नेपाल में 19 महीने बाद लौट आया कम्युनिस्ट शासन, भारत के लिए क्यों खतरा मान रहे रक्षा विशेषज्ञ?
जब तक नेपाल में राजशाही रही, चीन नेपाल की राजनीति से पूरी तरह से दूर रहा। लेकन, राजशाही के खात्मे ने चीन के लिए नेपाल के दरवाजे खोल दिए। वहीं, मनमोहन सिंह अपने 10 सालों के कार्यकाल में एक बार भी नेपाल का दौरा नहीं किया।
Nepal Politics News: नेपाल कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले पांच दलों के चुनाव पूर्व गठबंधन से बाहर निकलने के कुछ घंटों बाद ही नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने अपने विरोधी केपी शर्मा ओली के साथ हाथ मिला लिया और इसके साथ ही 19 महीने के बाद ही नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियां फिर से सत्ता में लौट आई हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-यूनिफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट (CPN-UML) के अध्यक्ष और अन्य छोटे दलों को मिलाकर नेपाल में एक नये गठबंधन का गठन किया गया और पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' देश के नये प्रधानमंत्री बन गये हैं। ये गठबंधन पूरी तरह से चीन को खुश करने वाला है और विदेश मामलों को एक्सपर्ट्स इस गठबंधन की सरकार बनने से चिंतित हैं।

19 महीने के बाद कम्युनिस्ट सरकार
नेपाल में भारत को असहज करने वाली सरकार का गठन हुआ है और एक्सपर्ट्स की मानें, तो बिल्कुल चीन की पसंदीदा सरकार का गठन हुआ है, जिसकी कोशिश में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी लगातार काम कर रही थी। पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने 275 सदस्यीय सदन में छह दलों के 170 सांसदों और चार निर्दलीय सांसदों के समर्थन का दावा किया है। पिछले महीने हुए आम चुनाव में एक बार फिर से किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ, हालांकि नेपाली कांग्रेस 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी के पास क्रमशः 78 और 32 सीटें हैं। कहा जा रहा है, कि शेर बहादुर देउबा के साथ सहमति नहीं बनने से चुनाव पूर्व का ये गठबंधन टूटा है। वहीं, केपी शर्मा ओली, जो चीन के वफादार हैं, उनके साथ सरकार को लेकर जो डील की गई है, उसके तहत रोटेशन से सरकार चलाने पर सहमति बनी है।
एक्सपर्ट क्यों हैं इस सरकार से चिंतित?
नेपाल, भारत और चीन दोनों ही देशों के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद खास है और साल 2006 में जब से भारत ने नेपाल की माओवादी पार्टियों का साथ दिया, उसके बाद से ही नेपाल की एक भी राजनीतिक पार्टियां भारत की वफादार नहीं रहीं। वहीं, नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार के लिए चीन की गोदी में खेलना काफी आसान था। । केपी शर्मा ओली चीन के समर्थक हैं, जबकि देउबा भारत के करीबी माने जाते हैं, लिहाजा देउबा का सरकार में नहीं आना भारत के लिए बड़ा झटका है। भारत के प्रसिद्ध विदेश नीति विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने प्रचंड सरकार को भारत के लिए बड़ा झटका माना है। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा कि, "एक ऐसे देश में, जहां के राजनेता अपनी बदमाशियों के लिए कुख्यात हैं, वहां कम्युनिस्ट समूह (माओवादियों से लेकर मार्क्सवादी-लेनिनवादियों तक) सत्ता में लौट आए हैं। 2018 में दुनिया का छठा कम्युनिस्ट शासित राज्य बनने के बाद चीन ने नेपाल में रणनीतिक घुसपैठ की है और कम्युनिस्ट 19 महीने के अंतराल के बाद वापस लौट आए हैं"।

