Prachanda as Nepal PM: प्रचंड के फिर प्रधानमंत्री बन जाने की कहानी
नेपाल में भारी उलटफेर हो गया है। नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' ने एन मौके पर पाला बदल लिया और अपने विरोधी केपी शर्मा ओली से हाथ मिला लिया।

Prachanda as Nepal PM: नेपाल में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को प्रतिनिधि सभा चुनाव में जनता ने निराश किया तो क्या हुआ, राजनीति की बिसात पर उनकी सधी गोटी सटीक बैठी और एक झटके में बड़ा उलट फेर हो गया।
ओली के लिए राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी एक बार फिर काम आई और ओली की लॉटरी लग गई। ओली ने प्रचंड तथा अन्य छोटे राजनीतिक दलों के साथ मिलकर तत्काल बने अपने नए गठबंधन की संवैधानिक सरकार बनवा ली। इसके लिए भले ही उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाना ही क्यों न कबूल करना पड़ा।
नेपाल की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले कूटनीतिज्ञ इस मामले में ओली का लोहा मान रहे हैं। अगले दो महीने में नेपाल के नए राष्ट्रपति का चुनाव होना है। इस सफलता के बाद ओली एक बार फिर अपनी पार्टी की विद्यादेवी भंडारी अथवा आदिवासी समुदाय से आने वाले सुभाष नेवांग को राष्ट्रपति बनवाने का यत्न करेंगे ताकि आने वाले दिनों में भी नेपाल की सत्ता में उनकी तूती बोलती रहे।
चर्चा के मुताबिक सत्ता के लिए हुए नए समझौते में प्रचंड, ओली और अन्य दलों के गठबंधन के बीच दो-दो और एक साल के फार्मूले पर सहमति बनी है। नेपाल की मौजूदा प्रतिनिधि सभा पांच साल के लिए चुनी गई है। पहले दो साल तक महज 32 सीटों वाले सीपीएन माओसिस्ट सेंटर की ओर से प्रचंड प्रधानमंत्री होंगे। बाद के दो साल तक 78 सीटों वाली सीपीएन यूएमएल यानी ओली की पार्टी का कोई प्रधानमंत्री होगा। इससे चुनाव में 89 सीट जीत आने वाली सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस विपक्ष में बैठकर टुकुर टुकुर ताकती रहेगी।
फार्मूले के मुताबिक सब ठीक चलता रहा तो आखिरी एक साल गठबंधन में शामिल अन्य दल के किसी प्रतिनिधि को नेपाल के प्रधानमंत्री बनने का मौका दिया जाएगा। 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में बहुमत के लिए 138 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है। 20 नवंबर को संपन्न हुए चुनाव में सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस और प्रचंड के नेतृत्व में बने गठबंधन के 135 सदस्य विजयी रहे। मतलब सदन में बहुमत पाने के लिए उनको बाहर से और तीन सांसदों का जुगाड़ करना पड़ता। गणित के अनुरूप 25 दिसंबर की शाम राष्ट्रपति के पास सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेरबहादुर देउबा को तीन सांसदों के जुगाड़ में लगना था। मगर पुराने प्रतिद्वंदी प्रचंड से मिलकर ओली ने पूरा पासा ही पलट दिया।
सीपीएन यूएमएल नेता ओली की शह पर गठबंधन के छोटे पार्टनर प्रचंड बड़े सहयोगी नेपाली कांग्रेस के देऊबा से खुद को पहले प्रधानमंत्री बनाए जाने की मांग करने लगे। प्रचंड की मांग को धूमिल करने के लिए नेपाली कांग्रेस ने देउबा के नेतृत्व को लेकर तमाम दुविधा को खत्म करने का काम किया। नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व के लिए हंगामेदार लोकतांत्रिक चुनाव हुआ। उसमें 78 वर्षीय देउबा ने युवा महासचिव गगन थापा को करारी शिकस्त दी। राजनीतिक पंडितों की राय में गगन थापा जीते होते तो प्रचंड के लिए गठबंधन छोड़ कर जाना नैतिक रूप से आसान नहीं होता।
हालांकि ओली की ओर से बेहद कम संख्या में चुनकर आए नए दल को प्रधानमंत्री बनाने का प्रलोभन देना नए गठबंधन को मूर्तरूप देने में प्रभावी रहा। यह तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के लिए हैरत वाली बात बन गई। नेपाली कांग्रेस के नेता मानते हैं कि उनको ऐसा कुछ हो जाने का कतई अंदाजा नहीं था। लिहाजा उन्होंने गठबंधन की सरकार में पहले ढाई साल तक छोटे सहयोगी दल के नेता प्रचंड को प्रधानमंत्री बनने का मौका देने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया।
रविवार को ठोकर खाते ही प्रचंड उठकर सीधे पूर्व प्रधानमंत्री ओली के आवास पर पहुंचे। वहां नए सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए पर्याप्त संख्या में सांसद पहले से मौजूद थे। प्रचंड के लिए भी ओली की ओर से मिले ऑफर में चौंकाने वाली बात थी कि राजनीति की दशा और दिशा बदलने के लिए पहली बार राजनीति में उतरे तेज तर्रार पूर्व पत्रकार रवि लामिछाने भी ओली के आवास पर उनका इंतजार कर रहे थे।
नए सत्तारूढ़ गठबंधन में प्रचंड को प्रधानमंत्री मानने वाले सांसदों की कुल संख्या 165 है। इनमें महज 20 सीटें जीतकर आई लामिछाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, राजतंत्र वापसी की कट्टर समर्थक 14 सीटों वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, 12 सीटों वाली जनता समाजवादी पार्टी, छह सीटों वाली क्षेत्रीय जनमत पार्टी और नागरिक उन्मुक्ति पार्टी के तीन सांसदों का हस्ताक्षर शामिल है।
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काठमाडू के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग अनंत का मानना है कि आगे भी नेपाल को "आया राम, गया राम" राजनीति से छूटकारा मिलता नहीं दिख रहा। तीसरी बार प्रधानमंत्री बने प्रचंड के लिए मौजूदा गठबंधन की सरकार चलाने में बड़ी मुसीबतें आने वाली हैं। एक ओर उन पर प्रतिद्वंदी पार्टी सीपीएन यूएमएल के नेताओं का दबाव रहेगा तो दूसरी ओर सरकार के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने में माहिर रवि लामिछाने को संभाल कर रखने की मुसीबत हमेशा मुंह बाए खड़ी होगी। लामिछाने पॉपुलर बने रहने के लिए स्टंट करते रहेंगे। इनसे बचने के बाद ही प्रचंड अपनी माओसिस्ट सेंटर के एजेंडे का ख्याल रख पाएंगे।
गौरतलब है कि नेपाल की राजनीति में प्रचंड का जन्म दस वर्षों की माओवादी हिंसा और सेना व राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ भूमिगत सशस्त्र विद्रोह की समाप्ति के बाद हुआ है। नवंबर 2006 में इसके लिए भारत की मध्यस्थता से नेपाल की राजशाही और माओवादियों के बीच लोकतंत्र बहाली का समझौता हुआ था। प्रचंड की इस सरकार में राजशाही की वापसी और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनवाने की कट्टर समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी शामिल है। ऐसे में गठबंधन के दलों में पांच सालों का लंबा साथ कैसे निभता है,यह देखना दिलचस्प होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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