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Men's Commission: मर्द को भी दर्द होता है मीलार्ड!

Men's Commission: भारत में मर्द फिल्म का एक डॉयलाग खूब प्रचलित है, मर्द को दर्द नहीं होता। शायद सुप्रीम कोर्ट भी इस डायलॉग से प्रभावित है इसीलिए घरेलू हिंसा के मामले में प्रताड़ित पुरुषों के लिए दायर की गयी याचिका पर सुनवाई से ही इन्कार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने सोमवार 3 जुलाई को एक ऐसी जनहित याचिका को खारिज कर दिया जिसमें पुरुष प्रताड़ना को रोकने के लिए पुरुष आयोग के गठन की मांग की गयी थी।

किसी भी समाज की उन्नति एवं प्रगति के लिए स्त्री एवं पुरुष दोनों के प्रति समान दृष्टिकोण आवश्यक है। यह बात सत्य है कि भारत में स्त्री को देवी माना गया है, परन्तु स्त्री देवी है तो पुरुषों को भी देवता की संज्ञा दी गयी है। देवी और देव के समन्वय से ही संसार का संचालन हो सकता है। भारत में पश्चिम से आया हुआ जो फेमिनिज्म है, उसने महिलाओं को तो आत्मपीड़क बनाया ही है, अपितु विधायिका, न्यायपालिका में भी यही आत्मपीड़क विमर्श हावी है। जैसे स्त्रियों के साथ ही तमाम अत्याचार हुए हैं और हो रहे हैं।

Supreme Court declines PIL for creation of National Commission for Men

यदि अत्याचार हुए हैं, तो उसके लिए दंड भी मिले ही हैं। भारत का समाज ऐसा ही रहा है जिसमें स्त्रियों के प्रति सहज आदर रहा है और यहाँ पर परिवार की प्रमुखता रही है। परिवार का कुशल संचालन तभी हो सकता है, जब पति एवं पत्नी दोनों ही परस्पर एक दूसरे के संपूरक बन कर कार्य करें। महिलाओं के प्रति समाज में जो कुरीतियाँ समय के साथ उत्पन्न हुई थीं, उनका निराकरण करने के लिए कई क़ानून बने, जैसे दहेज़ विरोधी, घरेलू हिंसा विरोधी अधिनियम आदि।

इन अधिनियमों ने महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों अर्थात दहेज़ हत्या आदि पर रोक लगाई। परन्तु काफी समय से ऐसा देखा गया है कि महिलाओं को दहेज उत्पीड़न से सुरक्षा देनेवाला कानून 498 ए, अब पुरुषों को परेशान करने वाला उपकरण बन गया है। कई बार न्यायालय ने भी यह टिप्पणी की है कि ये क़ानून महिलाओं द्वारा पुरुषों को परेशान करने वाले उपकरण होते जा रहे हैं।

रोज ही ऐसे किस्से सामने आते रहते हैं कि दहेज़ अधिनियम की प्रताड़ना के चलते किसी न किसी पुरुष ने फांसी लगाई। घरेलू विवादों के चलते आत्महत्या करने वाले पुरुषों का आंकड़ा चौंकाने वाला है। सात माह पहले रायपुर के आंकड़ों का हवाला एक दैनिक समाचार पत्र ने देते हुए लिखा था कि आत्महत्या करने वाले लोगों में 70% पुरुष थे।

समय समय पर इन आंकड़ों पर बात होती रही है कि कैसे घरेलू विवाद के चलते पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं, परन्तु उन आत्महत्याओं पर चर्चा नहीं होती है। यह विमर्श नहीं बन पाता कि आखिर क्या कारण है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" का आरोप झेल रहे मर्द एक समय पर आकर इतने विवश हो जाते हैं कि वह आत्महत्या ही अंतिम विकल्प मानते हैं। यह तक सामने आया है कि पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। कोरोना में लॉकडाउन के दौरान पत्नियों द्वारा पतियों को प्रताड़ित करने के मामलों में भी लगभग 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

पुरुष द्वारा आत्महत्या को अंतिम विकल्प मानने वाली बात जितनी गंभीर है, उससे कहीं अधिक गंभीर है समाज द्वारा इस पर बात न करना। आखिर में यह प्रश्न तो उठना ही चाहिए कि क्या महिला सुरक्षा की बात करते करते कहीं अपने समाज के पुरुषों को ही असुरक्षा की ऐसी सुरंग में तो नहीं धकेल दिया कि जहां से उनके पास वापसी का कोई मार्ग नहीं हो। यह प्रश्न और कोई नहीं बल्कि आंकड़े ही उठा रहे हैं।

पुरुषों के लिए आयोग गठित करने की मांग करने वाले वकील महेश कुमार तिवारी ने भारत में आकस्मिक मौतों पर 2021 में प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि वर्ष 2021 में देश भर में 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की थी, इसमें से 81,063 विवाहित पुरुष थे और 28,680 विवाहित महिलाएं सम्मिलित थीं। याचिका के अनुसार, साल 2021 में 33.2 प्रतिशत पुरुषों ने पारिवारिक समस्याओं के चलते आत्महत्या की, वहीं महिलाओं में ये आंकड़ा 4.8 प्रतिशत है।

परन्तु सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहते हुए याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया गया कि याचिकाकर्ता मात्र एकतरफा तस्वीर पेश करना चाहते हैं। न्यायालय की ओर से यह कहा गया कि क्या आप हमें शादी के तुरंत बाद मरने वाली युवा लड़कियों का आंकड़ा दे सकते हैं? जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने यह भी कहा कि कोई भी आत्महत्या नहीं करना चाहता, यह व्यक्तिगत मामलों पर निर्भर करता है।

याचिका की वापसी होने के बाद पुरुषों के लिए कार्य करने वाली बरखा त्रेहन ने कहा कि माननीय न्यायालय द्वारा पुरुष आयोग की मांग की याचिका पर बात न करना कहीं न कहीं भारत की आधी आबादी को द्वितीय श्रेणी का नागरिक घोषित करने जैसा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद पुरुष आयोग की मांग करने वाले लोग निराश हैं। परन्तु आयोग से कहीं अधिक यह जानना महत्वपूर्ण है कि वर्तमान स्त्री हितैषी कानूनों के दुरुपयोग से पुरुष भी पीड़ित है। समाज में यह विमर्श बनना चाहिए कि पुरुषों के विरुद्ध महिला कानूनों का दुरूपयोग न हो और घरेलू विवाद भी इस सीमा तक न हों कि वह समाज के पुरुषों के लिए हानिकारक हो जाए। उस डॉयलॉग को भी भूल जाने की जरूरत है कि मर्द को दर्द नहीं होता! मर्द को दर्द भी होता है, और इस दर्द के चलते वह आत्महत्या भी करते हैं!

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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