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Students under Stress: अवसाद की चपेट में क्यों आ रही है युवा पीढ़ी?

हजारों छात्र-छात्राओं के कैरियर को बुलंदी पर पहुंचाने वाला और कोचिंग सिटी के नाम से प्रसिद्ध कोटा शहर बीते कुछ समय से नकरात्मक कारणों से सुर्खियों में है। ये नकारात्मक कारण हैं किशोर नौजवान छात्रों की आत्महत्या। लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह कोटा और कोचिंग तक सीमित है?

भारतीय युवाओं में तेजी से बढ़ रहे मानसिक अवसाद के आंकड़े बताते हैं कि यह समूचे देश की समस्या बन चुकी है। हाल के वर्षों में भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो अध्ययन-सर्वेक्षण हुए हैं उनके आंकड़े चिंताजनक हैं। सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि साल दर साल मानसिक अवसाद की जद में आने वाले युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

Students under Stress

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2020 में 18 से 24 वर्ष आयु समूह के 9.3 प्रतिशत युवा अवसाद और घबराहट से ग्रसित थे। मार्च 2022 में यह आंकड़ा बढ़कर 16.8 प्रतिशत हो गया। 2023 के शुरुआती सर्वेक्षण इस बात का संकेत देते हैं कि फिलहाल देश की एक चौथाई युवा आबादी किसी न किसी अवधि में अवसाद, बेचैनी, घबराहट के दौर से गुजरती है। ये आंकड़े इस बात के संकेत हैं कि देश में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।

बढ़ते मानसिक अवसाद के कारण क्या हैं?
मानसिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ बढ़ते मानसिक रोग के लिए विभिन्न कारणों को जिम्मेवार ठहराते हैं। किशोरों में बढ़ते अवसाद के लिए माता-पिता द्वारा बच्चों से उच्च अपेक्षा रखने, करियर संवारने का दबाव, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, आवेगपूर्ण आचरण, अध्ययन में पिछड़ना, युवाकालीन भावनात्मक रिश्ते, स्थितियों के लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराने की मानसिकता, सामाजिक दबाव, उपयुक्त देखभाल और सुविधा एवं सपोर्ट व्यवस्था की कमी, मादक द्रव्य और साइकोएक्टिव पदार्थ जैसे नशों का सेवन आदि प्रमुख माना जाता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अनंदिता चक्रवर्ती के अनुसार, 'युवाओं में बढ़ते अवसाद के अनेक कारण हैं, जिनमें करियर संबधित विभिन्न प्रकार के दबावों से लेकर नैदानिक व्यवस्था की कमी तक शामिल हैं।' अवसादग्रस्त युवाओं की मदद के लिए 'आइना' नामक संस्था चलाने वाले अकसीर सोढ़ी ने इस क्षेत्र में काफी काम किया है। उनका कहना है, 'युवाओं में अवसाद की शुरुआत तब होती है जब वे अपनी बात किसी को कह नहीं पाते और किसी तरह की कुंठा-घुटन की चपेट में आ जाते हैं। अगर युवाओं को अपनी बात खुलकर कहने वाले मिल जाएं और उन्हें सही सलाह और चिकित्सा समय पर उपलब्ध हो तो वे अवसाद की खाई में गिरने से बच सकते हैं।'

नब्बे के दशक से लगातार खराब हुए हैं हालात
कई समाज शास्त्रियों का मानना है कि भारत में अवसाद, घबराहट, अतिचिंता जैसे मानसिक विकार के पीछे बदलते अर्थतंत्र और इसके कारण पारंपरिक जीवन में हुए बदलाव का बड़ा योगदान है। डिजिटल क्रांति, उपभोक्तावाद से जो आधुनिकता आई है उसने व्यक्ति को कहीं अधिक आत्मकेंद्रित और अर्थकेंद्रित बना दिया है। इसके कारण लोग उपभोक्तावाद की जकड़न और आर्थिक चुनौतियों से हमेशा घिरे रहने लगे हैं। आत्म-क्रेंदित जीवन व्यवस्था के कारण सरोकार सीमित होते जा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के निजी रिश्ते तक बुरी तरह प्रभावित हैं।

गौरतलब है कि 1990 दशक को भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव का आधार बिंदु माना जाता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को लेकर उपलब्ध सर्वेक्षणों पर गौर करने से सिद्ध होता है कि 1990 के दशक बाद देश की आम आबादी में विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों की संख्या में लगातार और चिंताजनक गति से वृद्धि हुई है। दो साल पहले प्रसिद्ध स्वास्थ्य अनुसंधान पत्रिका लांसेट ने 1990-2017 की समय अवधि में भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति में हुए परिवर्तनों का सर्वेक्षण किया था।

इस शोध रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में भारत में करीब 19.7 करोड़ लोग किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार थे। यानी कुल आबादी के लगभग 14.3 प्रतिशत लोग मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे थे। देश के रोग बोझ के हिसाब से यह 1990 की तुलना दो गुना ज्यादा था। मानसिक रोग में सर्वाधिक योगदान अवसाद और घबराहट (एनेक्सिटी) का है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में करीब 4.5 करोड़ लोग अवसाद और करीब 4.8 करोड़ लोग घबराहट की समस्या से ग्रस्त थे। 1990 में औसतन मानसिक अस्वस्थता की अवधि प्रति व्यक्ति 2.4 वर्ष थी जोकि 2017 में बढ़कर 4.7 वर्ष हो गई।

इस अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि 1990 की तुलना में अब कहीं अधिक नौजवान मानसिक व्याधि की चपेट में आ रहे हैं। अध्ययन में पाया गया है कि महिलाएं पुरुष के मुकाबले कहीं अधिक मानसिक अवसाद की चपेट में आ रही हैं। इस अध्ययन में एक खास बात उभरकर सामने आई है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में अवसाद की प्रवृत्ति काफी कम है, जबकि केरल, महाराष्ट्र तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे तुलनात्मक रूप से विकसित राज्यों में अवसाद की प्रवृत्ति सर्वाधिक है। इन राज्यों में प्रति एक लाख लोगों में 3700 से अधिक लोग अवसाद ग्रस्त पाए गए, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह अनुपात प्रति लाख 2700 या इससे कम था।

हालांकि हाल के वर्षों में केंद्र और कुछ राज्य सरकारों ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई कदम उठाए हैं। जैसे कोटा में ही किशोर नौजवानों द्वारा आत्महत्या के मामलों के सर्वेक्षण के बाद राजस्थान सरकार द्वारा गठित हाई लेवल कमेटी ने भी अपनी सिफारिशें दी हैं, जिनमें कोचिंग संस्थानों को कोचिंग के घंटे कम करने, मनोरंजक गतिविधियों के साथ छात्रों के अनुकूल माहौल बनाने के निर्देश शामिल हैं।

लेकिन उपरोक्त आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि संकट को कम करने के लिए घर-परिवार, स्कूल-कॉलेज-कोचिंग संस्थान से लेकर कार्यालय तक, हर ओर तनाव मुक्त माहौल बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। आनेवाली पीढ़ी पर जरूरत से ज्यादा उम्मीदों का बोझ लादना उनको कमजोर कर रहा है। कैरियर में सफलता का दबाव उनके जीवन की विफलता का कारण बनता जा रहा है। यह दुखद है कि इस दिशा में सरकारी स्तर पर नीति निर्धारण से लेकर सामाजिक स्तर पर कोई खास पहल देखने को नहीं मिल रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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