नेपाल की राजनीति में चीन की कितनी पकड़?
जब पिछले साल नेपाल में केपी शर्मा ओली की सरकार ने संसद में अपना बहुमत खो दिया था, तो उनकी सरकार को बचाने के लिए तत्कालीन चीनी राजदूत हाओ यांगकी ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से मुलाकात कर ओली की सरकार को समर्थन देने की पैरवी की थी। उस वक्त उन्होंने प्रमुख कम्युनिस्ट नेता झाला नाथ खनाल से भी मुलाकात की थी। इसके साथ ही हाओ यांगकी ने ओली की सरकार को बचाने के लिए राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल से भी मुलाकात की थी, जिसके बाद नेपाल की अंदरूनी राजनीति में दखल देने के लिए चीनी राजदूत की भारी आलोचना की गई थी, हालांकि उसके बाद भी उन्होंने कोशिशें बंद नहीं की। यानि, काफी आसानी से समझा जा सकता है, कि नेपाल की राजनीत में चीन की दखलअंदाजी कितनी ज्यादा बढ़ चुकी है।

केपी शर्मा भारत के लिए कितनी बड़ी समस्या?
केपी शर्मा ओली के समर्थन पर प्रचंड की सरकार का गठन हुआ है और केपी शर्मा ओली अब नेपाल के किंगमेकर हैं, और अब उनकी सरकार बन चुकी है, लिहाजा वो अब भारत के लिए मुसीबत बन सकते हैं। अतीत में वो ऐसा कर सके हैं। अपनी पिछली सरकार में चीन की शह पर केपी शर्मा ओली ने जानबूझकर नेपाल के आधिकारिक मानचित्र और प्रतीक चिन्ह में कुछ भारतीय क्षेत्रों को शामिल किया था और संसद में एक संशोधन विधेयक प्रस्ताव पास कराया था। इसके जरिए उन्होंने नेपाल में भारत विरोधी भावना को भड़काया था। 20 मई को 2020 को नेपाल ने एक नया नक्शा प्रकाशित किया, जिसमें कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में शामिल किया गया। इस विधेयक को नेपाल की प्रतिनिधि सभा में दो-तिहाई बहुमत से पारित किया गया और सर्वसम्मति से नेशनल असेंबली ने 18 जून 2020 को इसे पारित कर दिया और नेपाल की राष्ट्रपति ने उसी दिन इसे मंजूरी भी दे दी थी और इस तरह से भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद की शुरूआत हो गई। यानि, केपी शर्मा ओली एक बार फिर से भारत के लिए समस्याएं पैदा कर सकते हैं।

नेपाल में भारत की ऐतिहासिक गलती
भारत, जो 2005 तक नेपाल की आंतरिक राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाता था, उसने उस मावोवादी संगठनों का साथ देना शुरू कर दिया, जिसपर खुद भारत में बैन लगा हुआ था। भारत का ये फैसला हैरान करने वाला था। इसके साथ ही भारत ने नेपाल में उस राजशाही के खिलाफ भूमिका निभाई, जो राजशाही भारत का मजबूती से समर्थन करती थी, और जिसके जरिए भारत नेपाल की राजनीति को नियंत्रित करता था। लेकिन, भारत ने 2005 के बाद से नेपाल के माओवादियों का साथ दिया, जिसने नेपाल की राजशाही को खत्म कर दिया और इसके साथ ही नेपाल की राजनीति से भारत पूरी तरह से बाहर हो गया।

कम्युनिस्टों ने दिया भारत को धोखा!
जिस कम्युनिस्टों का साथ भारत ने दिया, उन्होंने चीन से हाथ मिला लिए। अब आलम ये है, कि नई दिल्ली के पास नेपाल में अब एक भी विश्वसनीय संस्थागत सहयोगी नहीं है और चीन ने इसका जबरदस्त तरीके से फायदा उठाया है। ओली ने जीत हासिल करने पर उत्तराखंड में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाल के नियंत्रण में लाने का वादा किया है। हो सकता है कि ओली का नया कार्यकाल उनके पहले के दो कार्यकालों से अलग न हो, जिसमें भारत और नेपाल के बीच संबंधों में गिरावट देखी गई। साल 2015 में संविधान बदलने के बाद भारत ने नेपाल की आर्थिक मदद करनी कम कर दी। वहीं, साल 2018 में क्षेत्रीय विवाद छिड़ गया, जिसका फायदा भी चीन ने उठाया है। लिहाजा, अब जब एक बार फिर से नेपाल में कम्युनिस्टों की सरकार बन गई है, तो फिर देखना होगा, कि नेपाल की नई विदेश नीति क्या होती है?
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