की दोबारा सुनवाई न कर ले तब तक संबंधित फैसले पर अमल न किया जाए।
उनका तर्क है कि विभिन्न राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले कॉर्पोरेट घरानों के नाम का खुलासा करने से यह घराने उत्पीड़न की दृष्टि से संवेदनशील हो जाएंगे, क्योंकि जिन दलों को यह चंदा कम या नहीं दिए होंगे उनके निशाने पर आने की संभावना बढ़ जाएगी। अगर ऐसा होता है तो यह सुरक्षित चंदा स्वीकार करते वक्त उनके साथ किए गए वादे से मुकरने जैसा भी होगा।
लेकिन राजनीतिक हलकों में बार एसोसिएशन के मुखिया द्वारा उठाया गया यह कदम सरकार प्रायोजित बताए जाने लगा। अब तो बार निकाय की कार्य समिति ने भी अपने अध्यक्ष के इस कदम की कड़ी निंदा की है। कार्य समिति के सदस्यों ने असहमति प्रकट करते हुए अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया है कि 'समिति के सदस्यों ने न तो अध्यक्ष को पत्र लिखने के लिए अधिकृत किया था और न ही वे उनके द्वारा लिखे गए विचारों का समर्थन करते हैं। अपने प्रस्ताव में लिखा है कि महामहिम को लिखे गए पत्र की भाषा भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार को खत्म करने के प्रयास जैसा है। कार्य समिति स्पष्ट रूप से इसकी निंदा करती है।'
दरअसल चुनावी बांड से जुड़ा यह मामला देश की चुनाव प्रक्रिया की सुचिता से संबंधित है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। चुनावी चंदे के लिए जब बांड की व्यवस्था की गई थी तभी से इसको लेकर सवाल उठने लगे थे कि आखिर इसे इतना गोपनीय क्यों रखा जा रहा है। फिर चंदा देने की सीमा भी समाप्त कर दी गई थी। पहले कंपनियां अपने वार्षिक मुनाफे का केवल सात प्रतिशत हिस्सा चुनावी चंदे के रूप में दे सकती थी जिसे अब समाप्त कर दिया गया है। मतलब कोई कंपनी जितना चाहे उतना पैसा किसी पार्टी को चुनावी चंदे के रूप में दे सकती है।
इससे संदेह गहरा होने लगा था कि कहीं कुछ कंपनियां अपने फायदे के लिए राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में रिश्वत तो नहीं दे रही हैं। चुनावी चंदे को सूचना के अधिकार कानून से भी बाहर रखा गया था जिससे लोगों को चंदा देने वालों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती थी।
एडीआर सहित अन्य लोगों ने चुनावी चंदे में पारदर्शिता के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लंबी चली सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने इलेक्टोरल बांड की वैधता खारिज कर दी तथा इसके जरिए प्राप्त चंदे का विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है।
ऐसे में सभी संबंधित पक्षों से यह अपेक्षा है कि फैसले के शब्दों और उसकी भावनाओं को समझते हुए इस पर पूरी गंभीरता से अमल सुनिश्चित करने की कोशिश हो। लेकिन अफसोस की बात है कि भारतीय स्टेट बैंक ने विवरण देने में पहले आनाकानी की, फिर अदालत में अर्जी लगाकर समय सीमा बढ़ाने की मांग की, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इनकार कर दिया। अब बरास्ता बार एसोसिएशन मामले को लंबा खींचने की कोशिश की जा रही है।
ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग भी चुनवी चंदे को लेकर दबाव में है इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त उचित समय आने पर विवरण को साझा करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में चुनावी चंदे को लेकर न्यायपालिका और विधायिका के बीच चल रही रस्साकसी के दरमियान चुनाव आयोग की साख भी दांव पर है। देखना दिलचस्प होगा कि कल 15 मार्च की शाम 5:00 बजे तक आयोग विवरण सार्वजनिक कर अदालत के फैसले की तामील करता है अथवा उचित समय का इंतजार करता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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